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सबसे बड़ी परीक्षा

संपादकीय /  April 22, 2019

सप्ताहांत पर देश के प्रधान न्यायाधीश पर लगे यौन शोषण के आरोप ने सर्वोच्च न्यायालय समेत पूरे देश में हलचल मचा दी। वह यौन शोषण के दोषी हैं या किसी राजनीतिक दुश्मनी के शिकार, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा। इन सारी बातों से परे देश के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के विरुद्घ मामला सर्वोच्च न्यायालय के उन प्रक्रियागत दिशानिर्देशों का भी अहम परीक्षण होगा जो सन 1997 में एक अहम मामले में तय किए गए थे। ये दिशानिर्देश 2013 में कानून में बदल गए। इन नियमों को शुरुआत में विशाखा गाइडलाइन का नाम दिया गया था। यह नाम एक गैर सरकारी संगठन से लिया गया था जिसने पीडि़त की ओर से मामले की पैरवी करते हुए पहली बार यौन शोषण को परिभाषित किया और जिसके बाद 10 से अधिक कर्मचारियों वाले सभी संस्थानों में शिकायत समिति का होना अनिवार्य किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में संसद से कानून बनने के बाद अपनी विशाखा समिति भी गठित की। परंतु इस मामले में इसे अमल में नहीं लाया गया। इस संदर्भ में गोगोई के कदमों पर सवाल उठ सकते हैं। 

 
गत वर्ष जनवरी में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा द्वारा प्रक्रियाओं के अतिक्रमण के खिलाफ हुए न्यायाधीशों के अप्रत्याशित सामूहिक विरोध प्रदर्शन में गोगोई ने भी शिरकत की थी। इस बात ने प्रक्रियाओं और नियम कायदों के पालन को लेकर उनकी छवि बहुत मजबूत की थी। चकित करने वाली बात है कि इसके बावजूद गोगोई खुद पर इन नियमों को लागू करने के अनिच्छुक दिखे। यौन शोषण शिकायत समिति के माध्यम से जांच प्रक्रिया की शुरुआत करना इस मामले में एकदम उचित कदम होता लेकिन इसके बजाय उन्होंने अपने बचाव का एक अस्वाभाविक तरीका चुना। कथित पीडि़त की तुलना में उनकी शक्तिशाली स्थिति का भी बचाव नहीं किया जा सकता। सोलीसिटर जनरल द्वारा आरोपों की सूचना मिलने के बाद गोगोई ने सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ बनाया जिसमें न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा शामिल थे। उन्होंने कहा कि यह सुनवाई 'महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक महत्त्व के मसले से जुड़ी है और यह न्यायपालिका की स्वायत्तता से संंबंधित है।' इसके बाद वह आधे घंटे तक अपने निर्दोष होने के बारे में बोलते रहे। उन्होंने अपने मामूली बैंक बैलेंस और पीडि़ता की प्रतिष्ठा को लेकर भी बातें कीं। 
 
इससे कई सवाल खड़े होते हैं। जिन 26 न्यायाधीशों को पीडि़ता का हलफनामा मिला, उनमें से केवल दो न्यायाधीशों को इस 'विशेष पीठ की सुनवाई' में शामिल क्यों किया गया? जैसा कि गोगोई ने दावा किया यौन शोषण की शिकायत भला किस तरह न्यायपालिका की स्वायत्तता को प्रभावित करती है? शिकायतकर्ता को इस विशेष पीठ के समक्ष उपस्थित होने की इजाजत क्यों नहीं दी गई? अंतिम प्रश्न महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कानून के मुताबिक शिकायत समिति के शिकायत स्वीकार करने के लिए प्रधान न्यायाधीश की इजाजत आवश्यक है। प्रधान न्यायाधीश के विरुद्घ सुनवाई के लिए कोई प्रक्रिया नहीं है। कथित पीडि़त की सुनवाई की अनुपस्थिति में अदालत ने एक वक्तव्य जारी किया जिस पर केवल न्यायमूर्ति मिश्रा और खन्ना के हस्ताक्षर थे। मीडिया से कहा गया कि वह जिम्मेदारी भरा व्यवहार करे और विचार करे कि क्या ऐसे फिजूल और विवाद पैदा करने वाले आरोपों को प्रकाशित करना है? ध्यान रहे कि मामले का परीक्षण बिना पीडि़त से प्रश्न-प्रतिप्रश्न किए कर लिया गया। स्वतंत्र जांच का सुझाव क्यों नहीं दिया गया? शिकायतकर्ता के प्रक्रिया में शामिल न होने के बाद भी उसकी विश्वसनीयता का संदर्भ और उसके कथित आपराधिक रिकॉर्ड का जिक्र अस्वाभाविक था। इस बात की अनदेखी मुश्किल है कि सर्वोच्च न्यायालय ने शिकायत को लेकर न्यूनतम कानूनी प्रक्रिया तक का पालन नहीं किया, जो उसे करना चाहिए था।
Keyword: supreme court, ranjan gogoi,,
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