बिजनेस स्टैंडर्ड - धरती बचाने के लिए हमें खुद बनना होगा बदलाव का जरिया
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, May 25, 2019 12:54 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

धरती बचाने के लिए हमें खुद बनना होगा बदलाव का जरिया

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  April 22, 2019

अब यह साफ है कि इस 'एन्थ्रोपोसीन' युग में पर्यावरण सुरक्षा को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। यह सर्वविदित है कि यह दुनिया निर्धारित सीमाओं के भीतर रहने की अपनी क्षमता तेजी से खोती जा रही है। स्वास्थ्य से जुड़े स्थानीय संकट की खबरें हमारे इर्दगिर्द छाने लगी हैं। ऐसा पर्यावरण के हमारे कुप्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के असर के वैश्विक अस्तित्ववादी संकट के कारण हो रहा है। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं? हम सभी हालात बदलना चाहते हैं। हम पर्यावरण की साफ-सफाई और संरक्षण में योगदान चाहते हैं। हम शिद्दत से जरूरत महसूस किए जा रहे बदलावों का हिस्सा बनना चाहते हैं। हम जिस हवा में सांस लेते हैं वह इतनी दूषित हो चुकी है कि हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। हमारी नदियां कूड़े-कचरे और गंदे पानी से खत्म हो रही हैं। हमारे जंगलों पर भी खतरा मंडरा रहा है। हम जानते हैं कि अपना पर्यावरण बचाने के लिए काफी कुछ किया जाना है क्योंकि इसके बगैर हमारी धरती का वजूद ही दांव पर होगा। 

 
हम इन चीजों के बारे में जानते हैं लेकिन सवाल यह है कि किया क्या जा सकता है? क्या कुछ ऐसा है जो हम एक इंसान या स्कूल, कॉलेज, कॉलोनी एवं सोसाइटी के तौर पर सामूहिक रूप से कर सकते हैं? क्या हम भी अपना योगदान दे सकते हैं? अगर हां तो फिर कैसे? हम ऐसा कर सकते हैं। बहुत साल पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि हम दुनिया में जो भी बदलाव लाना चाहते हैं, उसे पहले हमें खुद पर लागू करना चाहिए। हमें आज भी वही काम करने की जरूरत है। यह साफ है कि हमारी जीवनशैली ने पर्यावरण पर खासा असर डाला है। हमारी गतिविधियों और उन्हें अंजाम देने के तरीकों का अहम फर्क होता है। इसीलिए बदलाव की दिशा में पहला कदम यह है कि हम अपने कार्यों को लेकर जागरूक हों। मसलन, हमें पता हो कि हम कितना पानी और बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं और उससे कितना अवशिष्ट पैदा होता है? ऐसा तभी हो सकता है जब हम अपने तौर-तरीके इस तरह बदलें कि संसाधनों का कम-से-कम इस्तेमाल हो और उससे अवशिष्ट भी कम-से-कम पैदा हों। 'धरती पर ज्यादा बोझ न डालना' ही हमारा आदर्श होना चाहिए। 
 
हमें बदलावों को आत्मसात करना होगा। पानी के ही मुद्दे पर गौर करें तो एक तरफ पानी का संकट बढ़ता जा रहा है तो दूसरी तरफ उपलब्ध जल दूषित होता जा रहा है। इसका जवाब इन पंक्तियों में निहित है: पहला, पानी की हरेक बूंद बचाकर हमें अपने जल संसाधनों को बढ़ाना है। हम वर्षा-जल का इस तरह संचय करें कि हरेक छत और सतह जल संकलन के काम आए। केवल सरकार का ही काम नहीं है, हमें भी इस समाधान का अंग बनना होगा। ऐसा करना हमारी पहुंच में भी है। हरेक गांव, स्कूल, कॉलोनी और संस्थान को बारिश का पानी रोकने, उसके संचयन और बारिश की हरेक बूंद को अहमियत देनी होगी। 
 
हमें पानी की अपनी मांग कम करने पर भी ध्यान देना चाहिए। हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि पानी व्यर्थ में नहीं बहाएंगे और गंदे पानी को दोबारा इस्तेमाल में लाने लायक बनाया जा सके। हमें अपने रसोईघरों, स्नानघरों और बागीचों में पानी के कम-से-कम इस्तेमाल के तरीके भी निकालने होंगे। हालांकि ऐसा कर पाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता है क्योंकि गंदा पानी घरों से निकलने के बाद सीवेज में चला जाता है। लेकिन यह भी एक सच है कि कई घर खराब पानी के संग्रहण के मामले में आत्मनिर्भर भी होते हैं। उन घरों में सेप्टिक टैंक और अवशिष्ट जमा करने वाले बॉक्स बने होते हैं और वहां से उस कचरे को खुले नाले या जमीन तक ले जाया जाता है। इन प्रणालियों को गंदे पानी के शोधन, दोबारा इस्तेमाल के लिए बनाए गए और पानी के पुनर्चक्रण से स्थानीय स्तर पर जोड़ा जा सकता है। लेकिन असली बात यह है कि हमें खराब पानी को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने के लिए काम करना होगा।
 
कचरे के साथ भी यही बात है। अगर हम अपने कचरे का विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि हम कितना कचरा पैदा करते हैं। लेकिन अगर हम गीले कचरे को अलग रखें तो हम अपने कचरे की संरचना समझ जाएंगे। प्लास्टिक, सीसा, धातु को एक तरफ और खानपान अवशिष्ट, पत्तियों और सड़ जाने वाले दूसरे जैविक कचरों को एक तरफ रखा जाए। जब हम यह संरचना समझ लेंगे तो फिर हम उसका प्रबंधन भी कर सकते हैं। मसलन, जल्द नष्ट होने वाले जैविक कचरे से कंपोस्ट खाद बनाई जा सकती है। इसी तरह प्लास्टिक, सीसा और धातुओं को रिसाइकल किया जा सकता है। लेकिन अधिक अहम बात यह है कि इससे हमें यह पता चल जाएगा कि जल्दी नष्ट न होने वाला कचरा किन चीजों से पैदा होता है और फिर हम उसी हिसाब से अपनी योजना बना सकते हैं। हम ऐसा कर सकते हैं।
 
हम अपनी ऊर्जा जरूरतों में कटौती करते हुए भी योगदान दे सकते हैं। ऊर्जा उपकरणों की सक्षमता और प्रचुरता के जरिये हम ऊर्जा उपभोग में कटौती कर सकते हैं। वे अपने घरों और संस्थानों में नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने की दिशा में भी काम कर सकते हैं। ये छोटे-छोटे कदम बड़ी छलांग का आधार तैयार करते हैं।  मेरी संस्था सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने एक हरित स्कूल कार्यक्रम तैयार किया है जिसमें स्कूल पर्यावरणीय बदलावों पर भाषण नहीं देते हैं बल्कि उनका पालन करते हैं। इस कार्यक्रम में छात्र और शिक्षक मिलकर अपने स्कूल का पर्यावरणीय बेंचमार्क तय करते हैं। मसलन, वे कितना पानी, बिजली या वाहन इस्तेमाल करते हैं और कितना कचरा एवं प्रदूषण पैदा होता है? उस फुटप्रिंट के आधार पर वे अपने पर्यावरण को दुरुस्त करने के कदम उठा सकते हैं। वे बदलाव का सबब खुद बनते हैं। मुझे भरोसा है कि अगर हरेक स्कूल और घर इन गतिविधियों में सक्रिय हों तो उसका प्रभाव दूरगामी और अधिक होगा। हम जिंदगी के इन सबकों को खुद जिंदगी बना सकते हैं। यही हमारे लिए आगे की राह भी है। 
Keyword: environment, world, india, health, population,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या एनबीएफसी पर मसौदा परिपत्र से कम होंगी मुश्किलें?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.