बिजनेस स्टैंडर्ड - गन्ना और बिजली हैं चुनावी मुद्दे
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गन्ना और बिजली हैं चुनावी मुद्दे

संजीव मुखर्जी /  04 10, 2019

चुनावी बिसात पर उत्तर प्रदेश

ताजा आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों का बकाया 10 हजार करोड़ रुपये से पार चला गया है जो 2017-18 में 7,222 करोड़ रुपये था

बिजनेस स्टैंडर्ड गन्ना और बिजली हैं चुनावी मुद्देअजय कुमार राठी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के शाहजांपुर गांव के किसान हैं। वह छह एकड़ जमीन पर गन्ने की खेती करते हैं और गन्ने का मौसम नहीं होता है तो गेहूं की खेती करते हैं। कई वर्षों से वह अपनी फसल मोदीनगर की एक चीनी मिल को बेच रहे हैं। लेकिन कुछ दिन पहले उन्होंने बताया कि पिछली बार उन्हें मई 2018 में भुगतान मिला था। पिछले साल अक्टूबर से शुरू हुए 2018-19 के पेराई सत्र में उन्हें कोई भुगतान नहीं मिला है। उन्होंने कहा, 'पिछले साल मेरा चार लाख रुपये बकाया था और इतना ही बकाया इस साल का है।' उनकी शिकायत है कि सरकार के वादों के बावजूद कृषि लागत में कमी नहीं आई है। 

चीनी और गन्ने से संबंधित विभिन्न मुद्दों के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 38 सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। 2014 में पिछले आम चुनावों में भाजपा ने इन सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी। ताजा आंकड़ों के मुताबिक राज्य परामर्श (एसएपी) के आधार पर गन्ने का शुद्ध बकाया इस सत्र में 10 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है जो 2017-18 में 7,222 करोड़ रुपये था। इसी तरह मौजूदा पेराई सत्र में प्रदेश में गन्ने के भुगतान का अनुपात 2017-18 की तुलना में करीब 20 फीसदी गिर गया है। मार्च 2018 के अंत तक गन्ने का कुल भुगतान 71 फीसदी से अधिक था जबकि 2018-19 सत्र में यह गिरकर 57 फीसदी रह गया है। गन्ना किसानों का मौजूदा बकाया करीब 12,700 करोड़ रुपये है जबकि भुगतान अनुपात 52 फीसदी है। मोदीनगर के लालीफुर तिबरा गांव के नरेंद्र कुमार कहते हैं, 'हमने करीब 80 बीघे में गन्ना उगाया था लेकिन हमें पिछले साल से कोई पैसा नहीं मिला है।'

पूर्व प्रधान कुमार ने कहा कि कर्ज माफी या 2,000 रुपये जैसी मामूली रकम के बजाय सरकार को गन्ने के बकाये के भुगतान में तेजी लानी चाहिए। पीएम-किसान योजना के तहत केंद्र छोटे और सीमांत किसानों को हर महीने 500 रुपये दे रही है। कुमार ने कहा, 'आप किसी भी गांव में जाएं, चाहे वह शेरपुर हो, नांगला हो या कडाना (सभी बागपत लोक सभा के गांव), सभी जगह किसान गन्ने के बकाये के कारण रोष है।' उनका कहना था कि बिजली का बिल और डीएपी (डाई अमोनिया फॉस्फेट) की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है। 

निवारा गांव के अजित राज का कहना था कि पिछले चार-पांच साल से स्थानीय मिल ने हर साल भुगतान में चूक की लेकिन हमारी मजबूरी है कि हम कहीं और नहीं जा सकते हैं। एक अन्य ग्रामीण विकास त्यागी ने कहा, 'पांच साल पहले हमारे गांवों में ट्रांसफॉर्मर की चोरी आम थी और बिजली कभी-कभार आती थी लेकिन अब काफी सुधार हुआ है।' उनका भी गन्ने का करीब दो लाख रुपये बकाया है लेकिन जब वह 11 अप्रैल को वोट देंगे तो शायद कई दूसरी बातें भी उनके दिमाग में होंगी।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक राज्य में अप्रैल 2014 से फरवरी 2015 के बीच बिजली की आपूर्ति 17 फीसदी कम थी। लेकिन अप्रैल 2018 से फरवरी 2019 के बीच यह घटकर 2.1 फीसदी रह गई। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी चर्चा कानून व्यवस्था, बिजली और गन्ने पर ही केंद्रित है। शामली जिले के कबरौत गांव के अरविंद पाल ने कहा, 'पहले हमें रात को आठ बजे बाद बाहर निकलने में डर लगता था लेकिन अब स्थिति में काफी सुधार आया है। अभी भी अपराध की कुछ घटनाएं होती हैं लेकिन इनमें उल्लेखनीय कमी आई है। साथ ही बिजली की व्यवस्था में भी काफी सुधार हुआ है।'

गुड़ बनाने वाली अपनी इकाई के करीब एक छोटी चारपाई में बैठे पाल ने कहा कि उनके गांव के अधिकांश लोग मानते हैं कि कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार आया है। उन्होंने कहा, 'बिजली की नियमित आपूर्ति से मैं ज्यादा समय तक अपनी गुड़ बनाने की इकाई चला सकता हूं।' मुजफ्फरनगर में 2013 में भयानक दंगे हुए थे जिसमें 60 से अधिक लोग मारे गए थे और 93 घायल हुए थे। इन दंगों के कारण इस इलाके का सामाजिक तानाबाना बदल गया और हिंदुओं तथा मुस्लिमों के बीच गहरी खाई पैदा हो गई। इसके बाद हुए सभी चुनावों में भाजपा ने इस इलाके की अधिकांश सीटों पर जीत दर्ज की। 

अलबत्ता, 2018 से स्थिति बदलने लगी जब विपक्ष की संयुक्त उम्मीदवार राष्ट्रीय लोक दल की तबस्सुम हसन ने कैराना लोक सभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में भाजपा की मृगांका सिंह को हराया। विशेषज्ञों का कहना है कि गन्ने का बढ़ता बकाया और किसानों में रोष भाजपा की हार की मुख्य वजह थी। इसके बाद केंद्र ने बकाये का भुगतान के लिए उपायों की घोषणा की है लेकिन कुछ ही को इससे फायदा हुआ है। इनमें उत्तर प्रदेश स्टेट शुगर कॉरपोरेशन की मोहिउद्दीनपुर शुगर मिल शामिल है जो मोदीनगर से कुछ किमी की दूरी पर है। 

कुछ साल पहले शुरू हुई इस मिल ने योगी आदित्यनाथ सरकार के दौर में अपनी क्षमता का विस्तार किया और एक नई डिस्टिलरी जोड़ी। करीब के गांव जसबीर चंदेल कहते हैं, 'हमें भुगतान की समस्या नहीं है और हमारा भुगतान 15 दिन के बजाय एक महीने में हो रहा है। इस मिल के फिर शुरू होने और विस्तार करने से पहले हम गन्ना मोदीनगर की फैक्टरी को बेचा करते थे। यहां ट्रैक्टरों और बैलगाडिय़ों की कतारें देखिए। इससे पता चलता है कि इस मिल को गन्ना बेचने वाले किसानों को फायदा हुआ है।' गन्ना नियंत्रण आदेश के मुताबिक हर फैक्ट्री के लिए इलाका आरक्षित किया गया है और उस इलाके के किसानों को अपनी फसल उसी फैक्टरी को बेचनी होगी।
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