बिजनेस स्टैंडर्ड - जेट के सबक
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जेट के सबक

संपादकीय /  April 21, 2019

बीते बुधवार को देर रात 12.30 बजे जब जेट एयरवेज (एक समय देश की दूसरी सबसे बड़ी निजी विमानन कंपनी) की अंतिम उड़ान मुंबई में उतरी तो विमान चालक ने अपने संदेश में कहा, 'हम आशा करते हैं कि हम दोबारा जल्द उड़ान भरेंगे। जब भी ऐसा हो, आप हमारी सेवा लें।' 25 वर्ष पहले शुरू हुई जेट एयरवेज के लिए यह एक मार्मिक क्षण था लेकिन सेवाओं का अनिश्चित कालीन निलंबन कतई चौंकाने वाली बात नहीं थी क्योंकि वर्ष की शुरुआत 119 विमानों से करने वाली कंपनी के पास अब बमुश्किल पांच विमान परिचालन के लिए बचे थे। कंपनी पर 8,400 करोड़ रुपये का कर्ज है और मार्च में बनी सहमति के विपरीत कंपनी को कर्जदाताओं से परिचालन के लिए जरूरी ऋण नहीं मिल सका। विमानन कंपनी की हालत निश्चित रूप से बेहद खराब है। बड़े हवाई अड्डों पर उसका बेहतरीन प्रस्थान समय अब या तो दूसरी विमानन सेवाओं को आवंटित हो चुका है या जल्दी ही ऐसा हो जाएगा। 25 मार्च को हिस्सेदारी बेचने और प्राथमिकता वाली फंडिंग की समझौता योजना की घोषणा करने के बाद जेट के कर्जदाताओं का रुख ठंडा क्यों पड़ गया, इसे समझना कठिन नहीं है। पहला, कंपनी की नकदी आवक पर बहुत बुरा असर पड़ा था और दूसरा, सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय रिजर्व बैंक के 12 फरवरी 2018 के सर्कुलर को निरस्त कर दिया जो फंसी परिसंपत्तियों के निपटारे से संबंधित था। निस्तारण योजना उसी सर्कुलर के आधार पर बनी थी। जांच एजेसियों का निशाना बनने की आशंका ने भी बैंकरों का मानस बदलने में भूमिका निभाई होगी। विमानन कंपनी ने 400 करोड़ रुपये की घटी हुई राशि की मांग की, वह भी अव्यवहार्य विकल्प था क्योंकि अधिकांश फंड वेतन और बकाया भुगतान के लिए मांगे गए थे।

 
बैंकों ने कंपनी के प्रवर्तक नरेश गोयल को लंबे समय तक रियायत दी, हालांकि जेट एक ऐसे भंवर में उलझ गई थी जिसका दूर-दूर तक कोई अंत नहीं नजर आ रहा था। वर्ष 2018 के अंत में जेट के देनदारी चूकने के पहले से कुप्रबंधन के संकेत नजर आने लगे थे। विमानन कंपनी निरंतर घाटे और नकदी की तंगी के चलते अपना नियंत्रण गंवा रही थी और जेट के अंकेक्षकों ने भी गत वर्ष अगस्त में उसके बचने को लेकर सवाल उठाए थे। इसके बाद भी बैंकों ने गोयल को स्ट्रैटेजिक निवेशकों के माध्यम से कंपनी को बचाने पर मजबूर नहीं किया। बल्कि उन्होंने खुद को यकीन दिलाया कि वे अपने ऋण को इक्विटी में बदल सकते हैं। यह बात अलग है कि अतीत में ऐसी कोशिशों का हश्र अच्छा नहीं रहा था। बैंकों ने ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालया संहिता का मार्ग अपनाने से भी इनकार कर दिया जबकि वह ऐसी ही स्थितियों के लिए बना है।
 
बैंकों ने गोयल को इतने लंबे अरसे तक रियायत क्यों दी, इसकी वजह ज्ञात नहीं है लेकिन ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि जेट के प्रर्वतक के कई रसूखदार मित्र थे। राजनीतिक शक्तियों को नाराज करने के डर ने भी भूमिका निभाई होगी। शायद उन्हें अंदाजा नहीं होगा कि इससे कितने बड़े पैमाने पर बेरोजगारी आएगी और हवाई किराये में कितना इजाफा होगा। हालंकि यह कहना होगा कि सरकार परिदृश्य से बाहर रही और उसने संकट हल करने का काम बैंकरों और विमानन कंपनी पर छोड़ दिया था। उसने एयरपोर्ट स्लॉट को अस्थायी तौर पर अन्य कंपनियों को देकर भी उथलपुथल को कम किया। फिलहाल जेट के बचने के लिए किसी चमत्कार की आवश्यकता है। निवेशक जुटाना भी आसान नहीं है क्योंकि कंपनी के पास कुछ उड़ान अधिकारों तथा लैंडिंग और पार्किंग के कुछ अधिकारों के सिवा ज्यादा कुछ है नहीं। उसकी ब्रांड वैल्यू भी तेजी से घट रही है। जेट की पूरी कहानी में अहम सबक यही है कि किसी प्रवर्तक को संस्थान से बड़ा नहीं समझना चाहिए। 
Keyword: aviation, flight, airport, jet airways,,
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