बिजनेस स्टैंडर्ड - अंधराष्ट्रवाद और मोदी की कोशिश
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अंधराष्ट्रवाद और मोदी की कोशिश

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 21, 2019

हिंदी मीडिया की अपनी स्वाभाविक छानबीन के दौरान मैं अतीत के एक गीत पर ठहर सा गया। इस गीत में कवि प्रदीप ने देश के भीतर के गद्दारों से सावधान रहने की बात कही थी। राजेंद्र कुमार अभिनीत और मन्ना डे के गाए इस गीत में उन्होंने कहा था, 'झांक रहे हैं अपने दुश्मन, अपनी ही दीवारों से/संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से' वह आगे लिखते हैं कि 'होशियार तुमको अपने कश्मीर की रक्षा करनी है।' यह गीत उन्होंने महेश कौल की फिल्म तलाक के लिए लिखा था। सन 1958 में रिलीज हुई यह फिल्म फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए भी नामित हुई थी। परंतु हिंदी प्रदेश में होने वाली चर्चाओं में यह बात दोबारा क्यों उभर रही है?

 
आपको ऐसे संदर्भ भी मिलेंगे कि नेहरू को यह गीत बहुत नापसंद था क्योंकि इसमें कुछ भारतीयों को दुश्मन बताया गया था। इसलिए उन्होंने इसे प्रतिबंधित किया था। यह भी कि सन 1965 के युद्ध के वक्त लाल बहादुर शास्त्री ने यह प्रतिबंध हटा लिया। ताजा दलील यह है कि एक ओर शत्रु दरवाजे पर खड़ा है और दूसरी ओर हमारे घरों में गद्दार छिपे हुए हैं। तथ्यों की तो बात ही छोड़ दें। इन 60 वर्षों में, ढाई युद्धों में जीत हासिल करने, पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांटने और 2.7 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के बाद शायद आपको लगा होगा कि देश बहुत सुरक्षित है, समृद्धि की ओर बढ़ रहा है और ऐसे में यह आशावाद जाग सकता है कि हम अतीत के मोह से मुक्त हो सकें।
 
परंतु उत्तर और दक्षिण में देश के बड़े हिस्से की यात्रा करने के बाद मैं पूरी विनम्रता से यह कहना चाहूंगा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इसका ठीक विपरीत हासिल कर पाए हैं। ऐसे समय में जबकि भारत को आंतरिक और बाहरी स्तर पर सर्वाधिक सुरक्षित महसूस करना चाहिए था, तब वे मतदाताओं के एक बड़े तबके को यह यकीन दिलाने में कामयाब रहे हैं कि अतीत के खतरे लौट आए हैं। इनमें बड़ी तादाद उन युवाओं की है जो व्हाट्सऐप से इतिहास की शिक्षा लेते हैं और यह मानते हैं कि भारत 2014 में अंधकार युग से बाहर आया। ऐसे में ऐसे मजबूत, आक्रामक और निर्भय नेता के अलावा आप किस पर यकीन करेंगे जो बिना पुनर्विचार किए कमांडो को सर्जिकल स्ट्राइक पर भेज देता हो या दुश्मन के क्षेत्र में विमानों से बमबारी करता हो?
 
अर्थव्यवस्था और रोजगार के मोर्चे पर इतने खराब हालात और संकट की स्थिति को प्रोपगंडा के जरिए दुरुस्त नहीं किया जा सकता है। हमें अनुमान था कि मोदी और शाह इस चुनाव को 'देश खतरे में है' के नारे के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के चुनाव में बदल देंगे। हम कह सकते हैं कि वे इसमें सफल रहे। किसी चुनाव को 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के चुनाव में बदलने की तीन पूर्व शर्त हैं। पहला, राष्ट्रीय हितों को आक्रामक और उन्मादी तरीके से नए सिरे से प्रस्तुत करना। दूसरा, एक मजबूत शत्रु हो जिससे सच्चे राष्ट्रवादी नफरत करें और आशंकित रहें। सबसे महत्त्वपूर्ण बात, उस दुश्मन से सांठगांठ करने वाले और सहानुभूति रखने वाले देश में मौजूद हों केवल तभी आप उसके खिलाफ वोट मांग सकेंगे और नैतिक या राजनीतिक रूप से कोई विरोध नहीं कर सकेगा। इसे केवल ध्रुवीकरण की राजनीति कहना कम समझ की बात होगी। यह काफी प्रभावी और मारक है। 
 
राष्ट्रीय हित की ऐसी लोकप्रिय अवधारणा विकसित करने के लिए पहचान की तीव्र परिभाषा विकसित करनी होती है। अमेरिकी नीतिकार और हॉवर्ड के प्रोफेसर जोसेफ नाइ जूनियर ने फॉरेन पॉलिसी पत्रिका में लिखा है कि राष्ट्रवाद की अवधारणा फिसलन भरी है और इसका उपयोग विदेश नीति की व्याख्या करने में भी किया जाता है और उसे तय करने में भी। आगे वह सैमुएल हटिंगटन को उद्घृत करते हुए कहते हैं कि बिना राष्ट्रीय पहचान की सुरक्षित समझ के राष्ट्रीय हित को स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। 
 
आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस तरफ इशारा कर रहा हूं। हिंदू की पहचान ही भारतीय राष्ट्रवाद का मूल है। जो हिंदुओं के लिए बेहतर है, वही राष्ट्र के लिए भी बेहतर है। हो सकता है कि इसका उलटा भी सच हो। अगर ऐसा नहीं है तो इसे सुधारना होगा। गैर हिंदुओं की बात करें तो उनको भी ऐसा ही लाभ मिलेगा। परंतु अगर वे शिकायत करते हैं या असंतुष्ट रहते हैं तो वे भी घायल दिल वाले उदारवादियों, सवाल करने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शहरी नक्सल आदि की गद्दारों की सूची में शामिल हो जाएंगे। अब जरा कवि प्रदीप की उस चेतावनी को याद कर लें जो उन्होंने घर में छिपे गद्दारों के बारे में दी थी। 
 
मोदी और शाह ने यह अभियान इसी प्रकार तैयार किया है। विपक्ष न्याय, राफेल, धर्मनिरपेक्षता, समता आदि के साथ एक अलग खेल खेल रहा है। यह वैसा ही है जैसे एक पक्ष फौजी धुन पर आगे बढ़ रहा है जबकि दूसरा तानपुरे पर आलाप ले रहा है। वे तमाम विचार भी सही हैं लेकिन सच यही है कि अगर देश नहीं बचा तो कुछ भी नहीं बचेगा। चूंकि ऐसे खतरे आसन्न हैं तो आप देश किसके हाथों में सौंपना चाहेंगे? एक निर्णायक और मजबूत नेता के या एक 'पप्पू' के? देश में कोई सर्वविजेता राष्ट्रवादी लहर नहीं है लेकिन ऐसा माहौल तो है कि आर्थिक निराशा और असंतोष की काट की जा सके। देश के दूरदराज इलाकों में आपको ऐसे युवा, बेरोजगार और नाउम्मीद लोग मिलते हैं जो कहते हैं उनके पास काम नहीं है और वे परेशान हो रहे हैं लेकिन वे देश के लिए थोड़ा कष्ट सहने को तैयार हैं। हमें भले ही यह सब बेवकूफाना और बेतुका लगे लेकिन इससे हकीकत नहीं बदल सकती।
 
दूसरा कारक है पहचान। यह लहर आबादी के एक बड़े हिस्से में कमजोर या नदारद है। यह आबादी का वह हिस्सा है जिसकी राजनीतिक पहचान हिंदू धर्म से कहीं अधिक मजबूत है। यह जाति भी हो सकती है। उदाहरण के लिए कर्नाटक में वोक्कालिगा और उत्तर प्रदेश में यादव तथा देश के लगभग हर हिस्से में दलित। यह भाषा और जातीयता भी हो सकती है मसलन तमिल और तेलुगू। यह धर्म के आधार पर भी हो सकता है मसलन मुस्लिम और ईसाई। जहां भी ऐसे कुछ कारक मिलते हैं, खासतौर पर उत्तर प्रदेश में, तब यह स्थिति निर्मित हो सकती है।
 
यही कारण है कि सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस को हुआ है। कई अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह उसके पास वैकल्पिक पहचान का बचाव हासिल नहीं है। राहुल के इस दौर में पार्टी ने कट्टर राष्ट्रवाद का मुकाबला करने के लिए उदार शांतिवाद की राह चुनी है जो व्यावहारिक नहीं प्रतीत होती है। खासतौर पर यह देखते हुए कि पार्टी खुद भी क्रूर और निर्मम सरकार चला चुकी है। अगर आपको लगता है कि भाजपा के शत्रुओं और गद्दारों के खिलाफ अभियान की काट राजद्रोह विरोधी कानून का खात्मा है तो आपको पता ही नहीं है कि आपकी लड़ाई किस बात से है। 
 
मोदी और शाह की भाजपा ने न केवल युवा मतदाताओं के मस्तिष्क में उन्मादी राष्ट्रवाद की भावना भरी है बल्कि उसने एक खतरनाक अंधराष्ट्रीयता को जन्म दिया है और इतिहास बताता है कि इसका अंत कभी भला नहीं होता। यहां शत्रु स्पष्ट है और हथियार चिह्नित हैं। पाकिस्तान के लिए हमारे पास जेट विमान और कमांडो हैं और देश के भीतरी दुश्मनों के लिए सोशल मीडिया और लांछन। कवि प्रदीप ने जिन खतरों और शत्रुओं की पहचान की थी और जिनके बारे में लग रहा था कि हमने उन्हें समाप्त कर दिया है, वे दोबारा जिंदा हो गए हैं और हिंदी मीडिया ने सबसे पहले उस रुझान को भांपा है। साठ वर्ष बाद अब एक नई पीढ़ी और नई शैली (रैप) के कवि ने मौजूदा मिजाज को प्रकट किया है।
 
रणवीर सिंह- आलिया भट्ट अभिनीत फिल्म गली ब्वॉय का यह गीत सुनिए: दो हजार अठारह है, देश को खतरा है/ हर तरफ आग है, तुम आग के बीच हो/जोर से चिल्ला दो, सब को डरा दो, अपनी जहरीली बीन बजा के, सबका ध्यान खींच लो। क्योंकि रैपर अपनी बात समाप्त करते हुए कहता है: हम सब अब जिंगोस्तान में रह रहे हैं। 
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