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नेटवर्क साइंस के जरिये हो रही नई शुरुआत

अजित बालकृष्णन /  April 15, 2019

रोजमर्रा के जीवन के रुझानों का अध्ययन करके शोधकर्ता और वैज्ञानिक एक नई अंतर्दृष्टि दे रहे हैं जो दुनिया की तस्वीर बदल सकती है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
हर स्कूली बच्चे को यह कहानी अवश्य पढ़ाई गई होगी: 17वीं सदी के मध्य में पूरा इंगलैंड बूबोनिक प्लेग की चपेट में था। सभी स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए थे और 23 वर्षीय आइजक न्यूटन को कैंब्रिज विश्वविद्यालय छोडऩा पड़ा था जहां वह शोधकर्ता थे। उन्हें वापस अपने कस्बे लिंकनशर लौटना पड़ा था जहां वह पैदा हुए और बड़े हुए थे। एक शाम जब मौसम गर्म था तो वह नीचे बगीचे में गए और सेब के एक पेड़ के नीचे बैठे चाय पी रहे थे। तभी एक सेब उनके सर पर गिरा। उन्होंने सोचा कि सेब आखिर नीचे क्यों गिरा? वह दांए-बांए या ऊपर की ओर क्यों नहीं गया? शायद पृथ्वी ने उसे अपनी ओर आकर्षित किया, इसलिए वह नीचे गिरा। क्या पृथ्वी में कोई ऐसी शक्ति है जो चीजों को अपनी ओर खींचती है? आखिर वह कौन सी ताकत है जो चीजों को अपनी ओर खींचती है? इसी दिशा में सोचते हुए न्यूटन ने गुरुत्व के सिद्घांत की खोज की। यहीं से भौतिक विज्ञान की बुनियाद रखी गई। विज्ञान इसी तरह आगे बढ़ता है। यानी रोजमर्रा के जीवन से चीजों को देखता-समझता हुआ नए सिद्घांत गढ़ता है। बाद में इस सिद्घांत के आधार पर कहीं अधिक व्यापक घटनाओं की व्याख्या की जाती है। 
 
ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाओं के आधार पर इन दिनों मानव व्यवहार पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। अल्बर्ट लास्लो बारबासी अपनी नई पुस्तक, 'बसर््ट्स, द हिडेन पैटर्न बिहाइंड एवरीथिंग वी डू, फ्रॉम योर ईमेल टू ब्लडी क्रूसेड्स' में सवाल उठाते हैं, 'क्या हमारे कार्य व्यवहार उन नियमों और व्यवस्थाओं से संचालित होते हैं जो सहजता के मामले में न्यूटन के गुरुत्व नियम के समान हैं।' इस किताब में वह कुछ अप्रत्याशित निष्कर्षों को याद करते हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने और उनके सहकर्मियों ने ईमेल के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए पाया कि इंसान की ईमेल गतिविधियों में अल्पकालिक सघनता के बाद लंबा समय ऐसा भी आता है जब कोई ईमेल नहीं किया जाता। ऐसे में यह अनुमान लगा लेना भी ठीक नहीं है कि इस तरह का तीव्र मानव व्यवहार केवल ईमेल जैसी गतिविधि तक सीमित है। उन्होंने और उनके सहकर्मियों ने पाया कि सन 1905 से 1910 के बीच अल्बर्ट आइंस्टाइन ने जो पत्राचार किया, उसमें भी ऐसे ही लक्षण और रुझान पाए गए। 
 
फिलहाल शोध का एक बड़ा हिस्सा यह समझने का प्रयास कर रहा है कि कैसे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक और साझा रुझान, यानी मनुष्यों के बीच का सोशल नेटवर्क काम करता है। साइटेशन नेटवर्क एक ऐसा रुझान है जो इन दिनों बहुत सारे लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। ऐसा तब होता है जब किसी वैज्ञानिक पर्चे का लेखक अन्य पर्चों पर दृष्टि डालता है। अकादमिक जगत में आपकी पदोन्नति या प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों आदि में आपकी नियुक्ति इस बात पर काफी हद तक निर्भर करती है कि आपके कितने शोधपत्र दुनिया की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। अब शोधकर्ता ऐसे दृष्टांतों का बारीकी से अध्ययन करके उनमें किसी खास रुझान की पड़ताल कर रहे हैं। ऐसा ही एक रुझान 'साइटेशन कार्टेल' के रूप में स्थापित किया गया ताकि वैज्ञानिकों की गुणवत्ता के बीच अंतर किया जा सके। इसके लिए बढ़ते क्रम में अंकों का प्रयोग किया गया है। नेटवर्क के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि संपादकों और पत्रों के समूह साथ मिलकर साझा लाभ के लिए काम करते हैं ताकि उनके पत्रों का प्रभाव उत्पन्न करने वाले कारक में इजाफा हो सके तथा अन्य रिश्ते मसलन संपादकों से लेखकों के रिश्ते और लेखकों से लेखकों के रिश्ते मजबूत हो सकें।
 
नेटवर्क के प्रयोग पर बहुत बड़े पैमाने पर शोध कार्य चल रहा है। दो उदाहरण लें तो वित्तीय नेटवर्क का प्रयोग भेदिया कारोबार का पता लगाने में और आतंकी नेटवर्क को उजागर करने  भी किया जा रहा है।  नेटवर्क का ऐसा गहन अध्ययन इस तरह की तकनीक को जन्म दे रहा है जो इस क्षेत्र को उसी स्तर पर ले जा रहा है जो शुरुआती दौर में भौतिकी और रसायन के क्षेत्र में था। यानी अवधारणा के स्तर पर इन्हें लेकर काफी काम हो रहा है।  किसी नेटवर्क का आकार इस बात से परिभाषित होता है कि उस नेटवर्क में कुल कितने कारक प्रयोग में लाए जा रहे हैं। तमाम संभावित लिंक का कारकों से भाग देने के बाद हमें उन लिंक का घनत्व अनुपात प्राप्त होता है। जितने लिंक उस कारक से संबद्घ होते हैं, वे उसका अनुपात तय करते हैं। कुलमिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि  नेटवर्क विज्ञान के रूप में एक नया विज्ञान उभरकर सामने आ रहा है। 
 
यह विज्ञान हमें यह भी बताता है कि कलाकारों की सफलता के तार भी नेटवर्क में उनकी स्थिति के आधार पर तलाश किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए नेटवर्क विज्ञान संस्थान, नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय, बोस्टन के शोधकर्ताओं ने करीब 5 लाख कलाकारों की प्रदर्शनी की नए सिरे से पुनर्रचना की। इस दौरान उन्होंने सहप्रदर्शन नेटवर्क को खंगाला जो विभिन्न संस्थानों के बीच कला गतिविधियों के आवागमन का आकलन करता है। इस नेटवर्क में मुख्यरूप से संस्थागत प्रतिष्ठा को ध्यान में रखा जाता है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि अगर प्रतिष्ठित केंद्रीय संस्थानों तक जल्दी पहुंच बन जाए तो भविष्य में उच्च प्रतिष्ठित स्थानों पर जाने की संभावना आजीवन बनी रहती है और बहिर्गमन की दर काफी कम हो जाती है। इसके विपरीत, नेटवर्क क्षेत्र के बाहरी दायरे में रहने वालों में बहिर्गमन की आशंका भी अधिक होती है और केंद्रीय संस्थानों तक पहुंच बनने में भी काफी देरी लगती है। 
 
दुनिया भर की सरकारें और वहां के विश्वविद्यालय अपने-अपने यहां नेटवर्क विज्ञान केंद्रों की स्थापना करने में लगे हुए हैं। येल इंस्टीट्यूट फॉर नेटवर्क साइंस उन नेटवर्क का अध्ययन करने में लगा हुआ है जहां बातों का प्रसार जुबानी तौर पर होता है। इसका मकसद है यह देखना कि बातें चर्चा के माध्यम से कैसे आगे बढ़ती हैं।  हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय नेटवर्क आधारित चिकित्सा को लेकर किए जा रहे शोध पर जोर दे रहा हैं जहां जीव विज्ञान और बीमारियों के क्षेत्र में नेटवर्क की भूमिका, उसकी पहचान और उसके व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है। हमारे देश में पुणे स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं शोध संस्थान तथा आईआईटी इंदौर स्थित कॉम्प्लेक्स सिस्टम्स लैब में इसकी शुरुआत के संकेत नजर आ रहे हैं। 
Keyword: education, school, college, science,,
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