बिजनेस स्टैंडर्ड - फंसे कर्ज की निपटान प्रक्रिया पर हो पुनर्विचार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, July 20, 2019 08:55 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

फंसे कर्ज की निपटान प्रक्रिया पर हो पुनर्विचार

तमाल बंद्योपाध्याय /  April 22, 2019

आरबीआई के फरवरी सर्कुलर पर आया उच्चतम न्यायालय का फैसला फंसे हुए कर्जों के निपटान को लेकर नया नजरिया अपनाने का मौका देता है। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के फरवरी 2018 में जारी सर्कुलर को निरस्त करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद केंद्रीय बैंक फंसे कर्जों की समस्या से निपटने के लिए संशोधित सर्कुलर जारी करने वाला है। एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में कर्जों का पुनर्भुगतान न होना एक बड़ी समस्या बना हुआ है। इसी समस्या के हल के लिए बैंकिंग नियामक ने बैंकिंग अधिनियम की धारा 35एए के तहत मिली शक्तियों के तहत फरवरी 2018 में एक सर्कुलर जारी किया था। उसमें केंद्र सरकार को यह शक्ति दी गई थी कि वह बैंकों को कर्ज निपटान प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश देने के लिए आरबीआई को अधिकृत कर सकती है। मई 2017 में बैंकिंग अधिनियम में जोड़ी गई धारा 35एए की वैधता पर उच्चतम न्यायालय ने सवाल नहीं उठाए हैं लेकिन वह इसके इस्तेमाल के तरीके को लेकर संतुष्ट नहीं है। सरल शब्दों में कहें तो अधिनियम की यह धारा आरबीआई को बैंकों को फंसे कर्ज के निपटान का निर्देश देने का 'विवेकाधिकार' देती है लेकिन इसे एक 'नियम' के तौर पर नहीं देखा जा सकता है।
 
भले ही उच्चतम न्यायालय का यह फैसला कर्ज निपटान प्रक्रिया को बाधित करेगा लेकिन प्रक्रिया पटरी से नहीं उतरेगी। हालांकि कर्जों की वसूली के लिए सरकार को अधिकार दिए जाने के पहले भी बैंकिंग नियामक इस कानून की धारा 35 और 21 के तहत अपने स्तर पर बैंकों के अग्रिम भुगतान से संबंधित नीतियों में दखल एवं उनके बहीखाते की जांच कर सकता था। सवाल है कि बैंकिंग अधिनियम में संशोधन की जरूरत क्या थी? शायद सरकार फंसे कर्जों के चलते पैदा हुई समस्या दूर करने और चूककर्ता कंपनियों को सबक सिखाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहती थी। या फिर सरकार कंपनी जगत को यह दिखाना चाहती थी कि कर्ज संकट के खिलाफ लड़ाई में आरबीआई अकेले नहीं है, उसे सरकार का भी समर्थन हासिल है। सरकार और आरबीआई दोनों के ही एक साथ खड़े होने से बैंकिंग प्रणाली का मजाक बनाकर रख देने वाले 'दोस्ताना पूंजीपतियों' को नियामक एवं सरकार के बीच पंचायत की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
 
एक तरह से फरवरी सर्कुलर के निर्देशों ने आरबीआई को एक सूक्ष्म प्रबंधक की भूमिका में पुनस्र्थापित कर दिया था। इस बदलाव का यह कहते हुए बचाव किया जा सकता है कि असाधारण समय में असाधारण कदम की जरूरत होती है लेकिन अब यह निर्देश निरस्त किया जा चुका है, लिहाजा आरबीआई इसे फंसे कर्जों के निपटान प्रक्रिया पर नई नजर डालने के एक मौके के रूप में देख सकता है। इसका काम जमाकर्ताओं के हितों को सुरक्षित रखना है, कर्ज चूककर्ताओं का पीछा करना नहीं। यह काम बैंकरों पर ही छोड़ देना चाहिए। अगर वे अपना काम अच्छी तरह नहीं करते हैं तो उन पर कड़ी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?
 
कर्ज बांटने के धंधे में कुछ मामले निर्यात बाजार लुढ़कने, स्थानीय मुद्रा में अचानक गिरावट आने, नियामकीय मंजूरियों में अनुचित विलंब और कच्चे माल की आपूर्ति या गलत कारोबारी मॉडल के चलते बिगड़ सकते हैं। कुछ भ्रष्ट प्रवर्तक भी हैं जो कर्ज इसीलिए लेते हैं क्योंकि उसे लौटाना नहीं है और भ्रष्ट बैंकर भी, जो रकम वापस न मिलने की आशंका होते हुए भी कर्ज बांट देते हैं। आरबीआई ने 1990 के दशक के मध्य में परियोजनाओं को वित्त देने वाले संस्थानों और वाणिज्यिक बैंकों के बीच की विभाजक रेखा हटा दी थी और सभी तरह के कर्ज देने वाली सार्वभौम बैंकिंग सुविधा की अवधारणा सामने आई थी। वाणिज्यिक बैंकों की विशेषज्ञता केवल कार्यशील पूंजी वाले कर्जों में ही होने से परियोजना वित्तपोषण के नए कारोबार में उनकी अंगुलियां जल गईं और यहीं से कर्जों के फंसने का समूचा संकट शुरू हुआ। भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वर्णिम दौर कहे जाने वाले वर्ष 2006-08 के दौरान बैंक ऋण देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का तिगुना हो गया था। लेकिन अमेरिकी निवेश बैंक लीमन ब्रदर्स होल्डिंग्स इंक के धराशायी होने के बाद दुनिया भर में वित्तीय संकट पैदा हो गया था। उस स्थिति में अपनाई गई बेहद नरम मौद्रिक नीति ने बैंकों को अधिक कर्ज बांटने और उपभोग मांग बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।
 
ऐसे में अचरज नहीं है कि जल्द ही बैंकों के कर्ज पोर्टफोलियो में दरारें दिखने लगीं लेकिन बैंक उन्हें छुपाने की कोशिश करते रहे। बैंकिंग परिसंपत्तियों में करीब 70 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले सार्वजनिक बैंकों के अधिकारी कर्ज पुनर्गठन के जरिये इस संकट को टालने की भरसक कोशिश करते रहे लेकिन उससे फंसे कर्जों का ढेर ही बढ़ता रहा। दिवालिया कानून लागू होने तक तो काफी देर हो चुकी थी।  बैंकर उस समय भी हालात को नकारते रहे। कर्ज फंसने के मामले बढऩे पर बैंकों को उनके लिए अलग प्रावधान करने पड़ते हैं क्योंकि उस पर उन्हें कोई ब्याज नहीं मिल रहा होता है। यह दोहरी मार की तरह है जिससे बैलेंस शीट भी प्रभावित होती है। भला कोई अपना घाटा क्यों दिखाना चाहेगा? ऊंचे प्रावधानों ने पूंजी को भी कम कर दिया। वह पूंजी कहां से आएगी? बैंकरों ने इस समस्या का एक आसान रास्ता निकाला। फंसे कर्जों से होने वाली ब्याज क्षति और वित्तीय प्रावधानों की भरपाई के लिए बैंकों ने अन्य कर्जदारों से ऊंचा ब्याज लेना और जमाकर्ताओं को कम ब्याज देना शुरू कर दिया। कर्जे फंसने की गंभीर समस्या से निपटने का यह विशुद्ध भारतीय 'जुगाड़' था।
 
अच्छे कर्जदारों और जमाकर्ताओं को बैंकों की इस नाकामी का खमियाजा क्यों भुगतना चाहिए? जब कोई कर्जदार किस्तों को अदा करना बंद कर देता है तो बैंक को वह खाता खराब घोषित करके उसके लिए अलग से धन का इंतजाम करना चाहिए। इस प्रक्रिया में अगर उसकी पूंजी में कमी आती है तो मालिक को नई पूंजी डालनी चाहिए। अगर बैंक जोखिम प्रबंधन, ऋण खातों की निगरानी और फंसे कर्जों की पहचान का अपना काम सही तरह से नहीं कर रहा है तो आरबीआई को उसके प्रबंधन को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए।
 
भारत की दो अनूठी अवधारणाओं- 'इरादतन चूककर्ता' और 'तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डाल देना' (राइट-ऑफ) ने भी ऋण प्रबंधन को जटिल बना दिया। 'इरादतन चूककर्ता' का आशय उस कर्जदार से है जिसने आवंटित कर्ज का इस्तेमाल कहीं और कर दिया है। वहीं राइट-ऑफ एक अकाउंटिंग गतिविधि है जिसमें कर्ज को बट्टे खाते में डालकर बैंक की बैलेंस शीट से हटा दिया जाता है लेकिन उसे कुछ शाखाओं में डाल दिया जाता है। जब उस कर्ज की वसूली हो जाती है तो वह राशि बैंक की लाभपरकता में जुड़ जाती है। ऐसे तकनीकी राइट-ऑफ के लिए कोई सर्वमान्य मानक नहीं है। प्रबंधन के अपने विवेक से किए जाने वाले ऐसे राइट-ऑफ ने ही बैंकों का कर्ज कम फंसे होने का भ्रम पैदा किया है जबकि बीते दशक में लाखों करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले जा चुके हैं।
 
आरबीआई की दिसंबर में संपन्न बैंकिंग प्रणाली की छमाही समीक्षा के बाद जारी वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक फंसे कर्जों के ढेर में कुछ कमी आनी शुरू हो गई है। भारतीय बैंकिंग उद्योग की कुल लोन-बुक में फंसे कर्जों का प्रतिशत मार्च 2018 के 11.5 फीसदी से घटकर सितंबर 2018 में 10.8 फीसदी पर आ गया था। आरबीआई को उम्मीद है कि मार्च 2019 की छमाही में यह 10.3 फीसदी के स्तर पर आ जाएगा। यह एक अच्छी खबर है लेकिन बैंकों और आरबीआई दोनों को ही यह भूलना नहीं चाहिए कि कंपनियों को नई जिंदगी देना दिवालिया कानून के केंद्र में है और बैंकों को उनका बकाया मिल जाना उसका उप-उत्पाद भर है। 
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या आरबीआई के संकेत के बाद कर्ज सस्ता करेंगे बैंक?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.