बिजनेस स्टैंडर्ड - अपने ही बुने जाल में उलझ गए मोदी!
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, August 23, 2019 09:40 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

अपने ही बुने जाल में उलझ गए मोदी!

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 14, 2019

बीते वर्षों के दौरान मैं खबरों के सिलसिले में अक्सर पाकिस्तान गया हूं। एक दफा जब मैंने पाकिस्तान के लिए वीजा का आवेदन किया तो भारत में पाकिस्तान के तत्कालीन उच्चायुक्त ने थोड़े मजाक और कुछ परेशानी के साथ पूछा था कि मैं उनके देश में इतनी अधिक रुचि क्यों रखता हूं? मैंने भी एक पत्रकार की तरह ही उनसे कहा, इसलिए कि पाकिस्तान की राजनीति भारत का आंतरिक मामला है।  शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि तस्वीर उलट जाएगी और भारत की राजनीति पाकिस्तान का घरेलू मामला बन जाएगी। पिछले दिनों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा को अगर दूसरा कार्यकाल मिलता है तो यह पाकिस्तान के लिए बेहतर होगा और कश्मीर समस्या के हल की संभावनाएं भी बेहतर होंगी।

 
याद नहीं आता कि इससे पहले कभी पाकिस्तान के किसी शासक ने भारत में हो रहे चुनाव के बारे में अपनी ऐसी स्पष्ट राय दी हो। पाकिस्तान के नागरिक भारत में मतदान तो करते नहीं, भारत के मतदाता उनको सुनेंगे नहीं। ऐसे में हम यह भी नहीं कह सकते कि वह यहां किसी प्रत्याशी का प्रचार कर रहे हैं। भारत का चुनाव आयोग उन्हें नोटिस भी नहीं दे सकता क्योंकि भारत की आदर्श आचार संहिता वहां लागू नहीं होती। वैसे भी उसे इसे लागू करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद हमारे विदेश मंत्रालय ने उस टिप्पणी की निंदा तो दूर, एक शब्द तक नहीं कहा। यह खामोशी क्या कहती है?
 
मौजूदा हालात में जब सभी एक सुप्रीम लीडर (यह मेरी नहीं, मोदी के बारे में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा की राय है) के संकेतों पर चलता है, तब कोई ऐसी बात की आलोचना का जोखिम क्यों उठाएगा जिससे मोदी को फायदा मिलता दिख रहा हो। लेकिन कोई इसका स्वागत भी नहीं कर सकता, न ही इमरान खान को धन्यवाद दे सकता है। क्यों? क्योंकि वह कह रहे हैं कि मोदी का दोबारा चुनाव जीतना पाकिस्तान के लिए अच्छा होगा क्योंकि इससे भारत के साथ लंबे समय के लिए शांति कायम करने की गुंजाइश बनेगी।
 
यह इस अभियान में सरकार के प्रमुख मुद्दों के उलट है। बहस को अर्थव्यवस्था, रोजगार और विकास से पाकिस्तान, आतंकवाद और मुस्लिमों की ओर मोडऩे में महीनों का वक्त लगा है। सरकार पाकिस्तान को सबक सिखाने के नाम पर दूसरा कार्यकाल मांग रही है भले ही इसमें कितना भी वक्त लगे। वह पाकिस्तान के साथ शांति स्थापना के नाम पर वोट नहीं मांग रही। इस दृष्टि से इमरान का बयान उसे एक चाल लग सकता है। फिलहाल यह मानने की पर्याप्त वजह है कि हमारे राजनीतिक इतिहास में पहली दफा पाकिस्तान सत्ताधारी दल के प्रचार अभियान के केंद्र में है।
 
तथ्यों पर गौर करें और देखें कि कौन स्वयं इस जाल में आ फंसा है और जाल किसने बिछाया है? भाजपा ने चुनाव में सामरिक नीतिगत मुद्दे को भुनाने का प्रयास किया जबकि इससे पहले ऐसा किसी ने कभी नहीं किया था। इससे मिलता जुलता एक ही मामूली वाकया याद आता है जब सन 1980 के आम चुनाव प्रचार में इंदिरा गांधी ने कहा था कि मोरारजी देसाई की जनता सरकार इतनी कमजोर है कि छोटे देशों ने भी आंखें दिखानी शुरू कर दी हैं। पाकिस्तान की ओर से भारतीय राजनीति में प्राथमिकता से जुड़ा पहला अहम वक्तव्य सन 1990 के दशक के आरंभ में बेनजीर भुट्टो की ओर से आया था हालांकि वह चुनाव के वक्त नहीं आया था। उनका बयान कश्मीर में भीषण अशांति के दौर में पी वी नरसिंहराव की चुप्पी के खिलाफ था। उन्होंने कहा था कि उन्हें पता नहीं कि भारत में अब किससे बात की जाए। उनका कहना था कि हालात उस वक्त से अलग थे जब गांधी परिवार जैसा कोई वर्ग सत्ता में होता था। राव इस बात से बेहद नाराज हुए थे और उन्होंने हम संपादकों के साथ बातचीत में कहा था कि इस अकड़ के लिए भारत उन्हें सबक सिखाएगा। उन्होंने कश्मीर में अशांति का दौर खत्म किया और पंजाब में आतंकवाद के सबसे बुरे दौर को समाप्त किया लेकिन उन्होंने सन 1996 के चुनाव अभियान में इसका उल्लेख नहीं किया। वह घरेलू राजनीति में पाकिस्तान को तवज्जो नहीं देना चाहते थे। उनमें यह समझ थी कि इससे पाकिस्तान को वह महत्त्व मिल जाएगा जो उसके पास पहले कभी नहीं था और वह भारतीय चुनावों को प्रभावित कर सकेगा। 
 
मोदी और भाजपा सरकार ने पाकिस्तान को वह तोहफा दे दिया है। भाजपा ने यह जाल अपने लिए स्वयं बुना। ऐसा लग रहा है मानो भारतीय राजनीति अब पाकिस्तान का अंदरूनी मसला है। अब उसे पता ही नहीं है कि हमारी घरेलू राजनीति में इमरान खान के खुले हस्तक्षेप से कैसे निपटा जाए? दिक्कत यह है कि शेष विश्व की नजर इस विरोधाभास पर है: भारत का सत्ताधारी दल पाकिस्तान को शत्रु बताते हुए अतिराष्ट्रवादी चुनाव अभियान चला रहा है जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान चाहता है कि वही सरकार दोबारा चुनी जाए। ऐसा केवल दक्षिण एशिया में हो सकता है। जयदीप साहनी ने फिल्म खोसला का घोसला में लिखा भी है: ये दुनिया ऊटपटांगा।
 
यह मजेदार लग सकता है लेकिन भारत के लिए ऐसा कतई नहीं है। हमारी राजनीति बहुत बुरी स्थिति में उलझ गई है। कौटिल्य और मैकियावेली से लेकर हेनरी किसिंजर तक आप किसी को भी ले लें, वे सभी तीन बातों पर सहमत थे:  पहला, कभी ऐसे मत बनिए कि कोई आपके बारे में अनुमान लगा ले। दूसरा, किसी विरोधी को यह मौका मत दीजिए कि वह आपकी आम राय को विभाजित कर सके। हमेशा एकजुट रहिए। तीसरा, किसी ने स्पष्ट नहीं कहा है लेकिन हम अनुमान लगा सकते हैं कि किसी ऐसे नाकाम वैचारिक राष्ट्र को जिसकी आबादी आपकी आबादी का 15 फीसदी हो, अर्थव्यवस्था 11 फीसदी के बराबर हो और विदेशी मुद्रा कोष हमारे 2.5 फीसदी के बराबर हो उसे हमारे देश के आम चुनाव को प्रभावित करने की क्षमता नहीं दी जानी चाहिए।
 
अमेरिका में मुलर जांच के विस्तार और जुलियन असांज की गिरफ्तारी के बाद एकदम नए संदर्भ हमारे सामने हैं। यहां मामला एक अत्यंत छोटे, गरीब, तानाशाही वाले, परमाणु हथियार संपन्न मुल्क का है जो पड़ोसियों के लिए सरदर्द बन चुका है और अब दुनिया की महान लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक के चुनाव को प्रभावित कर मनचाहे नतीजे चाहता है। इस कवायद का लक्ष्य तीन स्तर वाला है: तमाम गंदे रहस्यों को छिपाने वाली व्यवस्था के प्रति उदारवादी नफरत पैदा करना, लोकतांत्रिक संस्थानों की विश्वसनीयता खत्म करना और प्रतिष्ठित राजनेताओं की चारित्रिक हत्या करना। अमेरिकी उदारवादी मीडिया को याद कीजिए जिसके लिए कभी असांज और एडवर्ड स्नोडेन उदारवाद के प्रतीक होते थे, वही अब नफरत के पात्र हैं क्योंकि उन्होंने अमेरिकी राजनीति को नुकसान पहुंचाया।
 
सवाल यह है कि हम मामले को बहुत बढ़ाचढ़ाकर तो नहीं देख रहे? क्या हम छोटे से पाकिस्तान की तुलना रूस जैसे बड़े देश से कर सकते हैं? याद रहे आज रूस की अर्थव्यवस्था भारत की आधी से थोड़ी ही ज्यादा है और वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था के एक अंश के बराबर ही है। इसे समझने के लिए बहुत समझदार होने की आवश्यकता नहीं। बस पािकस्तान में आईएसआई या किसी अन्य जगह बैठे तीन सितारा फौजी अधिकारी की तरह सोचिए जिसका दिमाग सर में नहीं कहीं और होता है। आपको अवसर नजर आएगा। अगर खान वाकई दुनिया को कह रहे हैं कि उनका देश मोदी और भाजपा का दोबारा निर्वाचित होना चाहते हैं तो इन जनरलों को केवल इतना करना है कि कश्मीर के किसी हिस्से में आग भड़क उठे और जवाब में सर्जिकल प्रतिक्रिया के लिए तैयार रहें। उन्हें भारत में कोई स्नोडेन या असांज नहीं तलाशना होगा।
 
क्या पाकिस्तान ऐसा करेगा? मुझे नहीं पता और आशा करता हूं ऐसा न हो। परंतु हमने जो सामरिक चूक की है, अगर हम उसकी अनदेखी करें तो यह हकीकत से नजर चुराना होगा। हमने अपने शत्रु को घरेलू धु्रवीकरण में कारक बना लिया है और उसे अपने आंतरिक मामलों में जगह दे बैठे हैं।
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, narendra modi,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बाजार में अभी बना रहेगा गिरावट का दौर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.