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कल्याणकारी एजेंडे को कैसे दिया जाए आकार

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  April 21, 2019

देश की राजनीति में व्याप्त कल्याणकारी प्रतिस्पर्धा की आलोचना करना आम बात है। गत वर्ष के अंत में कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव आयोजित किए गए थे। कांग्रेस ने बकाया कृषि ऋण माफ करने का वादा किया था और उसे चुनाव में जीत मिली थी। मौजूदा आम चुनाव में सत्ताधारी भाजपा को उम्मीद है कि उसने अंतरिम बजट में किसानों को प्रत्यक्ष राशि अंतरण की जो घोषणा की है, उसका उसे फायदा मिलेगा। कांग्रेस ने न्यूनतम आय गारंटी योजना का ऐलान किया है जिसका दायरा अधिक है मगर उस पर अमल कठिन। राज्यों के दल इस मामले में और उदार रहे हैं। यह बात राजनेताओं की नजर से चूकी नहीं होगी कि तेलंगाना राष्ट्र समिति, जिसे विधानसभा चुनावों में जबरदस्त जीत मिली, वह सबसे अधिक कल्याण योजनाएं चलाती है। 

 
प्रतिस्पर्धी कल्याण के खिलाफ दलीलें जगजाहिर हैं। इनके लिए संसाधन जुटाना आसान नहीं और इनकी भरपाई करों के माध्यम से ही होगी या फिर उधार लेकर। यानी यह मुद्रास्फीति को प्रभावित करेगा। प्रत्यक्ष कर अपेक्षाकृत कमजोर है। इसलिए कर में इजाफा करना कठिन है। अगर कर व्यवस्था में सुधार के बिना ऐसा किया गया तो कर वंचना को प्रोत्साहन मिलेगा और पूंजी दूसरी जगह जाएगी। इससे बतौर उत्पादक भारत की स्थिति कमजोर बनी रहेगी। यह बात लंबी अवधि में देश के कामगारों को परेशान करती है क्योंकि कंपनियों की स्थापना नहीं होती। देश का सार्वजनिक ऋण कागज पर अपेक्षाकृत कम है पर देनदारी बढ़ रही है। इससे भविष्य में संकट हो सकता है। 
 
बढ़ता हुआ ऋण निजी निवेश में कमी की वजह बनेगा। इसका असर वृद्धि और रोजगार पर पड़ेगा। ऊंची मुद्रास्फीति भी निवेश को हतोत्साहित करती है। राज्य के स्तर पर प्रतिस्पर्धी लोक कल्याण देश के संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाता है क्योंकि राज्य इस बात पर सवाल उठाने लगते हैं कि वे केंद्र को कितना पैसा दे रहे हैं और बदले में उन्हें क्या मिल रहा है और सीधे बाजार तक पहुंच बनाने की राह में क्या बाधा है? बहरहाल, लोकतांत्रिक राजनीति की अपनी गति होती है। यह समझना भी आवश्यक है कि भारत ने अकारण लोकल्याणकारी युग में प्रवेश नहीं किया है बल्कि समावेशी विकास न कर पाने में विफलता इसकी वजह रही है।
 
 बिना रोजगार वाले विकास को गैर समावेशी वृद्धि करार दिया जा सकता है। यह दिक्कतदेह स्थिति है। ऐसा इसलिए कि रोजगार तलाश करने वालों की फौज राजनेताओं के लिए अहम मतदाता वर्ग है। उनको संतुष्ट करने के लिए सरकार की वेतन बिल बढ़ाते जाने की चाह स्वाभाविक है। आय के सुरक्षित होने और निरंतर बढऩे के भरोसे के अभाव में मतदाता आगे आकर उनकी आय की रक्षा करे और उसे बढ़ाए। तमाम अध्ययन हैं जो यह दिखाते हैं कि व्यक्तिगत कदम और भविष्य की आय किस प्रकार आर्थिक नीति के संदर्भ में लोगों की राजनीतिक प्राथमिकता में तब्दीली लाते हैं। अगर भारत में मतदाता यह मानते रहे हैं कि मानव पूंजी अथवा महत्त्वाकांक्षा और भविष्य की आय की संभाव्यता के बीच कोई संबंध नहीं है तो फिर वे शायद ही ऐसे रिश्ते पर यकीन करने वाले आर्थिक विचार के पक्ष में मतदान करें। 2019 में कोई राजनेता यह नहीं कहेगा कि जवाबदेह आर्थिक नीति आय सुरक्षा मुहैया कराएगी। इसलिए कि पिछले एक दशक में दोनों पक्षों को जवाबदेह आर्थिक नीति लागू करने का मौका मिला है और इस पूरी अवधि के दौरान भारत में रोजगार बिल्कुल नहीं बढ़े।
 
क्या भारत मंदी के चक्र का शिकार है? समावेशी विकास की कमी के कारण लोककल्याण का दबाव बढ़ा है। जबकि यह समावेशी विकास की भविष्य की संभावनाओं को भी नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में यह गतिरोध बरकरार रहने की संभावना है। परंतु इससे निकलने की एक राह भी है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हाल के वर्षों में समावेशी विकास की नाकामी को स्वीकार किया जाए। इसके साथ ही मौजूदा राजनीति में लोककल्याण की आवश्यकता को भी समझा जाए। आवश्यकता यह भी है कि कल्याण योजनाओं को समझदारी से तैयार किया जाए। ऐसा करने से भविष्य के लिए मानव संसाधन और आय सुरक्षा तैयार करने में भी सहायता मिलेगी। यह सुनिश्चित करना होगा कि कल्याण योजनाओं को ऐसे तैयार किया जाए कि देश की श्रम शक्ति की संभावित उत्पादकता में इजाफा हो सके। इससे बढ़े हुए व्यय के नकारात्मक वृहद आर्थिक प्रभाव को कम करने में भी सहायता मिलेगी। 
 
यह भी तय नहीं है कि आय समर्थन योजना बेहतर है या नहीं। परंतु कम से कम यह व्यय क्षमता में सुधार लाने का काम करेगी। इससे मानव संसाधन तैयार करने, तलाश की लागत कम करने और श्रम बाजार में समता लाने में भी सहायता मिलेगी। अगर सरकार स्वास्थ्य एवं मूलभूत शिक्षा पर व्यय बढ़ाएगी तो कहीं अधिक बेहतर होगा। इन नीतिगत प्राथमिकताओं के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक सरकारी मशीनरी पर भी खर्च किया जाना चाहिए। सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा उत्पादकता बढ़ाएगी। यह काम सस्ती दर पर नहीं किया जा सकता है क्योंकि सरकार को निजी सेवाप्रदाताओं के काम पर करीबी निगाह रखनी होती है अथवा उसे अपने ही स्वास्थ्यकर्मियों को भुगतान करना होता है। प्राथमिक शिक्षा में नतीजों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम इस दिशा में उचित हल साबित नहीं हुआ और वह दीर्घावधि में कारगर साबित नहीं होगा। वयस्क प्रशिक्षण, ऑनलाइन शिक्षा आदि पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
 
अगर सुधार को लेकर राजनीतिक सहमति के संकेत नहीं नजर आ रहे हैं या जवाबदेह आर्थिक नीति नहीं बनती दिख रही है। हमें यह समझना होगा कि यह बीते दशक में या उससे पहले भी आय में वृद्धि और आय सुरक्षा मुहैया न करा पाने का दुष्परिणाम है। इस नाकामी पर विलाप करने के बजाय अब वक्त आ गया है कि हम यह सवाल उठाएं कि लोककल्याण के एजेंडे को कैसे आकार दिया जाए।
Keyword: agri, farmer, crop, loan,,
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