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चुनाव घोषणापत्र और बुनियादी क्षेत्र

विनायक चटर्जी /  April 19, 2019

प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में हालांकि कुछ दिशाएं तय की गई हैं लेकिन इसकेलिए धन कहां से आएगा, इस अहम मसले पर ध्यान नहीं दिया गया है। इनका जायजा ले रहे हैं विनायक चटर्जी 

 
देश में बनने वाली नई सरकार से हम बुनियादी ढांचा क्षेत्र में आखिर क्या उम्मीद कर सकते हैं? पार्टियों के चुनाव घोषणापत्रों को पढ़कर इस बारे में कोई ठोस समझ विकसित नहीं की जा सकती है। इनमें पार्टियां बड़े-बड़े वादे करती हैं और आम आदमी का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास करती हैं। बावजूद यह देखना सुखद है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस दोनों ने इस क्षेत्र को अहमियत देते हुए अपने-अपने घोषणापत्र में स्थान दिया है। दोनों दलों में केवल भाजपा ऐसा एक दल है जिसने निवेश के आंकड़े देते हुए कहा है कि वह 2024 तक इस क्षेत्र में 10 लाख करोड़ रुपये का निवेश कर सकती है। पार्टी ने अगले पांच वर्ष में 60,000 किमी अतिरिक्त राष्टï्रीय राजमार्ग बनाने का वादा किया है। रेलवे में उसने वादा किया है कि पटरियों को पूरी तरह ब्रॉड गेज में बदला जाएगा और मौजूदा रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण किया जाएगा। सन 2022 तक समर्पित फ्रेट कॉरिडोर का काम पूरा करने की बात भी कही गई। पार्टी ने 2022 तक हरेक ग्राम सभा को ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोडऩे की बात कही है।
 
भाजपा ने अगली पीढ़ी के बुनियादी ढांचे की बात कही है जिसमें सभी परिवारों को पाइप के माध्यम से गैस और पानी की आपूर्ति, हवाई अड्डïों की संख्या दोगुनी करना और राष्टï्रीय राजमार्गों को सुविधा संपन्न बनाना शामिल है। पार्टी ने नैशनल अर्बन मोबिलिटी मिशन का वादा किया है ताकि सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए तकनीक की मदद से सुविधाएं बढ़ाई जा सकें। कांग्रेस ने भी राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई बढ़ाने और उनके निर्माण की गति तेज करने का वादा किया है। पार्टी ने रेलवे के पुराने पड़ चुके बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने की बात भी कही है। पार्टी ने खुलकर कहा है कि वह स्वच्छ ऊर्जा को लेकर नीति तैयार करेगी और कुल ऊर्जा आपूर्ति में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी में इजाफा करेगी। कांग्रेस ने ऑफ ग्रिड नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में निवेश बढ़ाने का वादा किया है। पार्टी ने कहा है कि इनके स्वामित्व और राजस्व में स्थानीय निकायों का ध्यान रखा जाएगा। पार्टी का कहना है कि लंबी अवधि में उसका इरादा घरों में एलपीजी के स्थान पर बिजली और सौर ऊर्जा की आपूर्ति उपलब्ध कराने का है। संयोग की बात है कि भाजपा ने भी सन 2022 तक नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को मौजूदा स्तर से दोगुना करने की बात कही है।
 
माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने अपने घोषणापत्र में बुनियादी ढांचे को लेकर एक अलग खंड ही समर्पित किया है। भाजपा और कांग्रेस से इतर माकपा के घोषणापत्र में उम्मीद के मुताबिक ही बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका समाप्त करने और निजी-सार्वजनिक साझेदारी की व्यवस्था खत्म करने की बात स्पष्ट रूप से शामिल है। पार्टी का कहना है कि इसके बजाय वह बिजली, संचार, रेलवे, सड़क, बंदरगाह और हवाई अड्डा क्षेत्र में अतिरिक्त आवंटन के साथ बुनियादी क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय बढ़ाने पर जोर देगी।
 
माकपा ने वादा किया है कि पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन अधिनियम 2013 को भूमि अधिग्रहण से संबंधित सभी कानूनों पर लागू किया जाएगा। इतना ही नहीं, पार्टी ने यह भी कहा है कि जनहित की परिभाषा को और अधिक कड़ा बनाया जाएगा। भाजपा ने जहां भूमि अधिग्रहण के बारे में कोई बात नहीं की है वहीं कांग्रेस ने इसका जिक्र तो किया है लेकिन वह इसके ब्योरे में नहीं गई है। उसने केवल यह वादा किया है भूमि अधिग्रहण अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम की विसंगतियों को दूर किया जाएगा और क्रियान्वयन के स्तर पर इन दोनों अधिनियमों की मूल भावना को बहाल किया जाएगा।
 
तृणमूल कांग्रेस ने भी यह वादा किया है कि वह भूमि अधिग्रहण नीति पर नए सिरे से विचार करेगी। पार्टी ने वादा किया है कि सरकार भूमि बैंक का निर्माण करेगी। इस बैंक में केंद्र और राज्य सरकारों के विभागों की जमीन शामिल होगी। वादा यह भी है कि ऐसी जमीन का इस्तेमाल औद्योगिकीकरण और लॉजिस्टिक्स हब के विकास के लिए किया जाएगा। पार्टी ने स्वच्छ ऊर्जा नीति लाने का वादा भी किया है। इन तमाम राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों का प्रमुख संदेश क्या है? पहला, इस बार कोई नया विचार सामने नहीं आया है। केवल भाजपा ने नल से जल कार्यक्रम की सहायता से 2024 तक देश के हर परिवार को पाइप लाइन से पानी उपलब्ध कराने की बात कही है।
 
दूसरा, प्रमुख राष्ट्रीय दलों के वादों की बात करें तो स्वच्छ ऊर्जा, आम परिवारों के उपयोग से जुड़ी चीजें, सूचना एवं डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश, गांवों के विद्युतीकरण और सड़क निर्माण के बारे में जो कुछ कहा है, उसका अनुमान लगाना बेहद आसान है। परंतु बुनियादी ढांचा क्षेत्र को लेकर किसी भी दल की समझ साफ सामने नहीं आ रही। मामला चाहे अधूरी परियोजनाओं का हो, नियामकीय गतिरोध का, नकदी संकट का, बिजली क्षेत्र की चिंताओं का या फिर स्वीकृतियों में हो रही देरी का।  परियोजनाओं को फंडिंग के लिए धन जुटाना और उसे उपलब्ध कराना एक बड़ा मसला है। यह एक गंभीर चुनौती है। सार्वभौमिक आय योजना, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण आदि के वादों ने पहले ही काफी दबाव उत्पन्न कर दिया है। माना यह भी जा रहा है कि कृषि क्षेत्र के संकट को कम करने और सामाजिक योजनाओं (खासकर स्वास्थ्य) आदि की फंडिंग के लिए भी भारी भरकम खर्च किया जाएगा। ऐसे में बुनियादी क्षेत्र पर व्यय के लिए बहुत कम धन रह जाएगा। 
 
भाजपा ने 5 वर्ष में 100 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की बात कही है। यानी हर वर्ष बुनियादी क्षेत्र पर 20 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। सरकार अपने दम पर और तमाम विकास संबंधी फंड के जरिये भी इतना खर्च नहीं कर सकती। यह दूर की कौड़ी है।  चाहे जो भी सरकार सत्ता में आए, देश के विकास के लिए निजी निवेश को तत्काल बढ़ावा देने के अलावा कोई उपाय किसी के पास नहीं है। यह काम निजी-सार्वजनिक निवेश के जरिये किया जाना चाहिए। वाम दलों को यह विचार बिल्कुल पसंद नहीं है जबकि अन्य दलों के पास इसे लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है।
 
नई सरकार के समक्ष पहली चुनौती होगी धन की कमी। इतनी भारी भरकम रकम जुटाना इतना आसान नहीं है। सरकार को निजी-सार्वजनिक निवेश, बिल्ड ऑपरेट ट्रांसफर, आदि मॉडल पर ध्यान देना होगा। इसके अलावा उसे परिसंपत्ति पुनर्चक्रण, उनको बेचकर धन जुटाने जैसी बातों पर भी ध्यान देना होगा। परंतु संभवत: ये मुद्दे आम जनता को लुभाने के लिए बने घोषणापत्र के दायरे से बाहर हैं।
 
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं।)
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress,,
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