बिजनेस स्टैंडर्ड - कपड़ा निर्यात में सुधार के आसार
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कपड़ा निर्यात में सुधार के आसार

टीई नरसिम्हन / चेन्नई April 18, 2019

कपड़ा और तैयार परिधान निर्यात खंड में पांच सालों के खराब प्रदर्शन के बाद अब कुछ सुधार नजर आ सकता है बशर्ते निर्यातक इसके लिए चुनौती स्वीकार करने को तैयार हों। उद्योग का कहना है कि देश के कपड़ा उद्योग में प्रतिस्पर्धा की कमी, अन्य कारोबारी मसलों के साथ-साथ खरीदारों की आरे से कुछ जरूरी शर्तों को पूरा किए जाने पर जोर दिया जाना इस गिरावट के कारण रहे हैं। इस संबंध में उद्योग के एक बड़े हिस्से ने अब कमर कसनी शुरू कर दी है। निर्यात के खराब प्रदर्शन के इस रुख को बदला जा सकता है और इसमें सुधार की संभावना है बशर्ते उत्पादों में विविधता हो, ऑर्डर तेजी से पूरे किए जाएं और अनुपालन में सुधार हो। भारत से तैयार परिधान के निर्यात पर दबाव रहा है। 2018-19 में निर्यात 3.46 प्रतिशत घटकर 16.37 अरब डॉलर रह गया जो पिछले साल 16.714 अरब डॉलर था। प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत के वस्त्र 10-15 प्रतिशत महंगे थे। भारतीय निर्यातकों के पास विकल्पों की कमी रही है जिसने हालात बद से बदतर कर दिए। पिछले पांच वर्षों के राजग शासन के दौरान 18-19 का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। कपड़ा और परिधान क्षेत्र 4.5 करोड़ प्रत्यक्ष रोजगार और दो करोड़ अप्रत्यक्ष रोजगार देने वाला प्रमुख क्षेत्र है और यह सूक्ष्म, लघु एवं मध्य उद्यमों की भी मदद करता है।

 
दूसरी तरफ 2018-19 में वियतनाम से निर्यात में 11.19 प्रतिशत का इजाफा हुआ और बांग्लादेश से निर्यात (मार्च में समाप्त होने वाले नौ महीने में) 13.7 प्रतिशत तक बढ़कर 25.95 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। इससे पता चलता है कि भारतीय निर्यातकों के साथ दिक्कत है। केयर रेटिंग्स का कहना है कि बांग्लादेश, श्रीलंका, वियतनाम में उत्पादन लागत कम है और वहां के निर्यातकों को प्रमुख बाजारों में तरजीही शुल्क का फायदा मिलता है। इससे भी भारत का निर्यात कम आकर्षक रहा।
 
3.72 अरब डॉलर के निटवेयर निर्यात का प्रतिनिधित्व करने वाली तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (टीईए) के अनुसार जीएसटी के तहत प्रोत्साहनों में लगभग सात प्रतिशत की कमी आई। इनसे पहले निर्यातकों की प्रतिस्पर्धी क्षमता में मदद मिल रही थी। जीएसटी लागू होने के बाद ये प्रोत्साहन वापस ले लिए गए थे। भारतीय निर्यातकों को अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों में बांग्लादेश, वियतनाम और पाकिस्तान जैसे अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में अधिक व्यापारिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। यूरोपीय संघ में भारत को कपड़ा उत्पादों पर औसतन 5.9 प्रतिशत शुल्क का सामना करना पड़ता है और अमेरिका में यह 6.2 प्रतिशत है जबकि बांग्लादेश के लिए यह शून्य प्रतिशत और 3.9 प्रतिशत है। अमेरिका और यूरोपीय संघ दुनिया के सबसे बड़े वस्त्र आयातक हैं। कुल वैश्विक आयात में इनका योगदान 60 प्रतिशत रहता है।
 
वित्त वर्ष 2018 के दौरान कर्मचारियों की लागत लगातार बढ़ते हुए 13 प्रतिशत हो गई है जो 2010 में नौ प्रतिशत थी जबकि अन्य देशों में यह या तो स्थिर रही या फिर इसमें मामूली वृद्धि हुई। निर्यातकों को लगता है कि वे बांग्लादेश और वियतनाम के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। ये निर्यातक अब अपने बाजारों का रुख जापान, इजराइल, दक्षिण अफ्रीका, हॉन्गकॉन्ग और अन्य देशों की ओर करके विविधता लाने पर ध्यान केंद्रीत कर रहे हैं। हालांकि एक बड़े कॉरपोरेट निर्यातक के अनुसार वैश्विक बाजारों में आपूर्ति को बेहतर बनाने और निर्यात बढ़ाने के लिए उद्योग को केवल सूती कैजुअल परिधान पर निर्भरता को कम करना होगा।
 
मुंबई मुख्यालय वाली क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष राहुल मेहता का कहना है कि भारत के पास मानव निर्मित फाइबर (एमएमएफ) या पॉलिएस्टर पर आधारित कपड़ों में प्रतिस्पर्धी क्षमता नहीं है और न ही इसके पास सर्दी में पहनने वाले और खेलों के परिधान आदि की क्षमता है। औपचारिक कपड़ों के मामले में वैश्विक कारोबार का प्रमुख हिस्सा कमीज, सूट, जैकेट, ऊनी कपड़े, चमड़े के परिधान, सर्दी में पहने जाने वाले परिधान और विशेष प्रदर्शन वाले परिधान के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी नहीं है। भारत मुख्य रूप से गर्मियों और कैजुअल परिधान के निर्यात पर ही निर्भर करता है जिसमें सूती कमीज और टी-शर्ट, सूती ब्लाउज शामिल रहते हैं।
Keyword: textiles, cotton, cloths, export,,
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