बिजनेस स्टैंडर्ड - तमाम सरकारों ने संपन्न और मध्य वर्ग को ही लाभ पहुंचाया
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तमाम सरकारों ने संपन्न और मध्य वर्ग को ही लाभ पहुंचाया

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  April 18, 2019

करदाताओं के पैसे से गठित बुनियादी ढांचा निवेश फंड नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड (एनआईआईएफ) जमीन पर आई निजी एयरलाइन जेट एयरवेज के लिए बोली लगाने के बारे में सोच रहा है। हमें ध्यान रखना होगा कि आबादी का बहुत छोटा-सा हिस्सा ही हवाई यात्रा करता है। वहीं करोड़ों लोगों के इस्तेमाल में आने वाले रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास के लिए फंड का इंतजाम भी नहीं हो पा रहा है। भारत में अक्सर डॉक्टर जटिलतम मामलों में भी सफल सर्जरी और अत्याधुनिक इलाज के लिए सुर्खियां बनाते रहते हैं जिससे भारत आज गंभीर रोगों के किफायती इलाज के लिए बेहतरीन स्थल बनता जा रहा है। लेकिन एक आम भारतीय के लिए माकूल इलाज करा पाना अब भी काफी मुश्किल है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रति 11,000 आबादी पर एक एलोपैथी डॉक्टर है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुशंसित अनुपात इसका दस गुना है। बिहार में तो 28,000 की आबादी पर एक ही डॉक्टर है। जहां तक अस्पतालों में उपलब्ध बिस्तरों का सवाल है तो प्रति हजार आबादी पर एक से भी कम बिस्तर है जबकि डब्ल्यूएचओ की अनुशंसा एक हजार आबादी पर पांच बिस्तरों की है।

 
भारत में विश्व स्तरीय इंजीनियरिंग एवं प्रबंध संस्थान मौजूद हैं जहां से पढ़कर निकलने वाले युवाओं को वैश्विक मानकों के हिसाब से वेतन मिल रहे हैं। लेकिन देश में प्राथमिक शिक्षा दे रहे सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता इतनी खराब है कि 'प्रथम' की तरफ से शैक्षणिक स्तर पर जारी सालाना रिपोर्ट के मुताबिक आठवीं कक्षा के 27 फीसदी छात्र दूसरी कक्षा की किताबें भी ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं। तथ्य यह है कि प्रथम इस स्तर को भी पिछले वर्षों की तुलना में सुधरी हुई स्थिति बताता है। यह देश में सरकारी स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा की नाकामी का सूचक है।
 
ऐसे में बड़ी तस्वीर यही उभरती है कि उदारीकरण के बाद का भारत अपने मध्य एवं उच्च-मध्य वर्ग और समृद्ध लोगों के लिए ही काम करता नजर आ रहा है। गरीबों के लिए वह कुछ खास करता नहीं दिख रहा। ये सभी तथ्य जाने-पहचाने सच हैं लेकिन चुनावों के समय इनका सार्वजनिक विमर्श पर प्रच्छन्न प्रभाव देखा जाता है। यह विडंबना ही है कि वर्ष 1991 के बाद गरीबी के स्तर में आई नाटकीय गिरावट के बावजूद बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच में ऐसी गहरी असमानता तमाम सत्तारूढ़ सरकारों के बीच रोचक ढंग से एक जैसी रही है। 
 
इसी से हमें पता चलता है कि न्यूनतम आय योजना, मनरेगा, जन-धन, उज्ज्वला और आयुष्मान भारत जैसी लोक-लुभावन योजनाओं का साल-दर-साल इतना राजनीतिक आकर्षण क्यों बिढ़ता जा रहा है? राजनीतिक विचारधारा से इतर सार्वजनिक नीति में ऐसी सामूहिक दुर्बलता का होना एक पहेली की तरह है। यह सुविदित है कि मध्य वर्ग और संपन्न लोगों की तुलना में गरीब मतदाता बड़ी संख्या में मतदान करने के लिए बाहर निकलते हैं। साफ तौर पर कहें तो भारत के लिए विमानन, ऑटोमोबाइल, खुदरा, अस्पताल, दूरसंचार, आईटी सेवा और आवासीय क्षेत्र में वैश्विक मानकों की बराबरी नहीं कर पाने की कोई वजह नहीं है। इन सभी क्षेत्रों ने रोजगार पैदा करने के मोर्चे पर अपनी-अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। सुरक्षा एवं इमारतों की देखभाल से संबंधित क्षेत्र में 'चौकीदार' की मांग भी खूब बढ़ी है। समस्या यह है कि नीतियों की प्राथमिकता इतनी एकांगी रही है कि आर्थिक सुधारों के फल समान रूप से वितरित होने के बजाय शीर्ष-से-नीचे आते रहे हैं। ऐसा होने से अवसरों की असमानता बढ़ी है जिसके चलते भारत चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की बराबरी कर पाने में पीछे रह गया है। यह देखना आसान है कि आखिर क्यों हमने एयरपोर्ट, एयरलाइन, दूरसंचार और चिकित्सा देखभाल में निवेश को प्रोत्साहन देने पर जोर दिया। इस तरह के क्षेत्रों के लिए भारतीय समाज के उस तबके की सहमति मिलती है जो दावोस बैठक में शामिल होता है। इससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों को यह संदेश भी दे दिया जाता है कि भारत कारोबार के लिए खुला बाजार है। चीन हमें यह सिखा चुका है कि आला दर्जे के एयरपोर्ट से बेहतर संदेश देने वाला कुछ नहीं है। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य एवं शिक्षा से जुड़ी परियोजनाओं में पैसा और मेहनत लगाने का उतना असर और नतीजा नहीं नजर आता है।
 
लेकिन गुणवत्तापरक सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और ढांचागत सेवाओं पर कम ध्यान देने और उसकी जगह इन सेवाओं में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने का व्यावहारिक एवं सामाजिक दोनों संदर्भों में विपरीत असर होता है। वर्ष 2000 से लेकर 2008 के बीच अर्थव्यवस्था की तेजी का दौर रहा था। इस दौरान भारतीय कंपनियों को कुशल श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ा था। हालांकि इसका नतीजा यह हुआ कि कर्मचारियों का वेतन भी बढ़ गया। लेकिन अर्थव्यवस्था में सुस्ती आने और नोटबंदी जैसे व्यवस्थागत आघातों की स्थिति में अशिक्षित एवं कम-कुशल कामगारों को बड़ी संख्या में नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
 
सार्वजनिक सेवाओं को नजरअंदाज किए जाने एवं उनमें आए ह्रास ने भी समाज का विभाजन करने में एक प्रच्छन्न भूमिका निभाई है। अच्छी कमाई करने वाले लोग सार्वजनिक परिवहन, ट्रेन, सरकारी अस्पतालों और स्कूलों का इस्तेमाल करने से बचने लगते हैं जिससे ये सार्वजनिक सेवाएं और भी बदहाल होती जाती हैं। कोई भी पक्का पूंजीवादी यह जानता है कि थोड़ी-बहुत असमानता समाज के भीतर आकांक्षा का भाव जगाने में मददगार होती है लेकिन जब नजरअंदाज करने वाली नीतियों के चलते उन आकांक्षाओं को पूरा करने के अवसर सीमित होने लगते हैं तो फिर समाज का ढांचा ध्रुवीकृत होने लगता है। इस समाज में जाति एवं धर्म की सदियों पुरानी पहचान ही उन लोगों की प्रगति की इकलौती प्रोत्साहक हो जाती है।
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