बिजनेस स्टैंडर्ड - पूर्वोत्तर और हिंदी पट्टी में बरकरार है नरेंद्र मोदी का जलवा
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पूर्वोत्तर और हिंदी पट्टी में बरकरार है नरेंद्र मोदी का जलवा

अरिंदम मजूमदार /  04 11, 2019

चुनावी सफर

आम चुनावों से पहले देश के मतदाताओं का मिजाज जानने के लिए बिज़नेस स्टैंडर्ड के संवाददाताओं द्वारा की गई रेल यात्राओं की अंतिम कड़ी में अरिंदम मजूमदार ने गुवाहाटी से दिल्ली तक का सफर किया

बिजनेस स्टैंडर्ड पूर्वोत्तर और हिंदी पट्टी में बरकरार है नरेंद्र मोदी का जलवाभारतीय ट्रेनों में आपको देश की विविधता की झलक देखने को मिलती है। हर पांच स्टेशन पर सरकार के बारे में धारणा और मतदाताओं की मांग बदलती है। दिलचस्प बात यह है कि अनारक्षित श्रेणी से लेकर वातानुकूलित डिब्बों तक यात्रियों की राजनीतिक पसंद बहुत अलग है। अनारक्षित श्रेणी में जहां गरीब तबके के लोग सफर करते हैं वहीं मध्य और उच्च मध्य वर्ग के लोग वातानुकूलित श्रेणी में यात्रा करना पसंद करते हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड पूर्वोत्तर और हिंदी पट्टी में बरकरार है नरेंद्र मोदी का जलवाउत्तर बंगाल के अलीपुरद्वार में बंदापानी चाय बागान में दिहाड़ी मजदूर 32 साल के प्रेमलाल मुंडा अनारक्षित डिब्बे में सफर कर रहे हैं। वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से इस बात पर नाराज हैं कि उनके परिवार को सब्सिडी पर मिलने वाला 10 किलो चावल पिछले तीन महीने से नहीं मिला है। बाइक का शौक रखने वाले 27 साल के अभिजित चटर्जी द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे हैं। वह चाहते हैं कि अगली सरकार तवांग में सड़कों को दुरुस्त करे ताकि उन्हें बाइक चलाने में आसानी हो। असम के लोग अपनी पहचान बचाने के लिए वोट देंगे, उत्तर बंगाल के लोग चाहते हैं कि सरकार उनके चाय बागानों की बदहाली दूर करे जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में चर्चा पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी ठिकानों पर वायुसेना के हमलों पर केंद्रित रही।

अलबत्ता ब्रह्मपुत्र एक्‍सप्रेस से गुवाहाटी से दिल्ली की 1,500 किमी की 40 घंटे की यात्रा का लब्बोलुआब यह रहा कि नरेंद्र मोदी एक कारगर और निर्णायक नेता हैं। अधिकांश मतदाताओं का कहना था कि पिछले पांच साल में उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ है। उनके साथ चर्चा में कई बार रोजगार की कमी, कम आय और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और जातिवादी संघर्ष का मुद्दा उठा। फिर भी मतदाताओं को लगता है कि दमदार विकल्प के अभाव में मोदी को दूसरा कार्यकाल मिलने की प्रबल संभावना है।

जैसे ही टे्रन गुवाहाटी से निकलकर असम की हरीभरी वादियों से गुजरी, यह साफ हो गया कि पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा राज्य नागरिकता विधेयक यानी एनआरसी के मुद्दे पर वोट देगा। बदरपुर के पूर्व सरकारी कर्मचारी कृष्णा रे का कहना है कि वह पूरे दिल से इसका समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, 'इस तरह की आशंका है कि मुस्लिमों की घुसपैठ से असम की स्थिति भी कश्मीर की तरह हो जाएगी। आप बदरपुर जाइए, आपको हर 500 मीटर पर एक मस्जिद मिलेगी।' सत्तारूढ़ भाजपा ने इस विधेयक को पारित करने का वादा किया है जिससे बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिमों के लिए भारत की नागरिकता लेना आसान हो जाएगा।

लखीमपुर के सिराजुल हक इसके पक्ष में नहीं हैं। वह गुस्से में कहते हैं, 'नागरिकता विधेयक केवल असम के लिए ही क्यों है। इसे पूरे देश में लागू कीजिए और लाल कृष्ण आडवाणी को वापस पाकिस्तान भेजिए।' उन्होंने कहा कि जिन परिवारों ने अपना पूरा जीवन इस देश में खपाया है, उन्हें एक पार्टी की सनक के चलते अचानक विदेशी नहीं कहा जा सकता है।

यह ट्रेन ऊपरी असम से गुजरती है जहां अहोम जाति के लोगों का दबदबा है। इन लोगों को ही असम का मूल निवासी माना जाता है। पिछले चुनावों में भाजपा ने यहां शानदार प्रदर्शन किया था और फिर 2016 के विधानसभा चुनावों में इसे दोहराया था। असम के स्थानीय दल इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे बांग्लादेश से व्यापक पलायन होगा और असम की संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। लेकिन बोंगईगांव के 43 साल के डाकिए मनोहर गोगाई का कहना है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से इस क्षेत्र के विकास को गति मिली है।

जैसे ही ट्रेन उत्तर बंगाल के अलीद्वारपुर पहुंची, अनारक्षित डिब्बे में यात्रियों की संख्या बहुत बढ़ गई। चाय बागान इस इलाके की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं लेकिन अब उनकी हालत खस्ता है। इस कारण कामगार बेहतर जीवन की तलाश में पलायन कर रहे हैं। प्रेमलाल मुंडा ने कहा, 'वाममोर्चे ने बेहतर जीवन का वादा किया। दीदी ने भी ऐसा किया। हमने न्यूनतम 250 रुपये दिहाड़ी की मांग की थी जो पूरी नहीं हुई। मालिक 150 रुपये में हमसे 10 घंटे काम कराना चाहता है। इसलिए हम छोड़कर जा रहे हैं।'

दिल्ली में एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले कूच बिहार के 26 साल के नेपाल प्रमाणिक का कहना है कि राजनेताओं के खिलाफ इस गुस्से से भाजपा को फायदा हो सकता है। उन्होंने कहा, 'ममता अच्छी नेता हैं लेकिन हुड़दंग मचाने वाले पार्टी के कार्यकर्ताओं पर उनका नियंत्रण नहीं है। मैंने सुना है कि कारोबार के लिए मोदी अच्छे हैं।' वह कूच बिहार वापस आकर मुर्गीपालन का कारोबार करना चाहते हैं।

न्यू जलपाईगुड़ी के लिए ट्रेन 20 मिनट लेट हो गई। सिलिगुड़ी के निर्मल लेप्चा ओएनजीसी में काम करते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया लेकिन वह शायद ही भाजपा को वोट देंगे। लेप्चा ने कहा, 'पिछली बार गोरखालैंड को लेकर लहर थी लेकिन भाजपा ने केंद्र में सरकार होने के बावजूद कुछ नहीं किया। लोग अब हड़ताल और आंदोलनों से उकता चुके हैं। अब यहां गोरखा आंदोलन मुद्दा नहीं है।' ट्रांसपोर्ट का कारोबार करने वाले अभिजित मुखर्जी का कहना है कि इन चुनावों में ममता ही मोदी का विकल्प हो सकती हैं।

बिहार पहुंचने पर ब्रह्मïपुत्र एक्सप्रेस की रफ्तार और कम हो गई। ट्रेन के डिब्बे अब मजदूरों और सरकारी कर्मचारियों से खचाखच भरे हैं। अलग-अलग आय वर्ग, हैसियत और जाति के होने के बावजूद स्लीपर क्लास सबको जोड़ती है। इनमें से अधिकांश बेटिकट यात्रा कर रहे हैं और अगले दो-तीन घंटे तक उन्हें एक-एक इंच जगह के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। आम चुनावों में उनकी अहम भूमिका होगी। दोनों वर्गों को लगता है कि पिछले पांच साल में उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं आया है। उनमें  से अधिकांश राहुल गांधी या तेजस्वी यादव को विश्वसनीय नेता नहीं मानते हैं। उन्हें लगता है कि मोदी की जीत निश्चित है। उनके लिए रोजगार एक मुद्दा है लेकिन नोटबंदी से उन पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं पड़ा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बारे में भी लोगों की अच्छी राय है। किशनगंज के मोइनुल हक ने अपने मोबाइल पर शौचालय की तस्वीर दिखाते हुए कहा, 'सरकार हमारे जीवन में बदलाव नहीं करेगी। इसके लिए हमें की काम करना पड़ेगा। लेकिन हमारे गांव में कई शौचालय बने हैं। मोदी ने बनाए हैं।' हक दिल्ली जा रहे हैं जहां वह वेटर का काम करेंगे। क्या उन्हें लगता है कि भारत मुसलमानों के लिए असुरक्षित बन गया है? इस पर हक के भाई फरीद आलम ने कहा कि इस तरह के छोटे-मोटे झगड़े तो पिछली सरकार के दौरान भी हुए थे।

ट्रेन के उत्तर प्रदेश पहुंचने पर बहस मोदी और अखिलेश यादव पर टिक गई। इलाहाबाद में शिक्षा मित्र के तौर पर काम करने वाली 27 साल की सुरेखा देवी प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर नाराज है। इसकी वजह यह है कि उनका वेतन आधा हो गया है। उन्होंने कहा, 'इस योजना से अखिलेश सरकार ने महिलाओं को सम्मान दिया पर योगी सरकार ने मुश्किल पैदा की है। जब हमने विरोध किया तो हम पर लाठीचार्ज किया गया। आप किसी से भी पूछिए, अखिलेश बेहतर मुख्यमंत्री थे।' लेकिन अखिलेश की पार्टी की छवि अच्छी नहीं है। मिर्जापुर के कारोबार नीरज ने कहा कि उनके संसदीय क्षेत्र में बहुत तेजी से विकास कार्य हो रहे हैं।     (अंतिम भाग)

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