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मकान के किराये को नहीं कहा जा सकता कारोबारी आय

तिनेश भसीन /  April 17, 2019

आयकर विभाग और करदाताओ के बीच इस बात को लेकर अक्सर विवाद होता रहता है कि किराये को किस श्रेणी में रखा जाए। कोई व्यक्ति किराये को कारोबारी आय के तौर पर दिखाना पसंद करेगा क्योकि इससे उसे संपत्ति की देखभाल में हुए समूचे खर्च की कटौती का मौका मिल जाएगा, वह मूल्यह्रïास कादावा कर सकता है और यदि संपत्ति किराये पर नहीं चढ़ी हो तो उसे सांकेतिक किराया देने से मुक्ति भी मिल सकती है। लेकिन ऐसा हो जाए तो सरकार को राजस्व का नुकसान होना तय है। इसीलिए आयकर विभाग ऐसे हरेक मामले की बारीक छानबीन करता है ताकि करदाता किराये को कारोबारी आय के तौर पर न दिखा पाएं।

 
विवाद इसलिए भी होता है क्योंकि आयकर अधिनियम में इस बारे में निश्चित दिशानिर्देश नहीं दिए गए हैं कि किराये को किस श्रेणी में रखा जाए या क्या माना जाए। टैक्समैन डॉट कॉम में चार्टड अकाउंटेंट नवीन वाधवा कहते हैं, 'करदाता को इसमें विभिन्न आयकर अपील पंचाटों और अदालतों द्वारा दिए गए पिछले फैसलों पर भरोसा करना चाहिए। फैसलों से मोटे दिशानिर्देशों का पता चल जाता है।' वह कहते हैं कि ऐसे हरेक मामले के तथ्य अलग-अलग होते हैं और यदि कर आकलन अधिकारी किराये को कारोबारी आय बताने वाले दावे को खारिज करता है तो आदेश के खिलाफ अपील करने और मुकदमा लडऩे का ही विकल्प बचता है।
 
केरल उच्च न्यायालय ने हाल के एक फैसले में कहा कि शॉपिंग मॉल में दुकान किराये पर देने से हुई आय को कारोबारी आय ही माना जाना चाहिए और इसे 'कारोबार के लाभ एवं हानि' शीर्षक के अंतर्गत रखकर कर की गणना की जानी चाहिए। पीडब्ल्यूसी इंडिया के एक नोट में बताया गया, 'कोर्ट ने कहा कि करदाता की प्राथमिक मंशा संपत्ति का व्यावसायिक लाभ उठाने की थी और उस संपत्ति में कई प्रकार की गतिविधियां चलाकर उसने अपनी आय का अच्छा खासा हिस्सा उसी से कमाया।' इस मामले में करदाता एक कंपनी थी, जो रिहायशी एवं वाणिज्यिक परिसरों के निर्माण तथा प्रचार-प्रसार से जुड़ी थी। उसने एक शॉपिंग मॉल बनाया और उसे चलाने लगी। उसी मॉल में कई दुकानें किराये पर देकर उसने आय अर्जित की। कंपनी ने शॉपिंग मॉल की रोजमर्रा की गतिविधयों को संभाला और चलाया, जिनमें कार पार्किंग की सुविधा, सुरक्षा, हाउसकीपिंग सेवाएं और बिजली संबंधी मदद शामिल थी।
 
शुरुआत में जब उसने अपनी आय को कारोबारी आय के तौर पर दिखाया तो कर अधिकारी ने उस आय को 'आवासीय संपत्ति से आय' शीर्षक के तहत दिखाकर कर का आकलन कर लिया। मामला आयकर अपील पंचाट के पस पहुंचा, जिसने फैसला करदाता के पक्ष में सुना दिया। आयकर विभाग इस मामले को उच्च न्यायाल में ले गया। वहां विभाग ने उच्चतम न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला दिया और दलील दी कि किराये से होने वाली आय को 'आवासीय संपत्ति से आय' ही माना जाना चाहिए। मगर अदालत ने कहा कि करदाता संपत्ति को केवल किराये पर ही नहीं दे रहा है बल्कि वह मॉल के प्रबंधन में और सुविधाएं एवं सेवाएं प्रदान करने में भी शामिल है, जिससे पता चलता है कि संपत्ति का वाणिज्यिक इस्तेमाल करने की उसकी मंशा थी। करदाता के द्वारा अर्जित की गई इस आय को केवल संपत्ति के अधिकार के इस्तेमाल से होने वाली आय नहीं माना जा सकता है और इसीलिए अदालत ने करदाता के पक्ष में फैसला सुना दिया।
 
यदि आप अपनी संपत्ति को केवल किराये पर चढ़ा रहे हैं और बतौर व्यक्ति या कंपनी उस किराये का लाभ ले रहे हैं तो ज्यादातर मामलों में आपको उस किराये से होने वाली आय का उल्लेख आयकर रिटर्न फॉर्म में 'आवास संपत्ति से आय' शीर्षक के तहत करना पड़ेगा। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह संपत्ति मकान (रिहायशी) है या दफ्तर (वाणिज्यिक) है। यदि कोई करदाता (होटल का लाइसेंस लिए बगैर) पेइंग गेस्ट हाउस्ट चला रहा है या अपनी संपत्ति को एयरबीएनबी जैसे किसी प्लेटफॉर्म के जरिये किराये पर चढ़ा रहा है तब भी उसे आवास संपत्ति से आय ही माना जाएगा।
 
आय से होने वाली आय को कारोबारी आय उसी सूरत में माना जा सकता है, जब किसी कारोबार या उसकी संपत्तियों को पहले से चल रहे या फायदे वाले कारोबार के तौर पर किराये पर दिया जाए या संपत्तियों को फर्नीचर और फिटिंग तथा अन्य संबंधित ढांचों के साथ ही किराये पर दिया जाए या संपत्तियों को किराये पर देने के साथ ही कई प्रकार की अन्य सुविधाएं (जैसे लिफ्ट, सुरक्षा अथवा मशीनरी, कैंटीन, हाउसकीपिंग जैसी अन्य सेवाएं) भी नियमित तौर पर उपलब्ध कराई जा रही हों।
Keyword: rent, income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
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