बिजनेस स्टैंडर्ड - केरल: कांग्रेस के लिए गुटबाजी बन रही बाधा
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केरल: कांग्रेस के लिए गुटबाजी बन रही बाधा

शाइन जैकब /  04 22, 2019

लोकसभा चुनाव

बिजनेस स्टैंडर्ड केरल: कांग्रेस के लिए गुटबाजी बन रही बाधाजब पिछले महीने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने वायनाड से अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की थी तब केरल के कांग्रेस में 'मिशन 20/20' का आह्वान किया गया। पहली बार कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के कार्यकर्ताओं ने 'राहुल प्रभाव' की वजह से राज्य में सभी 20 सीटों पर जीतने की संभावनाएं जतानी शुरू कर दी। हालांकि अब इस राह में कांग्रेस के भीतर गुटबाजी का मुद्दा चुनौती बन कर उभर रहा है। गुटबाजी की बातें तब और फैलने लगीं जब कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने इस बारे में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिव मुकुल वासनिक को इसके बारे में लिखा था।

तिरुवतंनपुरम में थरूर की कड़ी टक्कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ है और उन्होंने अपने पत्र में यह संकेत दिए कि स्थानीय कमेटी चुनाव प्रचार अभियान के दौरान सहयोग नहीं कर रही थी। इसके बाद एआईसीसी ने ऑल इंडिया किसान कांग्रेस अध्यक्ष और नागपुर के उम्मीदवार नाना पटोले को जल्दबाजी में पर्यवेक्षक बनाकर तिरुवनंतपुरम भेजा और उन्हें चुनाव पूरा होने तक वहीं रुकने को कहा। इस निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम 20 स्थायी समिति प्रचार अभियान से अलग रही जबकि थरूर अपने चुनावी प्रबंधन और दोस्तों के बदौलत चुनावी अभियान संभाल रहे थे। 

पार्टी के एक अंदरुनी सूत्र का कहना है कि यह केवल एक निर्वाचन क्षेत्र की बात नहीं है। देश की सबसे पुरानी पार्टी को बूथ एजेंट और ज्यादातर जगहों पर पर्चे बांटने के लिए कार्यकर्ताओं की कमी खल रही है। के वी थॉमस को इस बार लोकसभा टिकट नहीं मिला जो केरल से पांच बार सांसद रहे हैं। उनका कहना था, 'नेताओं को समूह से उठकर काम करना चाहिए और समूह की प्रतिद्वंद्विता से चुनाव में पार्टी की संभावनाएं खत्म होंगी।' दो प्रमुख गुटों के बीच सीट साझेदारी की वजह से थॉमस को एर्नाकुलम की सीट गंवानी पड़ी। इनमें ए (एंटनी) समूह शामिल है जिसका नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री ओम्मान चांडी करते हैं जबकि आई (इंदिरा) समूह का नेतृत्व विपक्ष के नेता रमेश चेन्नितला करते हैं। 

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने बिजऩेस स्टैंडर्ड को बताया, 'केरल में पार्टी के भीतर हमेशा से गुटबाजी रही है। इसके बावजूद राहुल गांधी राज्य से चुनाव लड़ रहे हैं और लोग पार्टी के लिए अब भी वोट दे सकते हैं। इसकी वजह यह है कि  45 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी खासतौर पर 27 फीसदी मुस्लिम समुदाय उन्हें केंद्र में नरेंद्र मोदी को टक्कर देने के लिए वाम के मुकाबले बेहतर विकल्प मानते हैं।' राज्य की प्रदेश कांग्रेस कमेटी में गुटबाजी का इतिहास 1980 के दशक से चलता आ रहा है जब दिग्गज के करुणाकरण और एंटनी प्रभार संभाल रहे थे। इसके बाद चांडी और चेन्नितला को यह जिम्मेदारी मिली हालांकि इनमें से किसी ने भी इस समूह के संस्थापकों के प्रति अपनी वफादारी नहीं दिखाई। पार्टी के अन्य सूत्रों का कहना है कि उत्तर भारत की तरह ही यहां भी पार्टी के कई नेताओं को भाजपा द्वारा अपने गुट में जोडऩे के खतरे का सामना करना पड़ रहा है।

जयशंकर का मानना है कि वाम दलों को उम्मीद है कि सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर कांग्रेस का हिंदू वोट भाजपा की तरफ खिसक सकता है जिससे माकपा को फायदा होगा। हालांकि वह कहते हैं, 'केरल के इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर राहुल के अचानक प्रवेश से मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की तरफ हो सकता है। इसी वजह से मुझे लगता है कि सभी मतभेद के बावजूद केरल में कांग्रेस को अधिकतम सीटें मिलेंगी।' इसके अलावा हाल में माकपा सरकार के खराब बांध प्रबंधन की वजह से बाढ़ के विकराल होने के आरोप लगे। इसके बाद पुननिर्माण के कार्यों के लिए भी अब तक लोगों को 10,000 से अधिक पैसा नहीं मिला है। वाम दलों को नायर समुदाय की नाराजगी का सामना भी करना पड़ा जिसमें राज्य में करीब 13 फीसदी आबादी है। 

इस बार भाजपा को नायर समुदाय का अच्छा वोट हिस्सेदारी पाने की उम्मीद है क्योंकि राज्य में मंदिर प्रशासन का काम ज्यादातर इसी समुदाय के लोग करते हैं। राज्य में राजनीतिक हिंसा की वजह से भी माकपा की स्थिति कमजोर हुई है। इन सभी वजहों से कांग्रेस को केरल में बढ़त मिल सकती है।
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