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भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया और नागरिक कर्तव्य

नितिन देसाई /  April 17, 2019

देश में निर्वाचन की प्रक्रिया, राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के व्यवहार तथा बतौर नागरिक हमारे कर्तव्यों के बारे में विस्तार से अपनी राय और कुछ सुझाव रख रहे हैं नितिन देसाई

 
अप्रैल 1947 में भारत की संविधान सभा ने यह तय किया कि वह आजादी की लड़ाई के दौरान उठी मांग के अनुरूप सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर चुनाव कराएगी। एक तरह से यह औपनिवेशिक काल की सीमित मताधिकार की चुनाव व्यवस्था पर प्रतिक्रिया भी थी। उदाहरण के लिए सन 1935 के चुनाव में देश के कुल वयस्कों के केवल पांचवें हिस्से का नाम मतदाता सूची में शामिल किया गया था। इस सूची में मतदाताओं के नाम समुदाय, पेशे आदि के हिसाब से वर्गीकृत किए गए थे। 
 
नवंबर 1946 में संविधान सभा सचिवालय (सीएएस) ने सार्वभौमिक आधार पर मतदाता सूची तैयार करने का काम शुरू किया। चूंकि इसका सीधा संबंध नागरिकता से था। इसलिए निर्वाचन सूची की तैयारी से जुड़े प्रयास, इस प्रश्न के उत्तर से भी प्रत्यक्षतया संंबंधित थे कि वास्तव में असल भारतीय कौन हैं? यह कोशिश थी एक ऐसा नागरिक राष्ट्र बनाने की जहां धर्म या जातीय संदर्भ न दिए जाएं।  सीएएस ने जिन नौकरशाहों को निर्देशों के प्रवर्तन का काम सौंपा, उन्होंने सार्वभौमिकता के सिद्घांत को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया। उदाहरण के लिए तत्कालीन बॉम्बे के कलेक्टर ने कहा कि सार्वभौमिकता का तकाजा है कि जिन लोगों के पास कोई स्थायी पता नहीं है, उन्हें भी मतदान करने का अधिकार मिले और ऐसे हर व्यक्ति को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए जो यह साबित कर सके कि उसका रहवास उस क्षेत्र में है। शरणार्थियों से जुड़े जटिल मुद्दों को भी हल कर लिया गया। इस प्रक्रिया पर किया गया ओर्नित शानी का अध्ययन बताता है कि कैसे सार्वभौम मतदाता सूची तैयार करने की इस प्रक्रिया ने राष्ट्रीय एकता की भावना उत्पन्न करने में मदद की और राष्ट्रीयता का बोध पैदा किया। (ओर्नित शानी, हाऊ इंडिया बिकेम डेमोक्रेटिक, पेंग्विन/वाइकिंग, 2018 पृष्ठ 7)
 
अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद की ओर ध्यान आकर्षित करने का मकसद यह बताना है कि निर्वाचन प्रक्रिया को संचालित करने वाले सरकारी अधिकारियों पर भी काफी कुछ निर्भर करता है। जनता को यह यकीन दिलाना चाहिए कि वे पूरी तरह निष्पक्ष और निरपेक्ष हैं तथा वे चुनाव तथा आदर्श आचार संहिता को कड़ाई से लागू करने के लिए प्रतिबद्घ हैं। चुनाव प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है और ऐसी आशंका है कि चुनाव की निगरानी करने वाली सर्वोच्च संस्था इस बार वैसी निरपेक्ष नहीं है जैसा कि हम उसे देखते आए हैं। सेवानिवृत्त नौकरशाहों ने कुछ खास चूक को लेकर जो पत्र लिखा, उसे व्यापक कवरेज मिला (स्पष्टीकरण: मैंने भी उस पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं)। इन चिंताओं को हल किए जाने के संकेत मिल रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही निर्वाचन अधिकारियों की निष्पक्षता में भरोसा बहाल हो जाएगा। 
 
वैधता इस बात पर भी निर्भर करती है कि मतदाता, मतदान और मतगणना की प्रक्रिया की निष्पक्षता पर यकीन करें। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के इस्तेमाल को लेकर कई सवाल उठे और कहा गया कि उनसे छेड़छाड़ की जाती है। निजी तौर पर मेरा मानना है कि भारत में ईवीएम को लेकर जो सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं, वे पर्याप्त हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पुरानी मतदान पत्र वाली व्यवस्था में तो बूथ कैप्चरिंग के जरिए ऐसी छेड़छाड़ करना और आसान था। बहरहाल, मतदाताओं का भरोसा बरकरार रखना महत्त्वपूर्ण है और इसलिए वोटर वेरीफाइड ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) का इस्तेमाल काबिलेतारीफ है। एक सवाल यह भी है कि इनमें से कितने नमूने रखे जाएंगे और कितनों की गिनती की जाएगी। जो जानकारी अब आ रही है, उसके मुताबिक प्रति विधानसभा क्षेत्र एक के बजाय अब पांच वीवीपैट चुनी जाएंगी और ईवीएम से उनका मिलान किया जाएगा। पांच वीवीपैट को चुनने का एक तरीका यह है कि दूसरे स्थान पर आने वाले प्रत्याशी से तीन और तीसरे स्थान पर आने वाले प्रत्याशी से दो पर्चियां चुनने को कहा जाए। निर्वाचन अधिकारियों को निष्पक्ष होना होगा और जो राजनेता चुनावी होड़ में होंगे, वे यकीनन अंतर को बढ़ाकर पेश करेंगे, तथ्यों के साथ तोड़ मरोड़ करेंगे और आक्षेपों का प्रयोग करेंगे। परंतु जब यह सब उस मोड़ पर पहुंच जाए जहां देशवासियों के बीच धर्म या जातीय पहचान के आधार पर भेद करने का प्रयास किया जाए तो राजनीतिक प्रकिया प्रत्यक्ष तौर पर समता और नागरिक राष्ट्रीयता के संवैधानिक मानक को चुनौती देती है। यह सीमा पार नहीं होनी चाहिए लेकिन इन चुनावों में ऐसा हो रहा है। आदर्श आचार संहिता में ऐसे प्रावधान हैं कि चुनाव आयोग चाहे तो उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कदम उठाए। 
 
मौजूदा राजनीतिक बहस का चिंतित करने वाला एक और पहलू है। राजनेता एक दूसरे के खिलाफ जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वह निहायत असभ्य और असंयमित है। विपक्ष का सम्मान संसदीय लोकतंत्र में अहम है। इतना ही नहीं जब राजनीतिक प्रक्रिया कई दलों तक फैली हो और गठबंधन सरकारों का दौर हो तब निंदा और क्रोध की यह भावना राजनीतिक स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकती है। मीडिया कवरेज का स्वरूप बदलने से इस विकृत राजनीतिक बहस का स्वरूप भी बदला है। टेलीविजन एंकर पूर्वग्रह से ग्रस्त नजर आ रहे हैं और सोशल मीडिया फेक न्यूज का प्रसार कर रहा है। 
 
प्रभावी लोकतंत्र को राजनीतिक परिदृश्य में सभी दलों और लोगों के लिए समानता कायम करनी चाहिए। परंतु सत्ताधारी राजनेता बहुत कम अवसरों पर इसका सम्मान करते हैं और चुनावी लाभ के लिए मनमानी करते रहते हैं। राजनीतिक फंड जुटाने की कोशिश में नियमों की मनमुताबिक व्याख्या और हाल में राजनीतिक दलों को कारोबारी चंदे से संबंधित नियमों में बदलाव तथा गोपनीय दान के लिए चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था इसका उदाहरण है।  एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के मुताबिक नियम में बदलाव के बाद वित्त वर्ष 2017 और 2018 में कॉर्पोरेट दान का बड़ा हिस्सा एक खास दल को गया। करीब 2700 करोड़ रुपये मूल्य के निर्वाचन बॉन्ड खरीदकर दान किए गए। इसका ब्योरा भी उपलब्ध नहीं है। परंतु सारे संकेतक यही बताते हैं कि बॉन्ड में किए गए दान का अधिकांश हिस्सा दल विशेष को गया। 
 
हमारे पुरखों ने जिस लोकतंत्र का स्वप्न देखा था, वह संकट में है। अगर चुनाव विश्वसनीय तरीके से नहीं हुए तो वे मौजूदा सरकार की संवैधानिकवैधता पर सवाल खड़े करते हैं। कानून, नियम और समान परिस्थितियां, चुनाव आचार संहिता और स्वतंत्र चुनाव आयोग द्वारा उनका कड़ाई से क्रियान्वयन आदि केवल शुरुआत हैं।  काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि क्या हम ऐसा मानक व्यवहार तैयार कर पाते हैं जो किसी समूह के प्रति घृणा को नकार सके, विरोध केअधिकार का सम्मान करे और राजनीतिक बहस के ऐसे मानक तय करे जो आगे चलकर परंपरा बन जाएं। नागरिक और मतदाता के रुप में भी हमें राजनीतिक वर्ग से व्यवहार के ऊंचे व्यवहार मानक की अपेक्षा करनी चाहिए।
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