बिजनेस स्टैंडर्ड - उतार-चढ़ाव भरा अनुमान
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उतार-चढ़ाव भरा अनुमान

संपादकीय /  April 15, 2019

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने आगामी मॉनसून सत्र में बारिश के लगभग सामान्य होने का अनुमान प्रकट किया है। उसका यह अनुमान अन्य घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय मौसम विज्ञान संस्थानों से अलग है। इनमें से अधिकांश का कहना है कि इस वर्ष बारिश सामान्य से कम रहेगी। आईएमडी का अनुमान है कि वर्ष 2019 के मॉनसून सत्र (जून से सितंबर) के दौरान कुल बारिश, लंबी अवधि के औसत के 96 फीसदी तक रहेगी। यह अनुमान निजी मौसम एजेंसी स्काइमेट के 93 फीसदी (सामान्य से कम बारिश) के अनुमान से अधिक है। स्काइमेट के अलावा भी कई निजी विदेशी मौसम एजेंसियों ने ऐसे ही अनुमान प्रकट किए हैं। पूर्वानुमानों में यह असमानता शायद इसलिए नजर आ रही है क्योंकि विभिन्न एजेंसियों ने मॉनसून को नुकसान पहुंचाने वाले अल नीनो के दक्षिण पश्चिम मॉनसून पर प्रभाव को लेकर अलग-अलग अनुमान प्रकट किए हैं। मौसम पर निगाह रखने वाले अधिकांश लोग मानते हैं कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में बढ़ रही गर्मी के कारण उपजा यह प्रभाव अगस्त तक प्रभावी रहेगा, हालांकि मई से इसका असर कम होना शुरू हो जाएगा। परंतु, आईएमडी को लगता है कि जून के आसपास यह कमजोर पड़ जाएगा और शायद जुलाई के बाद यह मॉनसून पर कोई असर नहीं डालेगा। बहरहाल, लगभग सभी अनुमान लगाने वाले इस बात पर तो सहमत हैं कि शुरुआती दौर में कम बारिश हो सकती है और शायद अल नीनो प्रभाव के कारण मॉनसून में कुछ देरी भी हो। 

 
एक सच ऐसा भी है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। वह यह कि लंबी अवधि के मॉनसून अनुमान बहुत भरोसेमंद नहीं होते फिर चाहे उनका स्रोत कुछ भी हो। वर्ष 2017 को छोड़ दिया जाए तो बीते पांच वर्ष में से चार बार आईएमडी और स्काइमेट दोनों के प्रारंभिक अनुमान गलत साबित हुए। दोनों एजेंसियां वर्ष 2014 और 2015 में दो वर्ष लगातार सूखे का अनुमान लगा पाने में नाकाम रहीं। चकित करने वाली बात यह है कि डेटा संग्रह की बुनियादी सुविधाएं बढऩे और बेहतर गणन क्षमतााओं के कारण एक ओर जहां आईएमडी की अल्प से मध्यम अवधि की मौसम पूर्वानुमान क्षमताओं में काफी सुधार हुआ है, वहीं दीर्घावधि के अनुमान के बारे में यह बात लागू नहीं होती। 
 
हालांकि आईएमडी ने जोर देकर कहा है कि इस वर्ष मॉनसूनी बारिश का वितरण बेहतर होगा और यह बारिश खरीफ की फसल के लिए लाभदायक साबित होगी लेकिन फिर भी यह अनुमान अपरिपक्व नजर आता है। यह बात स्काइमेट के पूर्वानुमानों से भी मेल नहीं खाती है। आईएमडी सामान्य तौर पर बाद में जारी होने वाले अपडेट में मॉनसूनी बारिश की अवधि और विस्तार के बारे में बात करता है। ये अपडेट उस समय जारी होते हैं जब बारिश का मौसम चल रहा होता है। कृषि की बात करें तो उसके लिए बारिश की मात्रा से अधिक उसका विस्तार मायने रखता है। बहरहाल, जहां तक देश की समग्र अर्थव्यवस्था की बात है, उसमें मॉनसून का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है। इसकी कई वजह हैं। उदाहरण के लिए सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान अब महज 14 से 15 फीसदी रह गया है। व्यापक कृषि क्षेत्र की बात करें तो फसली खेती जो मॉनसून से सीधे प्रभावित होती है, उसमें कमी आ रही है। कृषि जीडीपी में कृषि से जुड़ी गतिविधियों की हिस्सेदारी खासतौर पर सकल मूल्यवद्र्घन, ने फसली खेती को पीछे छोड़ दिया है। इसके अलावा मुद्रास्फीति, खासतौर पर खाद्य मुद्रास्फीति भी 2014 और 2015 के सूखे और बाद में कमजोर बारिश के बावजूद स्थिर बनी रही। लब्बोलुआब यह कि अभी आईएमडी के मॉनसून संबंधी पूर्वानुमान के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
Keyword: agri, farmer, crop, monsoon, IMD,,
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