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चुनावी घोषणापत्रों की क्यों घट रही है विश्वसनीयता?

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  April 10, 2019

राष्ट्रीय दल अपने चुनावी घोषणापत्र जारी कर चुके हैं। यह साफ हो चुका है कि वे राजकोषीय विवेक से कितने दूर हैं। सत्ता में वापसी की प्रतीक्षा कर रही कांग्रेस ने 2 अप्रैल को और भारतीय जनता पार्टी ने 8 अप्रैल को घोषणापत्र जारी किया। दोनों घोषणापत्रों में किए गए कई आर्थिक वादे न केवल राजकोषीय दृष्टि से गलत हैं बल्कि वे यह भी बताते हैं कि आर्थिक नीति से जुड़े वादे करते वक्त हमारे राजनीतिक दल कैसे अव्यावहारिक हो जाते हैं? कांग्रेस की न्याय योजना के तहत समाज के निचले तबके के 20 फीसदी परिवारों को 6,000 रुपये मासिक देने की बात कही गई है। इस चरणबद्ध योजना की लागत राज्यों के साथ मिलकर वहन की जाएगी। पूरे क्रियान्वयन के बाद यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर 1.9 फीसदी का बोझ डालेगी। ऐसे में संसाधन कहां से आएंगे, यह सवाल तो उठता ही है।

 
क्या इसके लिए नए कर लगाए जाएंगे या सब्सिडी तथा अन्य गरीबी उन्मूलन योजनाओं की खातिर किया गया आवंटन कम किया जाएगा? इस मुद्दे पर व्याप्त अस्पष्टता के अलावा एक चिंता यह भी है कि योजना का क्रियान्वयन आसान नहीं होगा। योजना के लाभार्थी परिवारों की पहचान आय के आधार पर करनी होगी। इसमें चूक होने की प्रबल आशंका है। ऐसा इसलिए क्योंकि पारिवारिक आय को लेकर विश्वसनीय आंकड़े नहीं हैं। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर कांग्रेस के वादे की बात करें तो उसने एक दर वाले जीएसटी की बात कही है। यह एक बड़ा वादा है लेकिन गहराई से अध्ययन करें तो इसमें तीन दरों की बात कही गई है। हालांकि यह मौजूदा व्यवस्था से बेहतर है लेकिन एकल दर का वादा क्यों किया गया?
 
कर वंचना रोकने की पारदर्शी व्यवस्था ई-वे बिल की व्यवस्था खत्म करने का वादा जीएसटी कर प्रणाली के लिए नई चुनौतियां लाएगा। यह अपने आप में एक पहेली है क्योंकि ई-वे बिल का न तो कोई विरोध हो रहा है न ही उसके क्रियान्वयन में दिक्कत आई। यकीनन इससे छोटे कारोबारी और व्यापारी प्रसन्न होंगे जिन्हें बढ़ा कर अनुपालन पसंद नहीं आता। परंतु क्या इससे जीएसटी प्रभावी होगा? कांग्रेस के घोषणापत्र में सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) के लिए नए पैकेज के वादे में भी खामी है। इसमें एमएसएमई का वर्गीकरण रोजगारशुदा लोगों की तादाद के आधार पर करने की बात कही गई है। ऐसे समय में जबकि स्वचालन और तकनीक ने कर्मचारियों की तादाद पर असर डाला है यह कितना उचित है? अगर किसी उपक्रम में 101 से 500 के बीच कामगार होंगे तो इसे मझोला उपक्रम माना जाएगा और इसे विभिन्न प्रकार की रियायतें नहीं मिलेंगी। रियायतों का लाभ केवल 101 से कम कर्मचारियों वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों को मिलेगा। यानी विभिन्न उद्यमों को यह प्रोत्साहन मिलेगा कि वे कम से कम तीन वर्ष तक लाभ लेने के लिए कर्मचारियों की तादाद कम रखें। 
 
भाजपा के घोषणापत्र के वादों में कम समस्या नहीं है। उसमें प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का विस्तार सभी किसानों तक करने की बात कही गई है, चाहे उनके पास कितनी भी जमीन हो। सरकार ने दो हेक्टेयर से कम रकबे वाले 12.5 करोड़ किसानों को सालाना 6,000 रुपये देने के लिए 75,000 करोड़ रुपये के व्यय की व्यवस्था की है। अब कृषि योग्य सारी भूमि इसके दायरे में आएगी और बाकी बचे 2.1 करोड़ किसानों को भी योजना का लाभ मिलेगा। यानी योजना की वार्षिक लागत करीब 87,600 करोड़ रुपये हो जाएगी। 27 लाख करोड़ रुपये के बजट में यह बढ़ोतरी बहुत अधिक नहीं है लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के रूप में जरूरतमंद को मदद पहुंचाने का लक्ष्य खो जाएगा। 
 
किसानों को बिना ब्याज के एक लाख रुपये तक कर्ज देने का वादा भी गैरजिम्मेदाराना है। इससे कुल ऋण 14.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा जो वर्ष 2017-18 में वितरित 11.6 लाख करोड़ रुपये के कुल कृषि ऋण से ज्यादा है। सरकार लगभग यह कह रही है कि कृषि ऋण को ब्याज मुक्त कर दिया जाएगा।  इस ब्याज का बोझ कौन वहन करेगा? सरकार पहले ही ब्याज पर राहत दे चुकी है जिसकी लागत गत वर्ष 15,000 करोड़ रुपये पड़ी थी। अगर 14.6 लाख करोड़ रुपये के ऋण पर ब्याज माफ हुआ तो बोझ बहुत बढ़ जाएगा। इसके लिए पैसा कहां से आएगा? 
 
बैंक पहले ही मुद्रा ऋण के बोझ तले दबे हुए हैं। बीते चार वर्ष में इस ऋण का समेकित मूल्य करीब 8.26 लाख करोड़ रुपये हो गया। कई मुद्रा ऋण छोटे और लघु उपक्रमों के लिए थे और वे बिन गारंटी के वितरित किए गए। अब तक इसके पुनर्भुगतान की दर ऊंची रही है लेकिन इनमें से कुछ ऋण के फंसे कर्ज में तब्दील होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। उसके बाद बैंकों से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे किसानों को एक लाख रुपये तक के ब्याज रहित ऋण का बोझ उठाएंगे। 
 
आखिर में बात करते हैं भाजपा के 2024 तक बुनियादी विकास में 100 लाख करोड़ रुपये के निवेश के लक्ष्य की। इसके लिए सरकार को पूंजीगत व्यय में हर वर्ष 60 फीसदी का इजाफा अगले पांच वर्ष तक करना होगा। वर्ष 2013-14 में देश का कुल पूंजीगत व्यय 6 लाख करोड़ रुपये था। इसमें तमाम बजट और बजट से इतर संसाधन, सरकारी कंपनियों के संसाधन और रेलवे का व्यय शामिल था। 2018-19 तक यह बढ़कर 9.61 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। मोदी सरकार के पांच साल में यह वृद्घि सालाना 10 फीसदी की रही। ऐसे में इस वृद्घि को छह गुना बढ़ाने का वादा कुछ ज्यादा ही बड़ा है। 
 
घोषणापत्र में ऐसे गुलाबी वादे निरंतर अप्रासंगिक होते जा रहे हैं क्योंकि इन्हें मतदाताओं का भरोसा हासिल नहीं होता है। राजनीतिक दल का घोषणापत्र मतदाताओं के साथ संबंध कायम करने की पहली सीढ़ी होता है। अगर यह रिश्ता कमजोर राजनीतिक समझ और कम विश्वसनीयता वाले दस्तावेज पर आधारित हो तो यह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को धक्का है।
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