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गलत राह

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 19, 2019

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स का कहना है कि लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण में चुनाव मैदान में उतरे 230 प्रत्याशियों (कुल प्रत्याशियों का 14 फीसदी) के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं।  14 प्रत्याशियों ने जानकारी दी है कि उनके खिलाफ अदालती दोषसिद्धि के आदेश हैं और मामला लंबित है जबकि 26 का कहना है कि उनके खिलाफ घृणा फैलाने वाले भाषण देने के मामले हैं। इन परिस्थितियों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से सांसद पद का प्रत्याशी बनाया है। साफ जाहिर है कि पार्टी सामान्य समझ तक को नकारने पर आमादा है। इससे पार्टी ने जो संदेश देने की कोशिश की है, उसकी चौतरफा आलोचना हो रही है।

 
साध्वी को सजा नहीं हुई है और वह स्वास्थ्य संबंधी कारणों से जमानत पर हैं। कानून उन्हें प्रत्याशी बनने से नहीं रोकता लेकिन उनके खिलाफ अदालत ने आरोप तय किए हैं। भाजपा का कहना है कि उन्हें कांग्रेस की हिंदू आतंकवाद जैसी बातों के चलते मैदान में उतारा गया है। परंतु पार्टी यह भूल गई कि मध्य प्रदेश में उसकी ही सरकार ने साध्वी को हत्या के मामले में दो बार गिरफ्तार किया। वह कहती हैं कि उन्हें पुलिस हिरासत में प्रताडि़त किया गया लेकिन हिरासती अत्याचार के मामले में केवल कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में स्थिति स्पष्ट की है। भाजपा इस मसले पर खामोश है।
 
पार्टी प्रत्याशी के रूप में उनका नामांकन भाजपा के हालिया कट्टरपंथी चयन की एक कड़ी भर है। पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जो हिंदू युवा वाहिनी के नेता रहे हैं। अन्य दलों ने भी अतीत में ऐसे चयन किए हैं जिनका बचाव करना मुश्किल है। मनमोहन सिंह ने 2006 में शिबू सोरेन को दोबारा कैबिनेट मंत्री बनाने का अप्रत्याशित निर्णय लिया था जबकि वह हत्या के मामले में जमानत पर रिहा हुए थे। उस वक्त विपक्ष में भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि संप्रग के कार्यकाल में केवल राजनीति ही नहीं बल्कि मंत्रिमंडल का भी अपराधीकरण कर दिया गया है। उस लिहाज से देखें तो अब भाजपा लोकसभा का अपराधीकरण करना चाह रही है। साध्वी को यह कहते बताया गया है कि आतंकवादियों और कांग्रेस नेताओं को खत्म कर राख में बदल दिया जाएगा। क्या देश संसद में ऐसी बातें सुनना चाहता है?
 
कहा जाता है कि विफलता से ज्यादा सफलता किसी व्यक्ति के बारे में बताती है? विपक्ष में रहते हुए भाजपा कानून-व्यवस्था की बात करती थी लेकिन अब वह ऐसे समूहों और लोगों के साथ खड़ी है जो मुस्लिमों पर हमले करते हैं। उसके नेता जो एक वक्त अपनी संयमित भाषा के लिए जाने जाते थे, अब वे मतदाताओं को धमकाते और विभाजनकारी बातें करते पाए जाते हैं। वह 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' के खिलाफ जिस 'वास्तविक' धर्मनिरपेक्षता की बात करती है, वह उसके ही कदमों से उजागर हो जाती है और हमें हिंदू राष्ट्र जैसी बातें सुनने को मिलती हैं। 
 
विपक्ष में रहते हुए पार्टी स्वायत्त निकायों, संवैधानिक पदों पर कांग्रेस समर्थकों की नियुक्ति और सरकार के जांच अधिकारों के दुरुपयोग की उचित आलोचना करती थी। परंतु अब वही काम भाजपा कर रही है। लालकृष्ण आडवाणी ने प्रसार भारती को स्वतंत्र प्रसारण निकाय के रूप में देखा था लेकिन वह सरकार का भोंपू बन चुका है। कर तथा तमाम अन्य छापे भी एकतरफा हैं। भाजपा इकलौता ऐसा दल नहीं है जो सार्वजनिक बहस को भद्दा बना रहा हो। राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री को 'चोर' कहते हैं जो स्पष्ट रूप से असंसदीय है। उन्होंने नरेंद्र मोदी को 'डरपोक' कहा जो अपने आप में हास्यास्पद और बचकानी बात है। अन्य विपक्षी नेता भी कतई अलग नहीं हैं: मायावती, आजम खान और अन्य नेताओं ने भी संयम की लकीर पार की है। परंतु भाजपा वह दल है जिसने इन चुनावों को दुर्भाग्यपूर्ण स्वर दिया है।
 
देश की राजनीति में एक नए दल के रूप में उसे राजनीतिक आचरण और बहस में सुधार करना चाहिए था लेकिन इसके बजाय उसने प्रज्ञा ठाकुर को प्रत्याशी बना दिया। हिंदुत्व को लेकर कोई कुछ भी विचार रखता हो लेकिन पार्टी के शब्द और उसके कर्म यही बताते हैं कि पार्टी उस राह पर तो नहीं चल रही है।
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