बिजनेस स्टैंडर्ड - बेहतर बदलाव योजना से बनेगा काम
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बेहतर बदलाव योजना से बनेगा काम

अजय शाह /  April 16, 2019

अगर 2019 के आम चुनाव के तत्काल बाद से बेहतर जानकारी के साथ बहस मुबाहिसे शुरू हों तो वर्ष 2022-23 तक आर्थिक सुधारों को बेहतर ढंग से अंजाम दिया जा सकता है।  बता रहे हैं अजय शाह 

 
चुनाव के बाद का बदलाव काफी कठिनाई भरा और महत्त्वपूर्ण होता है। चूंकि देश के संस्थान काफी कमजोर हैं। इसलिए काफी कुछ व्यक्तित्वों पर निर्भर करता है। पिछले वक्त का काफी कर्ज एकत्रित हो चुका है जिससे निपटने के लिए मांग पर ध्यान देने और संसाधन जुटाने की आवश्यकता है। ऐसे में बेहतर है एक ऐसी टीम तैयार की जाए जो घोषणापत्र, न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी), बदलाव टीम और अन्य शुरुआती कदमों पर ध्यान दे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आगामी आम चुनाव जीते या नहीं लेकिन अगले पांच वर्ष काफी अलग होने वाले हैं। वर्ष 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दोबारा चुनाव जीतने में कामयाब रहा लेकिन संप्रग-2 की प्रकृति काफी अलग थी। ऐसे में अगर सन 2014 में बनी सरकार में कोई खास मंत्रालय संभालने वाला व्यक्ति 2019 में भी पद पर बना रहता है तो भी वह बदल चुका होगा। 2019 में उसके तौर-तरीके एकदम अलग होंगे। चुनावों के बाद अक्सर कैबिनेट और अधिकारियों के व्यवहार के स्तर में बदलाव देखने को मिलता है।
 
चुनाव नतीजे आ जाने के बाद मीडिया में विजेताओं के प्रशस्तिगान का दौर चलेगा। फिजा में खास किस्म का उत्साह होगा। कई लोग यह भी मानेंगे एक खास अवधि तक नई टीम से कोई सवाल नहीं किया जाएगा। हालांकि उनमें बदलाव की समस्या अपने आप में एक समस्या है।  भारत में संस्थान कमजोर हैं और यही वजह है कि यहां व्यक्ति अधिक महत्त्वपूर्ण है। नए लोगों को पूरा परिदृश्य समझने में वक्त लगता है। कई अनुभवी नौकरशाह एक नियम का पालन अवश्य करते हैं, वह यह कि काम के पहले छह महीनों के दौरान बहुत कम बोला जाए। जब संस्थान कमजोर हों तो व्यक्तियों और संस्थानों के बीच के रिश्ते कमजोर पड़ जाते हैं।
 
इन शुरुआती छह महीनों का क्या महत्त्व है? शुरुआती छह महीनों के दौरान अधिक बौद्धिकता का प्रदर्शन किया जा सकता है क्योंकिमेहनत का फल हासिल करने के लिए आगे चार वर्ष से अधिक समय होता है। इससे जटिल सुधार लागू करने का वक्त मिलता है और अर्थव्यवस्था भी ऐसे बदलाव सहन कर जाती है।  उदाहरण के लिए संरक्षणवाद को शुरुआती कुछ सप्ताह में समाप्त किया जा सकता है। यह राजनीतिक रूप से सहज होता है। पहले वर्ष में उन लोगों को शिकायत हो सकती है जो कम कम दर से प्रभावित हों लेकिन बाद के चार वर्ष के दौरान संसाधनों के सुधरे हुए आवंटन और उत्पादकता का लाभ लिया जा सकता है। इस हिसाब से देखें तो जून से सितंबर 2019 तक का समय सीमा शुल्क दर हटाने, डेटा का स्थानीयकरण करने और एफडीआई सीमाओं के लिए अच्छा मौका है।
 
समय बीतने के साथ-साथ निर्णय प्रक्रिया के लिए कम वक्त बचता है क्योंकि चुनाव करीब आते जाते हैं। इससे एक किस्म का नीतिगत बोझ उत्पन्न होता है। चीनी उद्योग, आईएलऐंडएफएस, जेट एयरवेज, आईडीबीआई, बैलेंस शीट से इतर राजकोषीय परिचालन आदि समस्याओं से चुनाव के पहले के आखिरी वर्ष में अल्पावधि के उपायों के जरिए निपटा जाता है। इस तरह के बकाया मसलों से अगली सरकार की टीम को निपटना होगा।  चुनाव के तुरंत बाद का समय ऐसा होता है जब नई टीम अपने आपको लेकर विश्वस्त नहीं होती लेकिन उसे पिछले एक या दो वर्ष से लटके नीतिगत मसलों से निपटना होता है और उसके पास इतना पर्याप्त समय होता है कि वह उनका लंबी अवधि का हल तलाश कर सके। ऐसी परिस्थितियों में सर्वश्रेष्ठ काम का उदाहरण है जुलाई 1991 में दिया गया बजट भाषण। 
 
जब संस्थान कमजोर होते हैं तो व्यक्तिगत स्तर पर लिए गए निर्णय नीति बन जाते हैं। हम जून या जुलाई तक बौद्धिक क्षमता, टीम की सुसंगतता, और प्रमुख व्यक्तियों की भूमिका के आधार पर सरकार के अगले पांच वर्ष के प्रदर्शन का अनुमान लगा सकते हैं। वर्ष 2019 की पहेली शुरुआती कुछ सप्ताह में ही हमें ढेर सारी जानकारी देने वाली है। उसके आधार पर ही सन 2022/2023 तक आर्थिक उभार की बुनियाद रखी जाएगी। तीन तरह की गलतियां करने से बचना होगा। पहली गलती यह मानना है कि नीतिगत मसलों से निपटने के लिए अल्पावधि के कदम ही उठाए जाने चाहिए। जून 2019 में आईएलऐंडएफएस को लेकर नीतिगत प्रतिक्रिया जून 2018 की तुलना में एकदम अलग होगी।
 
दूसरी गलती है, मीडिया के बहकावे में आ जाना और समय से पहले यह दावा करने लगना की आर्थिक दिक्कतें दूर हो गई हैं। हमें अपनी ही प्रेस विज्ञाप्तियों पर यकीन नहीं करना चाहिए। तीसरी गलती है, कठिन और दूरगामी सुधारों को अंजाम न देना।  राजकोषीय, वित्तीय और मौद्रिक नीति सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। ये साथ मिलकर कंपनियों के लिए निवेश का वातावरण तैयार करती हैं। निजी तौर पर लोग नीतिगत प्रक्रिया पर नजर रखते हें और सुधार की संभावनाओं पर प्रतिक्रिया देते हैं। जब नीति निर्माता टीम और विचारों का प्रदर्शन करते हैं तो अर्थव्यवस्था को तेजी से लाभ होता है क्योंकि निजी तौर पर लोग आर्थिक माहौल को लेकर अधिक आशावादी होते जाते हैं। 2019 और 2020 में नीतिगत मोर्चे पर मजबूत प्रदर्शन होने पर निजी निवेश में भी सुधार देखने को मिलेगा। आर्थिक सुधारों के विचार और टीमें चक्रीय नीति का मुकाबला करने के लिए सबसे बेहतर हैं। 
 
राजनीतिक दल शुरुआती छह महीनों का सर्वश्रेष्ठï इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं? यह काम बेहतर नियोजन से ही हो सकता है। उदाहरण के लिए अमेरिका में बदलाव की प्रक्रिया अक्टूबर में शुरू होती है, चुनाव नतीजे नवंबर में आते हैं और नई टीम जनवरी में काम संभाल लेती है। नई टीम के काम संभालने के पहले चार महीने के विकास कार्य व्यवस्थित होते हैं। हमारे देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। हमारे यहां मई के अंत में सरकार बनेगी और जुलाई तथा उसके बाद फरवरी में बजट पेश किया जाएगा। 
 
हम बेहतर प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं? चुनाव घोषणापत्र के आगमन के बाद अभियान शुरू हो जाते हैं और इस बीच सत्ता संभालने की मानसिक तैयारी भी शुरू हो जाती है। अतीत में गठबंधन सरकारों ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर बातचीत की। यह बातचीत नीतिगत प्रश्नों पर ध्यान केंद्रित करती है। बेहतर घोषणापत्र का विकास, न्यूनतम साझा कार्याक्रम की बेहतर शर्तों की वजह बनता है और इस प्रकार बेहतर नीति तैयार होती है। पहले वर्ष के लिए एक पूर्ण नियोजन प्रक्रिया की आवश्यकता है ताकि काम के क्षेत्र तय किए जा सकें और कार्य योजना और विशेषज्ञता को लेकर काम किया जा सके। 
 
जनरल आइजनहॉवर ने एक बार कहा था कि योजना अपने आप में बेकार हो सकती है लेकिन सारा अंतर नियोजन से उत्पन्न होता है। चुनाव नतीजे आने के पहले राजनीतिक दलों को नियोजन की प्रक्रिया पर काम करना चाहिए। इससे न केवल मनसिकता तैयार होगी बल्कि प्रमुख व्यक्तियों में क्षमता का विकास भी होगा। इससे वास्तविक काम शुरू होने पर प्रदर्शन सुधरा हुआ मिलेगा।
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