बिजनेस स्टैंडर्ड - सच के मुलम्मे में झूठ परोसती 'द ताशकंद फाइल्स'
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सच के मुलम्मे में झूठ परोसती 'द ताशकंद फाइल्स'

मानवी कपूर /  April 12, 2019

अगर आप ट्विटर पर विवेक अग्निहोत्री को फॉलो करते हैं तो आप उनकी फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' से कुछ अलग की उम्मीद भी नहीं कर सकते हैं। झूठ को इस तरह तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है कि वह सच लगे, उसमें विवादित तथ्य होते हैं और आसान एवं लोगों की जुबान पर जल्द चढऩे वाले टैग्स होते हैं। अगर ये सबकुछ किसी एक फिल्म में शामिल हों तो फिर सिरदर्द होना लाजिमी है। वैसे यह भी हो सकता है कि अग्निहोत्री के साथ वैचारिक जुड़ाव होने पर  आप उनकी फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' में इतिहास, तार्किकता और लोकतंत्र के साथ भी किया गया नाटकीय घालमेल देखना पसंद करें। 

 
करीब ढाई घंटे की इस फिल्म के बारे में कुछ तथ्य उजागर करने से मैं खुद को नहीं रोक पा रही हूं। 'द ताशकंद फाइल्स' में गूगल पर सर्च किए जाने वाले उस मशहूर सवाल को ही उठाया गया है कि देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत हृदयगति रुकने से हुई थी या उसमें कोई रहस्य था? मौत के पीछे हत्या की साजिश होने में यकीन करने वाले लोगों को इस बात से भी बल मिलता रहा है कि ताशकंद में हुई प्रधानमंत्री की मौत से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करने से भारत सरकार इनकार करती रही है। 
 
मिथुन चक्रवर्ती ने इस फिल्म में धोती पहनने वाले नेता श्याम सुंदर त्रिपाठी की भूमिका निभाई है जो शास्त्री के निधन से जुड़ा रहस्य उजागर करने के अभियान में लगे हैं। हालांकि वह इस लड़ाई में अकेले नहीं हैं। पत्रकार रागिनी फुले की भूमिका निभा रहीं श्वेता बसु प्रसाद एक समाचार पोर्टल के लिए काम करती हैं लेकिन कई बार वह फर्जी खबरें भी पोस्ट करती रहती हैं। जब वह शास्त्री की मौत पर सवाल उठाने वाली एक रिपोर्ट लिखती हैं तो सत्ताधारी दल एक जांच समिति बनाने का फैसला करता है। सत्ताधारी दल के नेता पीकेआर नटराजन की भूमिका नसीरुद्दीन शाह ने निभाई है। फिल्म कौशल से अधिक अपने विभाजनकारी राजनीतिक विचारों के लिए चर्चित अग्निहोत्री का इस दुष्प्रचार करने वाली फिल्म में काम करने के लिए नसीर और प्रकाश बेलावाडी जैसे अभिनेताओं को काम करने के लिए राजी करना भी मेरे लिए किसी रहस्य से कम नहीं है।
 
वैसे इस फिल्म की 'स्टार' रागिनी ही हैं। वह न केवल विपक्षी नेता त्रिपाठी से सौदेबाजी करती हैं बल्कि वह उजबेकिस्तान में जासूसों पर नजर भी रखती हैं, इंडिया गेट पर दिन में मुखबिरों से मिलती हैं और गूगल पर भ्रामक तथ्यों के बारे में जानकारी भी जुटाती हैं। हालांकि शास्त्रीजी की समाधि पर जाने के बाद उनका वह रूप भी नजर आता है जिसमें वह चीत्कार के साथ दिवंगत प्रधानमंत्री की प्रतिमा से मदद की गुहार लगाती हैं। जब भी वह बोलना शुरू करती हैं, मैंने अपने कानों को ढंक लेना ही बेहतर समझा। 
 
फिल्म के संवादों के जरिये खलनायकों के बारे में जानकारी अपने-आप मिल जाती है। वे फिल्म में नजर नहीं आते हैं लेकिन त्रिपाठी के शब्दों में कहें तो बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक और टीआरपी जैसे तमाम 'आतंकवादी' देश को बरबाद कर रहे हैं। कांग्रेस, वामदल, उदारवादी, पत्रकार और इतिहासकार भी इसमें खलनायक-नुमा हैं जिन्हें उदाहरणों के जरिये पेश किया गया है। जैसे, एक फैशनपरस्त एनजीओ कार्यकर्ता की भूमिका निभा रहीं मंदिरा बेदी को सरकार का 'कट्टïर विरोधी' बताया जा रहा है।
 
पल्लवी जोशी को व्हीलचेयर पर आश्रित एक ऐसी इतिहासकार के तौर पर पेश किया गया है जो शास्त्री की मौत के बारे में किताब की लेखिका होने के बावजूद किसी भी दावे को काट नहीं पाती हैं। इस किरदार के जरिये अग्निहोत्री समूचे बुद्धिजीवी तबके पर टिप्पणी करते हैं। इसी तरह फिल्म में कैरवां के संपादक हरतोश सिंह बल की तरह नजर आने वाला एक न्यूज़ ऐंकर भी है जो ज़ी न्यूज़ के लिए रागिनी का साक्षात्कार करता है। सच तो यह है कि फिल्म में अनगिनत बार विरोधाभास नजर आते हैं। लापरवाही से पटकथा लिखे जाने और खराब फिल्मांकन के चलते यह फिल्म दिन में टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले सोप ओपेरा के लिए भी मुफीद नहीं है। यह फिल्म उस खतरनाक प्रवृत्ति की ही पैदाइश है जिसमें कुछ तथ्यों के साथ ढेर सारी अफवाहों का घालमेल किया जाता है और फिर उसे ऐतिहासिक तथ्य के तौर पर पेश किया जाता है। दुर्भाग्य से सच्चाई का यह संस्करण भी बिकता है। लेकिन अग्निहोत्री शायद भूल गए हैं कि पिछले पांच वर्षों से कांग्रेस सत्ता से दूर है और शास्त्री के मौत से संबंधित फाइलें सार्वजनिक करने से मौजूदा सरकार को किसी ने भी नहीं रोका था।  लेकिन शायद इससे भी बड़ा सवाल यह है कि यह फिल्म देखने के बाद मेरे मस्तिष्क की कोशिकाओं को जो नुकसान हुआ है, क्या उसकी कभी भरपाई हो पाएगी?
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