बिजनेस स्टैंडर्ड - बीमा और म्युचुअल फंडों के प्रतिफल की तुलना नहीं
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बीमा और म्युचुअल फंडों के प्रतिफल की तुलना नहीं

तिनेश भसीन /  April 14, 2019

पिछले कुछ दिनों से कई बीमा फंड प्रबंधकों और उद्योग के विशेषज्ञों ने म्युचुअल फंडों और बीमा योजनाओं की तुलना करना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि बीमा योजनाओं खास तौर पर ऑनलाइन यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस स्कीम (यूलिप) ने म्युचुअल फंडों की तुलना में बेहतर प्रतिफल दिया है। पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के सह-संस्थापक और सीईओ यशीश दहिया ने कहा, 'लंबी अवधि की बात करें तो किसी भी वित्तीय योजना में तकरीबन 85 फीसदी शुल्क फंड प्रबंधन शुल्क के रूप में होता है। म्युचुअल फंड 2.25 से 2.50 फीसदी के अनुपात में सालाना व्यय शुल्क वसूलते हैं, लेकिन ऑनलाइन यूलिप में केवल 1.35 फीसदी शुल्क वसूला जाता है। यूं तो दोनों के शुल्क में महज 1 फीसदी का अंतर है, लेकिन अगर आप चक्रवृद्घि का गणित लगाएं तो 10 से 15 साल में 1 फीसदी का अंतर भी बहुत फर्क पैदा कर देता है।' लेकिन ऐसे कई पहलू हैं, जिनके कारण म्युचुअल फंडों और बीमा योजनाओं की एक दूसरे के साथ सटीक तुलना नहीं की जा सकती।

 
लागत ही नहीं इकलौता पहलू
 
नए दौर के ऑनलाइन यूलिप में पॉलिसी प्रबंधन और पॉलिसी आवंटन शुल्क खत्म कर दिए गए हैं। उनके बजाय वे फंड प्रबंधन एवं मार्टेलिटी शुल्क वसूलने लगी हैं। कुछ बीमा कंपनियां पांचवें साल से फंड में सालाना प्रीमियम की 1 फीसदी रकम भी जोड़ देती हैं। हालांकि यह बहुत अधिक राशि नहीं है। इस तरह बहुत सी ऑनलाइन यूलिप लागत के रूप में 1.25 फीसदी से 1.35 फीसदी वसूल रही हैं। दूसरी ओर म्युचुअल फंड पूरी तरह पारदर्शी हैं। उनमें किसी तरह का दुराव-छुपाव नहीं होता। 750 करोड़ रुपये तक की धनराशि वाले छोटे फंडों को 2 से 2.25 फीसदी शुल्क वसूलने की मंजूरी है। हालांकि ज्यादातर बड़ी योजनाएं (5,000 करोड़ रुपये से अधिक) हर साल निवेश के 1.5 फीसदी से ज्यादा शुल्क नहीं वसूल कर सकतीं। अगर आप इंडेक्स फंड निवेशक हैं तो आपके लिए यह शुल्क 1 फीसदी से भी कम हो सकता है। 
 
प्रतिफल की पड़ताल 
 
किताबी तौर पर देखें तो बीमा फंडों से बेहतर प्रतिफल मिलने की संभावना बनी रहती है क्योंकि उन्हें लंबी अवधि के लिए रकम हासिल होती है। मगर असल में ऐसा नहीं है। एडलवाइस टोक्यो लाइफ इंश्योरेंस के मुताबिक इक्विटी लार्ज-कैप इंश्योरेंस फंडों का पांच साल का औसत प्रतिफल सालाना 12.9 फीसदी रहा है। लेकिन उसी अवधि में म्युचुअल फंड श्रेणी के लार्ज-कैप फंडों का औसत प्रतिफल 13.2 से 13.3 फीसदी रहा है। वैल्यू रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक बीमा फंडों की मिड-कैप श्रेणी का पांच साल का औसत प्रतिफल 18.7 फीसदी है, जबकि म्युचुअल फंडों के मामले में इसी अवधि का औसत प्रतिफल 19.4 फीसदी रहा है। 
 
एडलवाइस टोक्यो लाइफ इंश्योरेंस के मुख्य खुदरा अधिकारी अनूप सेठ ने कहा, 'यह कहना वाकई बहुत मुश्किल है कि किसी एक योजना ने दूसरी योजना के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। बीमा और म्युचुअल फंड दोनों ही ऐसी योजनाएं हैं, जिनका प्रबंधन अच्छी तरह से किया जाता है और जिन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है। लेकिन दोनों ही श्रेणियों में कुछ योजनाएं ऐसी भी हैं, जितना न तो प्रबंधन अच्छा रहा है और न ही जिन्होंने ठीकठाक प्रदर्शन किया है।' फिर भी दोनों के प्रदर्शन को पैमाना मानकर अगर निवेशक उनमें से किसी एक को चुनना चाहे तो उसके लिए क्या बेहतर होगा? इस पर मॉर्निंगस्टार इंडिया में निदेशक (फंड अनुसंधान) कौस्तुभ बेलापुरकर की सलाह है, 'इस समय ऐसा बता पाना बिल्कुल भी संभव नहीं हैं। उसकी वजह यह भी है कि कुछ बीमा कंपनियां ही अपने फंडों के बारे में पूरी जानकारी का खुलासा करती हैं। बहुत सी कंपनियां केवल उतनी ही जानकारी सार्वजनिक करती हैं, जितनी उनके लिए बीमा नियामक के निर्देशानुसार करना जरूरी है।'
 
म्युचुअल फंडों में चयन का एकमात्र मापदंड प्रदर्शन है। लेकिन कोई भी व्यक्ति यूलिप का चुनाव कई कारणों से करता है। कुछ के लिए यूलिप कर बचाने का अच्छा साधन होता है तो कुछ बीमा योजनाओं की खूबियों और लंबी अवधि के निवेश के लिहाज से यूलिप खरीद लेते हैं। अवीवा लाइफ इंश्योरेंस के मुख्य निवेश अधिकारी (सीआईओ) प्रशांत शर्मा ने कहा, 'किसी भी यूलिप के चयन का एक महत्त्वपूर्ण मापदंड फंड का प्रदर्शन है, लेकिन केवल उसी को आधार बनाकर फंड खरीदना भी ठीक नहीं होगा।'
 
समान, मगर कई अंतर भी 
 
हालांकि बीमा फंड और म्युचुअल फंड एकसमान योनजाओं में निवेश करते हैं, लेकिन उनके निवेेश पर नियंत्रण करने वाले जो नियम-कायदे हैं, उनमें बहुत फर्क है। रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस कंपनी में सीआईओ अखिलेश गुप्ता समझाते हैं, 'उदाहरण के लिए बीमा कंपनियां बैंकिंग, वित्तीय सेवा और बीमा (बीएफएसआई) क्षेत्र में निवेश तो कर सकती हैं, लेकिन किसी भी फंड में उनके कुल निवेश की 25 फीसदी से अधिक राशि इन श्रेणियों में नहीं लग सकती।' इसके उलट अगर म्युचुअल फंडों की बात की जाए तो उन पर केवल शेयरों के मामले में कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसलिए अगर शेयर बाजार में तेजी बैंकिंग क्षेत्र के शेयरों के कारण आती है तो म्युचुअल फंड जाहिर तौर पर बीमा फंडों की तुलना में निवेश पर बेहतर प्रतिफल देंगे। म्युचुअल फंड वायदा एवं विकल्प में भी निवेश कर सकते हैं, लेकिन बीमा फंडों को उस रास्ते पर जाने की इजाजत नहीं दी गई है। उतार-चढ़ाव भरे बाजार में अगर वायदा एवं विकल्प में निवेश कर लिया जाए तो गिरावट के जोखिम से बचने में मदद मिलती है। 
 
इसके अलावा अब म्युचुअल फंडों का पुनवर्गीकरण कर दिया गया है, जिसके बाद उन्हें अपने दायरे में ही काम करना होगा।उदाहरण के लिए किसी मिड-कैप फंड को अब कम से कम 65 फीसदी धनराशि का निवेश मिड-कैप कंपिनयों की इक्विटी और इक्विटी से संबंधित योजनाओं में ही करना होगा। बाजार नियामक ने लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल कैप की परिभाषा का मानदंड तय कर दिया है। मगर बीमा फंडों पर इस सिलसिले पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। अगर शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव आता है तो मिड और स्मॉल कैप बीमा फंड लार्ज-कैप में अपना निवेश बढ़ा सकते हैं।
 
पारदर्शिता और लचीलेपन का मसला 
 
बहुत से निवेश सलाहकार यह कहते रहे हैं कि बीमा कंपनियों को और अधिक पारदर्शी बनना चाहिए। बहुत सी बीमा कंपनियां अपने बाजार में ज्यादा मुकाबला देखकर अपने फंडों के प्रदर्शन से जुड़ा पूरा ब्योरा नहीं देती हैं। कुछ संपत्ति प्रबंधन कंपनियों ने इन बीमा फंड कंपनियों से कहा कि वे उनकी फंड प्रबंधन टीम से मिलना चाहती हैं और निवेश के उनके सिद्घांत और उस सिलसिले में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को समझना चाहती हैं। लेकिन कुछ बीमा फंड कंपनियों ने इसकी इजाजत देने से भी साफ इनकार कर दिया। पारदर्शिता नहीं होने के कारण स्थिति ऐसी हो गई है कि निवेशक यही नहीं समझ पा रहे हैं कि शुल्क किस तरह लगाए गए हैं। जब कोई बीमा कंपनी प्रीमियम हासिल करती है तो फीस का कुछ हिस्सा जैसे पॉलिसी आवंटन शुल्क पहले ही काट लिया जाता है। शेष धन फंड में जोड़ा जाता है। उसके बाद हर महीने फंड की नेट एसेट वैल्यू (एनएवी) में मॉर्टेलिटी चार्ज और पॉलिसी प्रशासन शुल्क समायोजित किए जाते हैं। इस वजह से निवेशक के लिए शुल्कों को समझना मुश्किल हो जाता है।
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