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घोषणापत्र को मजाक बना देता है चुनाव आयोग का रवैया

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  April 16, 2019

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। हम चुनावों के निरंतर 'स्वतंत्र एवं निष्पक्ष' संपन्न होने पर काफी गर्व महसूस करते हैं। आम तौर पर हरेक साल देश में कहीं-न-कहीं चुनाव होता ही रहता है। फिर भी चुनाव घोषणापत्र जैसा बुनियादी मुद्दा भी इतने बुरे ढंग से संचालित किया जाता है कि समूची चुनाव प्रक्रिया एक मजाक बनने के कगार पर पहुंच जाती है। एक सार्वजनिक अनुबंध का मूलभूत अवयव यह है कि अनुबंध को आकार देने वाली प्रतिज्ञा एवं दो पक्षों के बीच की प्रतिज्ञा साफ तौर पर समझ में आ रही हो, उन्हें अच्छी तरह समझाया जा सके और आम जनता 'जानकारी पर आधारित फैसला' ले सके। जब कोई कंपनी प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के जरिये पैसे जुटाती है तो उसे एक 'प्रॉस्पेक्टस' जारी करना होता जिसमें उसे अपनी कारोबारी गतिविधियों और भावी योजनाओं के बारे में जानकारी देनी होती है। उस कंपनी को इस पेशकश से जुड़े जोखिमों के बारे में भी बताना होता है। 

 
फिर भी जब सभी सार्वजनिक अनुबंधों में सबसे ऊपर माने जाने वाले चुनाव का मामला आता है तो 'प्रॉस्पेक्टस' जैसी अहमियत रखने वाले दस्तावेज से संबंधित नियमन की स्थिति काफी दयनीय है। ऐसा तब है जब चुनाव से ही तय होता है कि हम अपने भाग्य-विधाता के रूप में किसे चुन रहे हैं? चुनावी प्रक्रिया का नियमन देश का  सर्वाधिक ताकतवर नियामक भारत का चुनाव आयोग करता है जो एक संवैधानिक निकाय भी है। इसके बावजूद चुनाव की जान कही जाने वाली सार्वजनिक प्रतिज्ञा के इतने अहम हिस्से के नियमन को लेकर उथले एवं लापरवाही भरे रवैये के चलते भड़काऊ एवं अस्वीकार्य नतीजे सामने आते हैं। 
 
भारतीय गणराज्य के सातवें दशक के अंत में जाकर इस साल चुनाव आयोग ने घोषणापत्र जारी करने के लिए 48 घंटे की समयसीमा लागू की है। एक चुनाव सुधार के रूप में इस कदम की प्रशंसा की गई है। लेकिन इसका यह मतलब भी है कि आयोग की नजर में मतदाता के लिए किसी दल का घोषणापत्र पढऩे, उसे समझने और उससे सहमत होने पर उस दल को अपना मत देने का फैसला करने के लिए महज 48 घंटे ही काफी हैं। चुनाव आयोग से कम शक्तियां रखने वाले नियामक भी सार्वजनिक दस्तावेज रखने वाले पक्षों को इससे अधिक समय देने के लिए कहते हैं। मसलन, एक प्रतिभूति की पेशकश के दौरान मसौदा प्रॉस्पेक्टस को लोगों के लिए ऑनलाइन पोस्ट करना पड़ता है।
 
घोषणापत्र में जो भी वादे किए गए हों लेकिन चुनाव नतीजों की घोषणा होने के बाद उस घोषणापत्र में किए गए किसी भी वादे के लिए उस दल को जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसे में बहुत नाराज होने पर मतदाता केवल इतना ही कर सकता है कि वह उस दल को अगले चुनाव में वोट न दे। कोई भी घोषणापत्र यह जिक्र भी नहीं करता है कि पार्टी उस घोषणापत्र में किए गए वादों को नकार सकती है या उनमें संशोधन कर सकती है। संक्षेप में कहें तो किसी  पार्टी के घोषणापत्र का असल में कोई मतलब ही नहीं होता है। चुनाव घोषणापत्रों में 'न्यूनतम साझा कार्यक्रम' की संभावना को लेकर कभी भी कोई चेतावनी नहीं दी जाती है। वहीं अगर कोई कंपनी प्रॉस्पेक्टस में कहती है कि वह किसी खास मकसद से धन जुटा रही है लेकिन बाद में वह उस राशि का इस्तेमाल किसी अन्य मकसद से करेगी तो उसके लिए पैसे जुटाना काफी भारी हो जाएगा। किसी भी सत्ताधारी दल के चुनाव घोषणापत्र में ऐसे बिंदु नहीं होते हैं जो यह दिखाएं कि पिछले घोषणापत्र में किए गए वादों के बरक्स उसने कितने वादों को लागू किया है। वादा बनाम प्रदर्शन का यह पहलू हरेक नियामकीय परिवेश का एक अनिवार्य पहलू है लेकिन चुनावों में यह नदारद होता है। 
 
संक्षेप में, चुनाव घोषणापत्र एक ऐसा रस्मी दस्तावेज है जिसके बारे में कोई भी फिक्रमंद नहीं होता है। न तो घोषणापत्र जारी करने की समयसीमा तय करने वाला नियामक और न ही सारे चुनावी वादों को एक जगह देखने की इच्छा रखने वाला मतदाता ही चिंतित होता है। ऐसे में अधिक वास्तविक व्याख्या शायद यही होगी कि चुनावों के दौरान घोषणापत्र जारी करना ही बंद कर दिया जाए। हालांकि पूंजी बाजार में भी कोई निवेशक शायद ही प्रॉस्पेक्टस पढ़ता है। लिहाजा किसी को भी प्रॉस्पेक्टस की भूमिका को लेकर बहुत चिंतित नहीं होना चाहिए। अगर आप सच में प्रॉस्पेक्टस में यकीन करते हैं तो इसका मतलब है कि आप यह मानते हैं कि सहारा के साथ जो कुछ भी हुआ, वह उसके लिए रत्तीभर भी जिम्मेदार नहीं थी। 
 
सहारा के खिलाफ दायर मुकदमे का आधार ही यह था कि उसने शेयरों के जरिये निवेशकों से फंड जुटाने की कवायद के दौरान कोई प्रॉस्पेक्टस ही नहीं जारी किया था। इस चर्चा के केंद्र में रहने वाला चुनाव घोषणापत्र महज मजाक बनकर रह गया है। यह चुनाव नियमन करने वाली संस्था चुनाव आयोग के निष्क्रिय रवैये और मतों के बाजार में जुटे बेफिक्र मतदाताओं के रवैये को भी बयां करता है। कुछ राजनीतिक दलों का घोषणापत्र बनाने के पहले व्यापक सार्वजनिक विमर्श करना तारीफ के लायक है। यह बेहद निष्ठुरता ही होगी अगर दलों को अपने कथित घोषणापत्र के बारे में अधिक चिंता न हो। अगर 'अंपायर' निर्वाचन प्रक्रिया के इस अहम दस्तावेज के नियमन की जरूरत नहीं समझता है तो वह दिन अधिक दूर भी नहीं है।
 
(लेखक एक वरिष्ठ अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं) 
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress, manifesto,,
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