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बदलाव आवश्यक

संपादकीय /  April 11, 2019

सरकार के फेम-2 (फास्टर एडॉप्शन ऐंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ हाइब्रिड ऐंड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स इन इंडिया) कार्यक्रम की इसके मानकों को लेकर पहले ही आलोचना हो चुकी है। अभी हाल में बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने इस पर आरोप लगाया कि यह देश में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों की पर्याप्त मांग सुनिश्चित किए बिना ही विनिर्माण को बढ़ावा देने का काम कर रहा है।

फेम-2 को फरवरी में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी थी और तीन वर्ष के दौरान इसकी लागत करीब 10,000 करोड़ रुपये से अधिक आएगी। इसके जरिये इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड कार निर्माताओं को प्रोत्साहन देने का इरादा है। बजाज का मानना है कि इन कदमों के बजाय कोशिश यह की जानी चाहिए कि वाहन निर्माताओं को प्रति वर्ष एक खास संख्या में इलेक्ट्रिक वाहन बनाने को कहा जाए। यहां बजाज का सोचना गलत हो सकता है।

इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों को तेजी से अपनाने की दिशा में प्रोत्साहन देना ही सबसे बेहतर तरीका है। देश के उद्यमी जगत का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा रहा है जहां एक के बाद दूसरी सरकार ऐसी बातें कहती रही है लेकिन कुछ खास नहीं हुआ। ऐसा दोहराया नहीं जाना चाहिए। ऐसा कहने का यह तात्पर्य बिल्कुल नहीं है कि फेम-2 के प्रभाव में सुधार लाने के लिए भी उसमें कोई बदलाव नहीं लाना चाहिए।

उदाहरण के लिए यह बात बिल्कुल सही है कि यह छोटे वाहनों को एक प्रकार से हतोत्साहित करता है क्योंकि प्रोत्साहन राशि का सीधा संबंध वाहन में प्रयोग की गई बैटरी के आकार से जुड़ा हुआ है। इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन और तीन पहिया वाहन भारतीय परिस्थितियों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठï हैं। हकीकत में छोटे इलेक्ट्रिक स्कूटरों में यह क्षमता है कि वे देश के शहरी परिवहन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकें।

इलेक्ट्रिक स्कूटरों पर राइड साझा करने का चलन पहले ही पश्चिमी दुनिया में शुरू हो चुका है और इसे काफी अच्छा माना जा रहा है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फेम-2 को इस प्रकार तैयार किया जाए कि इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों का चलन कमजोर पडऩे के बजाय गति पकड़े। 

हालांकि बजाज का यह कहना सही है कि सरकार की नीति में एक मूलभूत विसंगति है। फेम-2 को कुछ इस प्रकार तैयार किया जाना चाहिए कि मांग में सुधार हो, न कि उत्पादन को स्थानीय बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। फिलहाल इन वाहनों को योजना का लाभ मिलने के लिए यह आवश्यक है कि 50 फीसदी वाहन स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए हों।

सरकार को सौर पैनलों को लेकर छिड़ी लड़ाई से सबक सीखना चाहिए था। ऐसे में बेहतर यही है कि पहले अनुकूलन तैयार किया जाए, उसके बाद ही स्थानीय उद्योग तैयार किया जाना चाहिए। इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों के मामले में तो यह बात ज्यादा सही है क्योंकि हमारे यहां पहले ही वाहन क्षेत्र, दोपहिया और तिपहिया वाहन, साइकिल और वाहन कलपुर्जा क्षेत्र में काफी विशेषज्ञता मौजूद है। ध्यान इस बात पर केंद्रित किया जाना चाहिए कि उपभोक्ताओं को इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल सस्ता और आसान हो। 

इस बात पर भी ध्यान होना चाहिए कि मौजूदा छोटे वाहनों को कम लागत पर बदलाव की सुविधा दी जाए। उदाहरण के लिए दिल्ली में सीएनजी से चलने वाले ऑटो रिक्शा बिना उनके मालिकों पर बहुत अधिक आर्थिक बोझ डाले इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड वाहनों में बदले जा सकते हैं। इसके लिए वित्तीय क्षेत्र में कुछ नवाचार करना होगा।

क्रिसिल ने कहा है कि फिलहाल देश में जो दोपहिया वाहन बन रहे हैं उनमें से 95 फीसदी वाहनों को फेम-2 के अधीन प्रोत्साहन नहीं मिल सकेगा। यह अपने आप में कतई अच्छा विचार नहीं है। वाहन निर्माता कंपनियों की लॉबीइंग को सफल नहीं होने देना चाहिए। सरकार को चाहिए कि इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए फेम-2 में बदलाव लाए।

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