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छोटे किसानों के लिए उम्मीद की किरण बनते एफपीओ

संजीव मुखर्जी /  April 19, 2019

आदिवासी पुरुष और महिलाएं वर्षों से जंगलों से शरीफा एकत्रित करते थे और उसे उदयपुर-अहमदाबाद राजमार्ग पर 2-3 रुपये प्रति किलो के मामूली भाव पर बेचते थे। इनमें से अधिकांश लोगों का संबंध राजस्थान के पाली जिले की गरासिया जनजाति से है। भले ही ये लोग मामूली दाम पर शरीफा बेचते थे लेकिन आसपास के शहरों और कस्बों में यह बहुत महंगा बिकता था। लेकिन यह फायदा उन लोगों को नहीं मिलता था जो इस फल को जंगलों से इक_ा करते थे। इसकी वजह यह है कि आसपास के संग्रह केंद्रों में उनकी उपज के प्रसंस्करण और भंडारण की कोई व्यवस्था नहीं थी। शरीफा का गूदा तो और भी ज्यादा कीमती होता है।  

 
लेकिन 2015 के आसपास चीजें बदलनी शुरू हो गई जब पाली जिले के आसपास के गांवों की आदिवासी महिलाओं ने एक किसान उत्पादक कंपनी (एफपीओ) का गठन किया और गूदा निकालने के लिए एक प्रसंस्करण इकाई शुरू की। साथ ही उन्होंने ग्रामीण स्तर पर संग्रहण केंद्र भी बनाए। धीरे-धीरे उनका कारोबार बढ़ा और आज के समय में घूमर महिला प्रोड्यूसर नामक यह कंपनी कई राज्यों में आइसक्रीम बनाने वाली बड़ी कंपनियों, मिठाई की दुकानों और स्क्वैश एवं जैम बनाने वाली कंपनियों को शरीफे का गूदा बेचती है। 
 
पाली और उसके आसपास के गांवों की आदिवासी महिलाओं को पहले अपनी उपज एक-दो रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचनी पड़ती थी लेकिन अब उन्हें इसके लिए 10-12 रुपये मिलते हैं। सबसे अहम बात यह है कि अपनी उपज को बेचने के लिए उन्हें राजमार्ग के किनारे खड़े होकर खरीदार का घंटों तक इंतजार नहीं करना पड़ता है।  घूमर महिला प्रोड्यूसर कंपनी के पास करीब 1,600 शेयरधारक हैं जो मात्र 1,000 रुपये की मामूली शेयर पूंजी के साथ कंपनी के सदस्य बने हैं। यह महिलाओं द्वारा संचालित सफल कंपनियों में शुमार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब कुछ दिन पहले महिला उद्यमियों के साथ चर्चा की थी तो उसमें इस कंपनी के कामकाज का भी जिक्र हुआ था। पहले ही साल कंपनी ने 10 टन शरीफे का प्रसंस्करण किया था और 2018-19 में इस कंपनी ने 100 टन शरीफे का प्रसंस्करण किया और गूदा निकाला। शरीफे के संग्रह, उन्हें अलग करने, छांटने, प्रसंस्करण और यहां तक कि मार्केटिंग का काम भी आदिवासी महिलाएं ही करती हैं। 
 
इसी तरह पाली से करीब 900 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के डोडी गांव में भी 39 साल के किसान बिरजू लाल पर्ते की किस्मत बदली है। पिछले दो-तीन साल से वह आठ एकड़ में होने वाली मक्के की पैदावार को मां माचना क्रॉप प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के जरिये बेच रहे हैं। इस एफपीओ का नाम स्थानीय नदी के नाम पर रखा गया है। इससे बिरजू को खेती के लिए जरूरी साजोसामान बाजार से कम कीमत पर मिला। साथ ही कंपनी ने बिरजू की पूरी फसल खरीद ली और उसे पंजाब और हरियाणा में पोल्ट्री कंपनियों को बेच दिया। इन राज्यों में मुर्गियों के चारे के रूप में मक्के का खूब इस्तेमाल होता है।
 
बिरजू कहते हैं कि ज्यादा उत्पादन और कम मांग के कारण अधिकांश फसलों की कीमत गिरने के इस मुश्किल दौर में भी एफपीओ का हिस्सा बनने से उनकी रोजी-रोटी ठीक से चल पा रही है। मां माचना कंपनी के युवा मुख्य कार्याधिकारी अमित कुमार द्विवेदी कहते हैं, 'पहले हमने पानी और कृषि संबंधी परियोजनाओं के मुद्दे पर गांववालों के साथ काम करना शुरू किया और जब बहुत सारे लोग हमसे जुड़ गए तो हमने एक एफपीओ बनाने की कोशिश की। इससे किसानों को बाजार से जुडऩे में मदद मिलती है।'
 
बैतूल जिले की शाहपुर मंडी के पास अपने कार्यालय में बैठे अमित ने कहा कि उनके प्रयासों और किसानों की सामूहिक ताकत से करीब 18 साल पहले बंद हुई स्थानीय मंडी में फिर से कामकाज शुरू किया जा सका है।  भारत में किसानों की उपज की बिक्री करने वाली कंपनी बनाने की मुहिम छोटे स्तर पर शुरू हुई थी लेकिन आज यह संख्या करीब 4,000 तक जा पहुंची है। इनमें से करीब 2,000 एफपीओ को राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने प्रमोट किया है। इनमें से अधिकांश का गठन भारतीय कंपनी कानून, 2013 के विशेष प्रावधानों के तहत किसान-उत्पादक कंपनी (एफपीसी) के तौर पर किया गया है। 
 
एफपीओ करीब एक दशक पहले अस्तित्व में आए थे लेकिन 2013 में इन्हें उस समय बल मिला जब कृषि विभाग ने उनके लिए राष्ट्रीय नीति और दिशानिर्देश जारी किए। उन्हें एक संस्थागत प्रारूप के रूप में मान्यता दी गई जिनके जरिये किसानों को संगठित किया जा सकता है और उनकी क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इसके बाद 2013-14 में संप्रग सरकार ने एफपीओ के लिए स्मॉल फार्मर्स एग्रीबिजनेस कंसोर्टियम (एसएफएसी ) में 1,000 करोड़ रुपये के ऋण गारंटी कोष का गठन किया और सभी पंजीकृत एफपीओ को 15 लाख रुपये का अनुदान देने की घोषणा की। एफपीओ को दूसरा बड़ा मौका 2015 में मिला जब नाबार्ड ने एफपीओ के लिए दिशानिर्देश जारी किए। 
 
मोदी सरकार ने भी 2018-19 के बजट में 100 करोड़ रुपये सालाना कारोबार वाले एफपीओ को पहले पांच साल तक कर छूट देने की घोषणा की। तब तक एफपीओ पर 30 फीसदी कर लगाया जाता था। इस सारे उपायों के बावजूद एफपीओ अब भी सहकारी संघों की जगह नहीं ले पाए हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि इसमें आसान वित्त समाधान की कमी है, उन्हें मंडियों में कामकाज की अनुमति नहीं है और उनके विकास के लिए उचित दिशानिर्देश नहीं हैं। एफपीओ की नोडल एजेंसी एसएफएसी के प्रबंध निदेशक नील कमल दरबारी कहते हैं, 'एफपीओ और उनकी वित्तीय जरूरतों को लेकर शीर्ष बैंक प्रबंधन में व्यापक समझ है लेकिन मध्यम एवं निम्न स्तर पर जानकारी का अभाव होने से ऋण सुविधाएं देने का कामकाज बाधित हो रहा है।'
 
एफपीओ के संवद्र्घन के लिए काम कर रहे संगठन एक्शन फॉर सोशल एडवांसमेंट (एएसए) के निदेशक आशीष मंडल ने कहा कि अगर कोई प्रभावशाली व्यक्ति या संगठन एफपीओ की लड़ाई नहीं लड़ता है तो इसे स्थापित होने में बहुत समय लगेगा। लेकिन वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों का मानना है कि एफपीओ को खरीद में शामिल करने से उनकी भूमिका प्रभावित हो सकती है।  कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'मैं मानता हूं कि खरीद का काम बेहद आकर्षक है लेकिन इससे वे अपने असली मकसद से भटक सकते हैं।'
Keyword: agri, farmer, crop, monsoon, FPO, mandi,,
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