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नतीजे बनाम निष्कर्ष

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 12, 2019

यह सच है कि किसी चुनाव के नतीजों  के बारे में सटीक पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है लेकिन तमाम ओपिनियन पोल ने लगभग एक जैसे नतीजे दिए हैं। इनके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता में वापसी कर रही है। पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभर सकती है और आगामी सरकार एक गठबंधन सरकार हो सकती है। ऐसे में पार्टी के चुनाव घोषणापत्र पर करीब दृष्टि डालनी होगी। खासतौर पर इसलिए क्योंकि 2014 के घोषणापत्र में किए गए कई वादों ने मोदी सरकार के कदमों को संचालित किया। फिर चाहे मामला डिजिटलीकरण और तकनीक आधारित उपायों का हो, स्वच्छ भारत का या फिर गो संरक्षण का। विकास को लेकर मोदी के रुख की एक अहम बात यह है कि वह निष्कर्ष के बजाय नतीजों पर जोर देते हैं। 

 
उदाहरण के लिए कितनी रेलवे लाइनों का विद्युतीकरण किया गया यह नतीजा है जबकि रेलवे माल ढुलाई के आकार और उसकी गति पर इसका क्या असर हुआ यह निष्कर्ष है। जन धन योजना में कितने खाते खोले गए यह नतीजा होगा जबकि उन खातों के कितना लेनदेन किया गया, इससे हम एक निष्कर्ष पर पहुंच सकेंगे। बंदरगाह की क्षमता में इजाफा नतीजा है जबकि निर्यात और आयात की स्थिति से निष्कर्ष निकाला जा सकता है। इसका तात्पर्य उत्पादन को नकारना नहीं है। देश में राजमार्ग निर्माण की गति ने व्यापक अंतर पैदा किया है। परंतु यह भी साफ है कि नतीजों से अगर निष्कर्ष में बदलाव नहीं आता है तो वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं। उदाहरण के लिए विद्यालयों में कमरों की संख्या चिकित्सकों की संख्या से काम नहीं चलेगा बल्कि साक्षरता और जीवन संभाव्यता मायने रखते हैं। इस मोर्चे पर बांग्लादेश हमसे आगे निकल चुका है।
 
इस नजरिये से देखें तो भाजपा का घोषणापत्र नतीजों की बात से भरा हुआ है: 75 नए मेडिकल कॉलेज की शुरुआत, राष्ट्रीय व्यापारी कल्याण बोर्ड की स्थापना, हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी करना, पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल करना वगैरह। अगर लक्ष्य बहुत महत्त्वाकांक्षी हों तो निष्कर्ष पर ध्यान केंद्रित करना अपेक्षाकृत मामूली बात है। मिसाल के तौर पर निर्यात को पांच वर्ष में दोगुना करना अथवा किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करने की बात जो हकीकत से दूर है। 
 
वादे के मुताबिक अगर जीडीपी को 2018 के 2.7 लाख करोड़ डॉलर से 2025 तक 5 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचाना है तो हमें 9 फीसदी से अधिक की वार्षिक वृद्घि हासिल करनी होगी। घोषणापत्र में कहा गया है कि बीते पांच वर्ष में हमने अधिकतम 7.3 फीसदी की दर से वृद्घि हासिल की। ऐसे में यह उपरोक्त दर हासिल करने के लिए क्या किया जाएगा यह स्पष्ट नहीं। 2014 में कहा गया था कि देश को विनिर्माण का केंद्र बनाया जाएगा। इस बात को फिर दोहराया गया है। सवाल यह है कि इस बार ऐसा क्या किया जाएगा जो पहले नहीं किया गया? या फिर अगले पांच वर्ष में निर्यात को दोगुना कैसे किया जाएगा जबकि पिछले पांच वर्ष में निर्यात वृद्घि संभवत: चार दशक में सबसे धीमी रही?
 
घोषणापत्र की एक और बात यह है कि एक ओर जहां नतीजों से जुड़े लक्ष्यों और सरकारी कार्यक्रमों की भरमार है, वहीं नीतिगत मोर्चे पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। नीतियों के प्रति यह पूर्वग्रह मोदी सरकार की पहचान रहा है और नए घोषणापत्र में भी पुरानी कहानी दोहराई है। बीते पांच वर्ष में निर्यात और विनिर्माण के मोर्चे पर नाकामी की तमाम वजहें हैं। कृषि की विफलता की वजह भी स्पष्ट हैं। इन कारणों का उल्लेख और वजहों का उल्लेख नहीं किया जाना भी घोषणापत्र की नाकामी है। यह समझना जरूरी है कि भारतीय कृषि कमी से अधिशेष की स्थिति में पहुंच चुकी है लेकिन नीतियां अभी भी वही पुरानी हैं और उन्हें कृषि निर्यात से या अधिशेष से निपटने की दृष्टि से नहीं बदला गया है। खाद्य प्रसंस्करण और बहुफसली खेती की मदद से ऐसा किया जा सकता है। अगर इस बात को नहीं समझा गया तो कृषि उत्पादों की कीमत में कमी की समस्या हल नहीं होगी। भाजपा ने ब्याज रहित ऋण की बात कही है, वह समस्या का हल नहीं है। 
 
आप कह सकते हैं कि घोषणापत्र में इतनी ही बात कही जा सकती है और यह किसी थिंकटैंक का प्रपत्र नहीं है। कांग्रेस के एक सदस्य से जब पूछा गया कि पार्टी की बड़ी कल्याण योजना कैसे काम करेगी तो उसका जवाब कमोबेश यही था। अगर चुनावी वादों को विश्वसनीय बनाना है, खासतौर पर जब उसमें बड़े व्यय पैकेज या अतीत के रिकॉर्ड में बदलाव की बात कही गई तो नीतियों को लेकर व्यावहारिक सवालों पर खामोशी से बात नहीं बनती।
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