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रिजर्व बैंक गैरजवाबदेह और कानून से ऊपर?

देवाशिष बसु /  April 11, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) क्या सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम को केंद्रीय सूचना आयुक्तों और उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों से भी बेहतर ढंग से समझता है? ऐसा लगता है कि वर्ष 2006 के बाद से आरबीआई की कमान संभाल चुके चार गवर्नरों, दर्जनों डिप्टी गवर्नरों और उनके मातहत अधिकारियों की सोच ऐसी ही रही है जो नागरिकों एवं कानूनविदों के बीच गहरी हताशा और निराशा का सबब रहा है। क्या उच्चतम न्यायालय का कोप इस भयंकर दंभ को खत्म कर देगा?

उच्चतम न्यायालय ने आरटीआई अधिनियम के तहत वार्षिक निगरानी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने पर हाल ही में आरबीआई को अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की चेतावनी दी। दुखद रूप से यह तमाशा पिछले कई वर्षों से जारी है। गत 10 वर्षों या अधिक समय से आरबीआई अपनी निगरानी रिपोर्ट और इरादतन चूककर्ताओं की सूची सार्वजनिक करने की मांग करने वाले आरटीआई आवेदनों को नकारता आ रहा है।

उच्चतम न्यायालय के अलावा केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) भी यह कह चुका है कि आरबीआई बैंकों की निगरानी से संबंधित अपनी वार्षिक रिपोर्टें सार्वजनिक करने से मना नहीं कर सकता है। इसके बावजूद आरबीआई ने अडिय़ल रवैया अपनाए रखा है। इसे देखकर हमें कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है। आरबीआई के इस अक्खड़पन की एक वजह है।

दशकों तक आरबीआई अपने भारी गोलमाल के बाद भी बचा रहा। उसके पुराने दौर की रवायतें और प्रणालियां इस प्रतिभूति घोटाले की मुख्य वजह थीं। विशिष्ट क्षेत्र में रहने वाले गवर्नर और डिप्टी गवर्नरों को सार्वजनिक ऋण कार्यालय के कामकाज के बारे में कुछ पता ही नहीं था और न ही उन्हें ब्रोकरों और बैंकरों के फैलाए गड़बड़झाले के बारे में ही कोई सुराग था। करीब 25 वर्षों तक सार्वजनिक बैंक बैंकरों के साथ मिलीभगत करने वाले छोटे-बड़े कर्जदाताओं के हाथों लुटते रहे हैं। 

आरबीआई के प्रतिनिधि इन बैंकों के बोर्ड में शामिल होते हैं और उसकी बैंकों के बहीखाते तक सीधी पहुंच होती है, वह वैधानिक ऑडिटरों को मंजूरी देता है, बैंकों से मासिक, तिमाही और वार्षिक रिपोर्ट मंगवाता है और बैंकों के चेयरमैन एवं कार्यकारी निदेशकों की नियुक्ति में भी उसकी हिस्सेदारी होती है। असल में, आरबीआई इकलौता ऐसा संगठन है जिसे बैंकिंग क्षेत्र में 25 साल से जारी लूट के बारे में सबकुछ पता है। इसके बावजूद बैंकों के दिवालिया होने और बड़े पैमाने पर कर्ज फंसने पर बैंकों में नए सिरे से पूंजी डालने की स्थिति पैदा होने पर भी आरबीआई पर कभी कोई आरोप नहीं लगे हैं। 

दरअसल 'सार्वजनिक बुद्धिजीवी' रघुराम राजन समेत तमाम गवर्नरों के कार्यकाल में आरबीआई ने कॉर्पोरेट ऋण पुनर्गठन (सीडीआर), रणनीतिक ऋण पुनर्गठन, टिकाऊ पुनर्गठन योजना, सीडीआर-2 और 5/25 जैसी तमाम नाकाम योजनाओं के जरिये फंसे कर्ज की समस्या बढ़ाने में ही मदद की है। और आरबीआई की नियामकीय खामियों के बढ़ते जाने के बीच यह बैंकों की उपभोक्ता-विरोधी नीतियों और कदमों के ही साथ खड़ा रहा है।

जब मनीलाइफ फाउंडेशन ने फ्लोटिंग दर प्रणाली के जरिये हो रही कर्जदारों की लूट के मसले पर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की तो न्यायालय ने आरबीआई से इस पर जवाब देने को कहा था लेकिन केंद्रीय बैंक ने उस निर्देश को भी अनसुना कर दिया। इस याचिका में उठाए गए मसलों का कोई उल्लेख उसके जवाब में नहीं नजर आया।

आरबीआई ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के निर्देश के बाद भी आरटीआई अधिनियम की अवहेलना क्यों की है? आरबीआई की दलील है कि आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारियां 'वैधानिक विश्वास' से संबंधित हैं लिहाजा उन्हें सार्वजनिक दायरे में नहीं रखा जा सकता है। यह काफी बेतुका है।

एक नियामक अपने नियमन में आने वाली इकाइयों को खास तरह की जानकारियां देने के लिए बाध्य करता है। यह रिश्ता भला वैधानिक विश्वास का संबंध कैसे हो सकता है? वकील प्रशांत भूषण ने उच्चतम न्यायालय में यह दलील दी थी कि सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के किसी भी बैंक का लाभ बढ़ाना आरबीआई का वैधानिक दायित्व नहीं है लिहाजा दोनों पक्षों के बीच विश्वास का रिश्ता ही नहीं बनता है। असल में, उच्चतम न्यायालय पहले ही कह चुका है कि आरबीआई किसी भी बैंक के साथ विश्वास-जनित रिश्ते में नहीं है। 

सवाल है कि आरबीआई को कब तक इस जिद पर चलने दिया जाएगा? दिसंबर 2015 में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि आरबीआई विश्वासपरक रिश्तों का हवाला देते हुए आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी देने से मना नहीं कर सकता है। न्यायमूर्ति एम वाई इकबाल और न्यायमूर्ति सी नागप्पन के खंडपीठ ने कहा था, 'अतीत में हम देख चुके हैं कि वित्तीय संस्थानों ने लोगों के साथ धोखाधड़ी की कोशिश की है। ऐसे काम न तो देश और न ही यहां के नागरिकों के हित में हैं।

आश्चर्य की बात है कि एक वॉचडॉग के तौर पर आरबीआई को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचनाएं आम लोगों तक पहुंचाने के लिए अधिक समर्पित होना चाहिए। हालांकि हम यह भी समझते हैं कि आरबीआई को हरेक कदम के लिए जिम्मेदार ठहराने की स्थिति में नहीं डाला जाना चाहिए। आरबीआई को आरटीआई अधिनियम की धारा 10(1) के तहत जानकारी देनी चाहिए।'

इतना स्पष्ट आदेश देने के तीन साल बीत जाने पर भी उच्चतम न्यायालय आरबीआई के आलाकमान को इसकी अहमियत समझा पाने में खुद को नाकाम महसूस कर रहा है। जनवरी 2019 में भी उच्चतम न्यायालय ने कहा था, 'आरबीआई को पारदर्शिता का पालन करना चाहिए और बैंकों को असहज करने वाली सूचना छिपानी नहीं चाहिए। उसका दायित्व है कि आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों का अनुपालन करे और मांगी गई जानकारी दे।' अजीब बात है कि खुद आरबीआई ने भी 23 अप्रैल 1994 को जारी अपने एक परिपत्र में सभी बैंकों को यह निर्देश दिया था कि वे चूककर्ताओं के बारे में बैंकों और वित्तीय संस्थानों के साथ जानकारी साझा करे।

मार्दिया केमिकल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ वाद में उच्चतम न्यायालय ने 8 अप्रैल, 2004 को सुनाए अपने फैसले में भी कहा था कि निजी लेनदेन अगर बड़े आकार का हो तो वह जनहित से जुड़ा मामला हो जाता है क्योंकि बैंकों में आम जमाकर्ताओं से मिली राशि का ही इस्तेमाल होता है। ऐसे में यह मानना नामुमकिन है कि आरबीआई के अधिकारियों को यह पता न हो। शायद वे नहीं चाहते हैं कि फंसे कर्जों की समस्या से निपटने के मामले में उनकी अक्षमता एवं कपटपूर्ण आचरण के बारे में किसी को पता चले।

(लेखक वेबसाइट मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं)
Keyword: RBI, Governor, Report, Supreme Court, Reserve Bank, Defaulter, RTI Application, CEO, Lender, CDR, Moneylife Foundation,
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