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नीतिगत सुधार जरूरी

संपादकीय /  April 16, 2019

व्यापार क्षेत्र के नए आंकड़े देश के निर्यात और आयात के बारे में कुछ दिलचस्प जानकारी प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए कमजोर रुपये की बदौलत मार्च 2019 में निर्यात साल दर साल आधार पर 11 फीसदी बढ़ा। यह पिछले कई महीनों में वृद्घि का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। कुल 30 में से 20 उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी देखी गई। इनमें रसायन, औषधि और पेट्रोलियम उत्पाद शामिल हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 2018-19 में देश का निर्यात डॉलर के संदर्भ में मामूली रूप से ही सही बेहतर रहा। यह बेहतरी कई वर्ष के ठहराव के बाद आई है। बहरहाल, जीडीपी के प्रतिशत के रूप में निर्यात की गति बेहतर नहीं रही। मार्च 2019 में व्यापार घाटा 1090 करोड़ डॉलर रहा, यह पिछले महीने की तुलना में 13 करोड़ डॉलर अधिक था। हालांकि 2018-19 में निर्यात में सुधार हुआ लेकिन आयात कहीं अधिक तेजी से बढ़ा। यही वजह है कि 2018-19 का व्यापार घाटा 17,600 करोड़ डॉलर रहा जबकि ठीक एक वर्ष पहले यह 16,100 करोड़ डॉलर था। 

 
मार्च के कारोबारी आंकडों में एक दिलचस्प बात और रही जिसका उल्लेख विश्लेषकों ने किया है। यदि तेल एवं सोने को इन व्यापारिक आंकड़ों से बाहर कर दिया जाए तो शेष प्रमुख कारोबारी संतुलन एक किस्म के अधिशेष का प्रदर्शन करता है। फरवरी 2014 के बाद यह पहला मौका है जब आंकड़ों की ऐसी प्रस्तुति में घाटा नदारद है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पांच वर्ष की लंबी अवधि से चली आ रही निर्यात की कमजोरी दूर हो गई है लेकिन यह बात ध्यान देने लायक है कि इस क्षेत्र में थोड़ी राहत नजर आ रही है। निर्यातकों के संगठन दावा कर रहे हैं कि यह सुधार ऐसे वक्त में हुआ है जबकि दक्षिण पूर्वी एशिया की प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था वाले देश धीमी निर्यात वृद्घि से दो चार हैं। ऐसे में जाहिर है यह दोहरे जश्न का मौका है। बहरहाल, यह मामला पूरी तरह निर्यात का नहीं है। सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के आयात से निपटने का प्रयास किया है। इसके लिए शुल्क वृद्घि का इस्तेमाल किया गया है और देश में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्यात में लगातार दूसरे महीने कमी भी आई है। ऐसे प्रश्न भी पूछे जाने चाहिए कि घरेलू मांग की क्या स्थिति है क्योंकि साल दर साल आधार पर आयात केवल 1.4 फीसदी बढ़ा। भारतीय रिजर्व बैंक यकीनन इन आंकड़ों पर भी ध्यान देगा। 
 
बहरहाल, अभी एक नए और स्वस्थ भुगतान संतुलन का जश्न मनाना जल्दबाजी होगा। बाह्यï खाते के मोर्चे पर देश की अर्थव्यवस्था के जो संवेदनशील पहलू हैं, उन्हें अभी हल किया जाना बाकी है। जब कच्चे तेल की कीमतों में दोबारा इजाफा होगा तो इसमें दो राय नहीं है कि भुगतान संतुलन पर भी नए सिरे से दबाव उत्पन्न होगा। वैश्विक कीमतों में वृद्घि और भारत में बढ़ी मांग के चलते इसका आयात पहले ही मार्च में 5.55 फीसदी बढ़कर 1175 करोड़ डॉलर तक पहुंच चुका है। घरेलू मांग में सुधार होने से भी ऐसा ही होगा। इससे तेल एवं गैर-तेल दोनों क्षेत्रों के बिल में पर्याप्त इजाफा होगा जिसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। अपनी जरूरत का 80 फीसदी कच्चा तेल आयात करने वाले भारत के लिए इन बाहरी कारकों से बचने का एक ही तरीका है और वह यह कि हम भारतीय निर्यात में स्थायी सुधार लाने का प्रयास करें। हमें इस वृद्घि को विभिन्न प्रक्रियाओं और सुधारों की मदद से स्थायित्व और प्रतिस्पर्धी भी बनाना होगा। वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली को लेकर जो सुधार किए गए हैं, वह भी अगली सरकार को राह दिखाने का काम करेंगे बशर्ते कि निर्यात में स्थायी रूप से सुधार लाने की उसकी मंशा हो।
Keyword: export, import, CAD, economy,,
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