बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी की विदेश नीति क्या खोया क्या पाया?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, May 24, 2019 05:22 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

मोदी की विदेश नीति क्या खोया क्या पाया?

श्याम सरन /  April 18, 2019

आम चुनाव में कुछ ही दिन बचे हैं। ऐसे में मोदी सरकार की विदेश नीति की सफलता और उसकी नाकामी के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं श्याम सरन 

 
देश इस समय उन्मत्त चुनावी कवायद में उलझा हुआ है लेकिन विदेश नीति एक ऐसा विषय है जो शायद ही कभी मतदाताओं की कल्पनाशीलता को जगाता हो।  पाकिस्तान के साथ रिश्तों की बात अपवाद अवश्य हो सकती है लेकिन अतीत में कभी भी यह साबित नहीं हुआ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भी वोट जुटाया जा सकते हैं। यही बात बालाकोट घटना पर भी लागू होती है जहां सत्ताधारी दल ने घटना को गहरे राष्ट्रवादी रंग में रंगने की कोशिश की लेकिन वह बहुत तेजी से फीका पड़ रहा है। पहले कुछ अन्य चुनावों की तरह ही इस बार भी चुनाव प्राथमिक तौर पर घरेलू मुद्दों से ही निर्धारित होंगे। हालांकि विदेश नीति भी चर्चा का विषय है। विदेशी नीति के  मुद्दों को लेकर पार्टियों का रुख अलग-अलग हो सकता है। नेतृत्व शैली अलग हो सकती है और अतीत से कुछ अलग रुख देखने को मिल सकता है। परंतु देश के बाहरी रिश्तों में मोदी के पिछले पांच साल के कार्यकाल में कोई व्यापक बदलाव नहीं आया है। आने वाली सरकार चाहे जिस राजनीतिक विचारधारा की हो, उनमें आने वाले समय में भी कोई बदलाव आता नहीं दिखता। 
 
सवाल यह है कि विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी सरकार के प्रदर्शन को किस प्रकार आंका जाए? यहां तीन अलग-अलग विशेषताएं हैं जो दिमाग में आती हैं।  पहली बात, मोदी ने व्यक्तिगत कूटनीति के मूल्य में बहुत अधिक यकीन दिखाया है और तमाम मुद्दों को हल करने में उन्होंने नेताओं के बीच व्यक्तिगत संपर्क को तवज्जो दी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ उनके रिश्तों ने भारत और अमेरिका के रिश्तों को मजबूत करने और उन्हें विस्तार देने में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के बीच जो सकारात्मक और सुस्पष्ट रिश्ता है, उसने दोनों देशों के रिश्तों को अप्रत्याशित ऊंचाई प्रदान की है। परंतु यह दलील दी जा सकती है कि मोदी उन अहम कारकों का फायदा उठा रहे थे जो पहले ही अमेरिका और जापान को भारत के करीब ला रहे थे। चीन का उभार भी इसमें एक प्रमुख कारकथा। मोदी को ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ रिश्तों में कोई बहुत अधिक कामयाबी नहीं मिली। मिसाल के तौर पर गत वर्ष जून में वुहान शिखर बैठक में भी चीन ने भारत की वास्तविक चिंताओं को कुछ खास तवज्जो नहीं दी। अगर रिश्तों को सकारात्मक दिशा में ले जाने वाले कुछ कारक पहले से मौजूद हों तो व्यक्तिगत कूटनीति एक अतिरिक्त कारक साबित हो सकती है। परंतु नकारात्मक तत्वों के दौर में इनका प्रभाव कमतर साबित होता है। अगर नेताओं के प्रगाढ़ रिश्तों के बावजूद बाद में उचित फॉलोअप न लिया जाए तो रिश्ते कमजोर साबित होते हैं। हमारे देश में यह कमजोरी निरंतर बनी हुई है। 
 
दूसरा, मोदी ने विदेश नीति में प्रवासी भारतीयों का कदम मजबूत किया है। उन्होंने पिछली सरकारों से ज्यादा पहल की हैं। उन्होंने कई देशों के भारतीय समुदायों तक पहुंच बनाई और अपना घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कद मजबूत किया। इसका फायदा भाजपा को राजनीतिक फंडिंग के रूप में मिला और मोदी की छवि मजबूत हुई परंतु देश के विकास में प्रवासियों के योगदान में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई। इसके उलट चीन के प्रवासी समुदाय ने अपने देश के लिए काफी कुछ किया है। राष्ट्रीय नजरिये से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि समय और ऊर्जा की जो खपत की गई, क्या वह उपयोगी साबित हुई?
 
तीसरा, मोदी हाल के वर्षों में पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने खुले दिल से विदेशी निवेश का स्वागत किया है। अपनी हर विदेशी यात्रा में उन्होंने विदेशी पूंजी जुटाने की बात कही। उन्हें इसका श्रेय मिलना चाहिए। यह अलग बात है कि भारतीय बाजार में संभावित विदेशी निवेशकों के लिए चुनौती बरकरार है। सच तो यह है कि भारतीय निवेशक अपने ही देश में निवेश के इच्छुक नहीं दिख रहे। यह कोई अच्छा संकेत नहीं है। नियामकीय और कर संबंधी मुद्दे भी हैं। अहम बात यह है कि नीतिगत अनिश्चितता के बीच प्रधानमंत्री के सकारात्मक संदेश के बावजूद ये चिंताएं कम नहीं हो रहीं। आर्थिक कूटनीति इस सरकार की प्राथमिकता रही है लेकिन नतीजे बहुत सकारात्मक नहीं रहे हैं। इससे लगता है कि ढांचागत और संचालन संबंधी मुद्दों को जल्द हल करने की आवश्यकता है।
 
चौथा, खाड़ी और पश्चिम एशिया में तेजी से बदली जटिल परिस्थितियों का प्रबंधन करने में हमें कामयाबी मिली है। मोदी सरकार एक ओर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तो दूसरी ओर ईरान के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने में लगातार कामयाब रही है। इजरायल के साथ भी हमारे रिश्ते अच्छे हैं। इससे न केवल देश को ऊर्जा सुरक्षा हासिल हुई है बल्कि आतंकवाद के खिलाफ नए सहयोगी भी मिले हैं। उसने ईरान और सीरिया के प्रति नीति बदलने के अमेरिकी दबाव को भी धता बताया। यह पिछली सरकारों का भी लक्ष्य था लेकिन ऐसी कूटनीति पहले देखने को नहीं मिली।
 
हालांकि मोदी की पाकिस्तान नीति ने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिचक में डाल दिया। पाकिस्तान को घरेलू राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश ने विदेश नीति को नुकसान पहुंचाया और समाज में सांप्रदायिक भेदभाव को बढ़ावा दिया। हम पाकिस्तान से इसलिए नहीं निपट पा रहे हैं क्योंकि इसके पीछे घरेलू राजनीतिक कारण हैं। हमारी मानसिकता में पाकिस्तान ने इतना स्थान घेर रखा है कि हम अन्य पड़ोसियों के बारे में नहीं सोच पा रहे हैं। चीन ने हमारे पड़ोस में कहीं अधिक गहरी पकड़ बना ली है। इसके अलावा पाकिस्तान के प्रति बढ़ते शत्रु भाव और तनाव के कारण भारत अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को लेकर भी संवेदनशील हो गया है। जम्मू और कश्मीर का कुप्रबंधन, सामान्य कश्मीरियों में पाकिस्तान के समर्थन में सहानुभूति की भावना आदि ने पाकिस्तान के साथ रिश्तों को खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है। अगर हम भारतीय उपमहाद्वीप में यूं ही उलझे रहे तो हमारे मजबूत क्षेत्रीय और वैश्विक कद पर असर होगा।
 
बीते 70 वर्ष से अधिक समय में भारत ने एक जीवंत लोकतंत्र के रूप में जबरदस्त अंतरराष्ट्रीय पूंजी जुटाई है। इसकी मदद से ही विविधतापूर्ण आबादी वाला हमारा देश एकजुट रहा और असहमति और बहस का उत्सव मनाता रहा है। एक और आम चुनाव देश की लोकतांत्रिक पहचान की मजबूती का प्रतीक है लेकिन मौजूदा राजनीतिक बहस इसका परिचय नहीं देती। देश की विशिष्टता को जोखिम उत्पन्न हो रहा है। बहुलतावादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश की पहचान को खतरा है। इस मायने में मोदी सरकार काफी हद तक विफल रही है।
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर के वरिष्ठ फेलो हैं।)
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, narendra modi,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या हिंदुजा संग जेट एयरवेज की बनेगी बात?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.