बिजनेस स्टैंडर्ड - नकदी प्रवाह में देरी और फंसा हुआ कर्ज
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नकदी प्रवाह में देरी और फंसा हुआ कर्ज

श्याम पोनप्पा /  April 12, 2019

भुगतान में होने वाला विलंब अपने साथ कई तरह की समस्याएं लाता है। यह गैर निष्पादित परिसंपत्तियों का सबब भी बनता है। इस व्यवस्था में सुधार करना आवश्यक है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा 

 
देश में तमाम ऐसे लोग हैं जो मानकों और कानून प्रवर्तन में शिथिलता के अभ्यस्त हो गए हैं। शुरुआती तौर पर इनमें से एक, भुगतान में देरी पर बात करते हैं। आमतौर पर नागरिक, किसान, कॉर्पोरेट, छोटे कारोबारी और सरकारी एजेंसियां, सभी इसके शिकार होते हैं। ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि भुगतान में देरी ऐसी कई घटनाओं में से एक है जिनका सामना हमें करना पड़ता है।  भुगतान में देरी, प्रक्रियात्मक प्रवाह की समस्याओं की शुरुआत है जो आगे चलकर फंसे हुए कर्ज की समस्या में तब्दील हो जाता है। शायद नकदी प्रवाह में देरी हमारी प्रक्रियाओं की बुनियादी खामी है जिसे हमें दूर करना ही होगा। इसके बाद ही हम विभिन्न समस्याओं को दूर करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। 
 
जरा सरकारी भुगतान में होने वाली देरी पर विचार कीजिए। केंद्र और राज्य सरकारों के भुगतान में अक्सर देरी होती है। निजी क्षेत्र में तो ऐसा कहीं अधिक होता है। यहां तक कि उच्च प्राथमिकता वाले आईटी सिस्टम से संबंधित सरकारी भुगतान में भी बहुत अधिक देरी होती है। अधिकांश प्रमुख आईटी कंपनियां यह शिकायत करती हैं कि उन्हें इसी वजह से बड़ी परियोजनाओं में धनहानि होती है। नैसकॉम के कुछ वर्ष पुराने अनुमान के मुताबिक आईटी उद्योग पर सरकारी बकाया राशि 5,000 करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है।
 
कुछ ऐसे कारक हैं जो घरेलू परियोजनाओं को आईटी उद्योग के लिए आकर्षक बनाते हैं। इनमें बड़े घरेलू आईटी बाजार, राज्यों और केंद्र सरकारों की बड़ी परियोजनाएं और बीते कुछ वर्ष से निर्यात में आ रहा धीमापन आदि शामिल हैं। हालांकि इसमें कम मार्जिन, सरकारी अनुबंधों में लगने वाला लंबा समय, भुगतान में देरी और भुगतान को लेकर विवाद तथा मुकदमों आदि की स्थिति भी बनती है। बड़ी आईटी कंपनियों की यह भी शिकायत है कि सरकारी प्रक्रियाओं में अक्सर अनुबंध में बदलाव भी किया जाता है। यही वजह है कि ये कंपनियां घरेलू सरकारी परियोजनाओं से दूरी बरतती हैं।
 
इस अवसर लागत से इतर भुगतान में देरी अर्थव्यवस्था में नकदी का संकट उत्पन्न करती है। बकाया कई महीने और कई बार वर्षों तक बढ़ता रहता है। आईटी के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी यही समस्या है। उदाहरण के लिए विनिर्माण उद्योग में निजी ठेकेदारों का करीब एक लाख करोड़ रुपये से तीन लाख करोड़ रुपये का बकाया देरी के कारण उलझा हुआ है। कुछ बैंकों का फंसा हुआ कर्ज निस्संदेह धोखाधड़ी और विभिन्न प्रकार के अपराध की बदौलत उत्पन्न होता है। वाणिज्यिक रूप से मजबूत परियोजनाओं में नकदी की समस्या फंसे हुए कर्ज को जन्म दे सकती है। बिजली उत्पादक कंपनियों में हम देख चुके हैं कि तनावग्रस्त परिसंपत्ति किस प्रकार फंसे हुए कर्ज की वजह बन सकती है।
 
बिजली मंत्रालय का पोर्टल दिखाता है कि जनवरी 2019 में बिजली वितरकों का बिजली उत्पादक कंपनियों पर बकाया 28,504 करोड़ रुपये था। इस बीच सर्वोच्च न्यायालय में 1.4 लाख करोड़ रुपये के फंसे हुए कर्ज वाली 34 कंपनियां आरबीआई के 12 फरवरी, 2018 के परिपत्र के विरुद्ध जूझ रही थीं। यह परिपत्र देनदारी चूकने वाली कंपनियों के तय समय में निस्तारण न करने पर ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत मामला चलाने की बात कहता था। बिजली मंत्रालय और आपूर्तिकर्ताओं ने आरबीआई के परिपत्र पर आपत्ति की और कहा कि कई मामलों में फंसे हुए कर्ज पर कर्जदार का नियंत्रण ही नहीं था। 
 
इन कारकों में सरकारी वितरकों द्वारा भुगतान में देरी, कोयला आपूर्ति में समस्या या जैसा कि कुछ अन्य मामलों में देखा कर्जदारों का समूह ऋण पुनर्गठन के करीब था और दिवालिया घोषित होने से उनको कोई मदद नहीं मिलती। कई बैंकरों ने सुझाव दिया कि आरबीआई के परिपत्र के मुताबिक 180 दिन में निपटान की बात अव्यावहारिक थी। जब डिफॉल्ट कर्जदार की पहुंच से बाहर की वजहों से होता है तब बड़े बैंक पुनर्गठन पर विचार करते हैं। इसमें राज्य बिजली बोर्ड के भुगतान में देरी अथवा सरकारी एजेंसियों, राज्य सरकार के बकाये या अन्य विपरीत परिस्थितियां मसलन कोयला आपूर्ति में बाधा आदि शामिल हैं।
 
सर्वोच्च न्यायालय ने आरबीआई के फरवरी 2018 के परिपत्र को 2 अप्रैल, 2019 को खारिज कर दिया। शायद अब इन परियोजनाओं को लेकर कहीं अधिक सकारात्मक राह निकले क्योंकि आरबीआई और बैंक अब कहीं अधिक सकारात्मक पुनर्गठन के विकल्प तलाशेंगे। लंबित परियोजनाएं जो विभिन्न वजहों से परिचालन योग्य नहीं रह गई थीं। मिसाल के तौर पर जहां ईंधन आपूर्ति की दिक्कत है या बिजली क्रय समझौते नहीं हैं या फिर ग्राहकों का बकाया ज्यादा है, उन्हें अगर ग्राहक मिलने पर बेच भी दिया जाए तो भी यह विकल्प समस्या को हल करने वाला नहीं नजर आता। 
 
परियोजनाएं तब तक लंबित या अनुत्पादक बनी रहेंगी जब तक उनकी अपर्याप्तताओं को दूर नहीं किया जाएगा। यानी उन्हें ईंधन नहीं मिलेगा, बिजली खरीद के समझौते नहीं होंगे या बकाया भुगतान नहीं किया जाएगा। जब तक ये कमियां दूर नहीं की जाती हैं तब तक समस्या बरकरार रहेगी।  आम धारणा दिवालिया परियोजनाओं की बिक्री की पक्षधर है। हालांकि यह कटु सत्य है कि उनको बेचने से उन परिस्थितियों में कोई सुधार नहीं होगा जिन्होंने डिफॉल्ट की स्थिति उत्पन्न की है। बेहतर यही होगा कि हम इस रुख को त्याग दें जहां डिफॉल्ट की वजहों को रेखांकित करने और उनमें सुधार करने के बजाय परियोजनाओं की बिक्री करके उनसे निजात पाने की कोशिश की जाती है।
 
क्या करने की जरूरत है?
 
समय पर भुगतान के मानक तैयार करना हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इनका अनुपालन न करने वालों पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को इस विषय पर पहल करनी होगी और इसे शासन का अनिवार्य अंग बनाना होगा। ये कठिन कदम अपने आप में दिक्कतदेह हो सकते हैं लेकिन फंसे हुए कर्ज की समस्या से निजात पाने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। आरबीआई को नियामकीय निगरानी की व्यवस्था करनी होगी, उसे वास्तविक और समयबद्घ निगरानी और रिपोर्टिंग व्यवस्था बनानी होगी और जरूरी कदम तत्पर होकर उठाने होंगे। समुचित डिजाइन और तंत्र के साथ कर्ज को फंसे हुए कर्ज में तब्दील होने से रोका जा सकेगा। ऋण के नवीनीकरण के लिए अलग व्यवस्था की जा सकती है ताकि सामान्य कर्ज फंसे कर्ज में न बदले। इन समन्वित प्रयासों की बदौलत ही अच्छी परिसंपत्तियों को संकटग्रस्त होने से बचाया जा सकता है। 
Keyword: payment, farmer, corporate, IT, power,,
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