बिजनेस स्टैंडर्ड - खाद्य आपूर्ति शृंखला की समस्याएं दूर करने में लगा वे-कूल
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खाद्य आपूर्ति शृंखला की समस्याएं दूर करने में लगा वे-कूल

रंजू सरकार /  April 19, 2019

तमिलनाडु के होसूर जिले के एक गांव में रहने वाले मणिकांतन एक सीमांत किसान हैं। पहले वह गांव के दूसरे किसानों की तरह पूरे खेत में टमाटर, भिंडी जैसी कोई एक ही सब्जी उगाते थे। लेकिन इन दिनों उन्होंने अपने दो एकड़ के खेत को चार हिस्सों में बांट लिया है। एक हिस्से में टमाटर, दूसरे में भिंडी, तीसरे में लौकी लगाने के साथ ही उन्होंने चौथे हिस्से को खाली छोड़ा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब उन्हें सालभर आमदनी होती रहती है।  मणिकांतन के लिए लगातार आमदनी को सुनिश्चित करने में चेन्नई के स्टार्टअप वे-कूल ने काफी मदद की। यह कंपनी किसानों को खेती संबंधी बेहतर योजनाएं तैयार करने मदद करती है। स्टार्टअप ने हाल ही में एलजीटी इंपेक्ट और हालिया निवेशक अस्पाडा के नेतृत्व में चले फंडिंग दौर में 120 करोड़ रुपये जुटाए हैं। वे-कूल कंपनी 25 किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के जरिये 35,000 किसानों से फल, सब्जियां, स्टेपल्स और दूध लेती है। 

 
कंपनी ऐप के जरिये अपनी मांग के  बारे में बताती है और एफपीओ किसानों की आपूर्ति पर ध्यान देती है। किसान अपनी फसल की मात्रा तथा कीमत के लिए बोलियां लगाती हैं। इस तरह कंपनी मांग और आपूर्ति के बीच बेहतर संबंध स्थापित कर रही है। किसान अपने उत्पाद एफपीओ केंद्र लेकर जाते हैं जहां उनकी गुणवत्ता और वजन की जांच होती है। इसके बाद इन्हें कंपनी के ट्रक की मदद से चेन्नई और बेंगलूरु के वितरण केंद्र ले जाया जाता है। इन उत्पादों को किराना दुकानें, खुदरा चेन (मांग का 20 प्रतिशत) और होटल-रेस्टोरेंट (30 प्रतिशत) को बेचा जाता है। 
 
वे-कूल को फूड डेवलपमेंट और वितरण कंपनी कहा जा सकता है। कंपनी का दावा है कि इस मॉडल में कमीशन हटने, लॉजिस्टिक लागत कम होने, मंडी जाने से राहत मिलने आदि कदम से किसानों की आय में 25-40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। साथ ही किसानों को बाजार में बदलती कीमतों के विपरीत एक निश्चित आय मिलती है। इस समय कंपनी 20 प्रतिशत महीने की दर से आगे बढ़ रही है और फरवरी में उसने 30 करोड़ रुपये के कारोबार को पार कर लिया था। वे-कूल में शुरुआती निवेश करने वाली कंपनी अस्पाडा के मैनेजिंग पार्टनर कार्तिक श्रीवत्स कहते हैं, 'वे-कूल की निष्पादन क्षमता ने हमें काफी प्रभावित किया।  इसमेंं तेजी से वृद्धि करने की क्षमता है और बाजार में चुनौतियां होने के बावजूद तकनीकी उन्नयन के जरिये बेहतर आपूर्ति शृंखला तैयार कर रही है। पिछले दौर की फंडिंग के बाद कंपनी ने 20 गुना वृद्धि की है।' वे-कूल ने अप्रैल 2017 में अस्पाना से 27 लाख डॉलर जुटाए थे। स्टार्टअप में कम वित्त में तेजी से आगे बढऩे की क्षमता मौजूद है। 
 
इसी तरह की दूसरी कंपनियां, जैसे निंजाकार्ट और एग्रोस्टार ने भी क्रमश: 6 करोड़ डॉलर और 2.5-3 करोड़ डॉलर की राशि जुटाई है। वे-कूल नई क्षमताओं को विकसित करने के लिए विभिन्न कंपनियों के अधिग्रहण की योजना बना रही है और अधिक से अधिक उत्पाद पहुंच सुनिश्चित करना चाहती है। 
 
शुरुआत और विचार 
 
जब संजय दसारी साल 2015 की गर्मियों में स्नातक शिक्षा पूरी करके अमेरिका से वापस आए तो वह चेन्नई में एक कोरियाई रेस्टोरेंट खोलना चाहते थे। उन्होंने एक शेफ खोजा और सामान विक्रेताओं से बात करनी शुरू की। एक बड़े सब्जी विक्रेता के कार्यालय में बैठे हुए उन्होंने देखा कि गंदे फर्श पर पड़ी गोभी के पास ही एक कुत्ता पेशाब कर रहा था। वह विक्रेता बड़े होटलों तक सामान की आपूर्ति करता है और जब दसारी ने इस बारे में पूछा तो जवाब आया कि यह तो ऐसे ही रहता है।  इस घटना के बाद दसारी को अहसास हुआ कि अगर वह साफ-सुथरे सामान की आपूर्ति करें तो यह एक बड़ा बाजार हो सकता है। होटल और रेस्टोरेंट इस मुहिम से धीरे धीरे जुड़े लेकिन वे अधिक कीमत देने के लिए तैयार नहीं थे। कंपनी ने जून 2016 में बिजनेस-टू-बिजनेस (बी2बी) मॉडल अपनाया, छह महीनों के भीतर किसानों से सामान लेना शुरू किया और जून 2017 में स्टेपल्स तथा नवंबर 2018 में दूध भी शामिल कर लिया। अशोक लीलैंड के पूर्व प्रबंध निदेश विनोद दसारी के बेटे और शुरुआती निवेशक संजय कहते हैं, 'हम इन सब का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे थे और हमारा प्रयास अधिक से अधिक उत्पादों को आपूर्ति शृंखला में जोडऩा है।'
 
25 वर्षीय संजय कहते हैं, 'हम सर्वाधिक खरीदारी वाले सामानों की श्रेणी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं और स्रोत के तौर पर बेहतर पहचान स्थापित करने में प्रयासरत हैं।' इसके लिए कंपनी ने स्वचलित आपूर्ति शृंखला विकसित करने पर काफी काम किया और इसके साथ ही 150 ट्रक खरीदे हैं। खेत में अलग अलग आकार के टमाटर होते हैं और इसे ग्राहक के स्तर पर विविधीकृत किया जाता है। जैसे, घरों में मध्यम आकार के टमाटर की मांग होती है और ये किराना में भेजे जाते हैं तो वहीं होटल बड़े आकार के टमाटर की मांग करते हैं। सॉस बनाने वाली इकाइयों को छोटे टमाटर की आपूर्ति की जाती है। 
 
विस्तार 
 
कृषि क्षेत्र में बहुत से स्टार्टअप सक्रिय हैं जिन्हें उत्पादन, वितरण और उपभोग जैसी बड़ी श्रेणियों में बांटा जा सकता है। क्रॉपइन उत्पादन के क्षेत्र में बेहतरीन काम कर रही है, एग्रोस्टार और निंजाकार्ट वितरण के क्षेत्र में कारगर दिख रही हैं तो क्राउफार्म उपभोग में हाथ आजमा रही है। वे-कूल स्वयं को खाद्य विकास एवं वितरण कंपनी की तरह देखती है। इसलिए, वह किसानों को मृदा उपजाऊपन (एनपीके), खेती के तरीके और सलाहकार की तरह मदद करती है। कंपनी पार्टनर फार्मिंग कार्यक्रम चलाती है और एफपीओ के साथ मिलकर काम करती है। वे-कूल अपने उत्पाद का 78 प्रतिशत 2 एकड़ से कम जोत वाले छोटे और मझोले किसानों से खरीदती है। 
 
आगे की राह
 
कंपनी अपनी क्षमता दोगुनी कर रोजाना 300 टन करना चाहती है और उसका अंतत: लक्ष्य 1,000/1,500 टन प्रतिदिन पर पहुंचना है। उद्योग सूत्रों का कहना है कि निंजाकार्ट की क्षमता फिलहाल 200-250 टन रोजाना है। कंपनी फल की बिक्री भी करती है और इसके चलते वे-कूल औसतन 40-45 रुपये प्रति किलो की कीमत ले लेती है जबकि प्याज, टमामट और आलू की बिक्री वाली कंपनियों को औसतन 20-25 रुपये किलो की कीमत मिलती है। वे-कूल परिचालन के स्तर पर लाभ का दावा करती है और उसे जून/जुलाई तक एबिटडा-सकारात्मक की आशा है। हालांकि इस विस्तार की राह में उचित कौशल की खोज और सही कीमत मिलना चुनौतिपूर्ण होगा। 
Keyword: agri, farmer, crop, way cool, food,,
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