बिजनेस स्टैंडर्ड - चुनावों का बाजार पर नहीं पड़ेगा कोई असर!
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चुनावों का बाजार पर नहीं पड़ेगा कोई असर!

नीलकंठ मिश्रा /  April 09, 2019

चुनावों के नतीजों के बारे में कोई पूर्वानुमान लगाना मुश्किल होने के साथ ही चार अन्य कारणों से ऐसा होने की संभावना कम नजर आ रही है। बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
इन चुनावों के बारे में आपको क्या लगता है? इन दिनों हरेक निवेशक बैठक में यह सवाल जरूर उछलता है। आम तौर पर मैं इसी के साथ अपनी बात शुरू करता हूं कि चुनावों का बाजारों पर कोई दीर्घकालिक असर नहीं पड़ता है। अगर आप नतीजे आने के छह महीने पहले और बाद के दौरान सेंसेक्स के चार्ट पर नजर डालें तो स्थिति साफ हो जाएगी। दोनों स्थितियों में बाजार की दिशा में कोई बदलाव नहीं आया। भले ही 2004 के चुनावी नतीजे आने के दिन बाजार में काफी गिरावट आई थी लेकिन बहुत जल्द पुराना रुख बहाल हो गया। वास्तव में, चुनावी नतीजों के इर्दगिर्द खासी उठापटक होने को लेकर निवेशकों की आशंकाओं के बावजूद पिछले छह में से चार चुनावों में खास उठापटक नहीं देखी गई थी। उन चुनावों का बाजार पर कोई दीर्घकालिक असर नहीं होना एक आकलन भर है और किसी विश्लेषण का नतीजा नहीं है। विश्लेषण-परक मसौदे की सटीकता एवं पूर्वग्रह को लेकर चर्चा की जा सकती है लेकिन एक आकलन पर बहस करना मुश्किल है।
 
फिर मैं चुनावी नतीजों के अप्रत्याशित होने वाला पहलू उनके सामने रखता हूं, यह दिखाने के लिए कि नतीजों के पहले कोई भी अनुमान लगाना पेचीदा हो सकता है। पिछले चुनावों में, न केवल ओपिनियन पोल पूर्वानुमान चुनावों के नतीजों से काफी अलग रहे हैं बल्कि उनकी गलती का मार्जिन भी समय के साथ बढ़ता गया है। जहां 1998 औ्र 1999 में गलती का मार्जिन 10-20 सीटों का था, वहीं वर्ष 2014 में यह मार्जिन बढ़कर करीब 100 सीटों तक पहुंच गया। ओपिनियन पोल से संभावित नतीजों के बारे में एक निश्चित रुझान मिलने की धारणा के उलट चुनाव-विश्लेषक खास राजनीतिक दलों के लिए काम करते नजर आते हैं। कुछ विश्लेषक दसेक हजार लोगों से बातचीत कर किसी राज्य में जीती जा सकने वाली सीटों के बारे में अनुमान जताते हैं। सीटों के दायरे का अनुमान कितना भी असुविधाजनक हो लेकिन वे हकीकत के करीब होते हैं।
 
आखिरकार चुनावी नतीजे केवल मतदाताओं की पसंद पर ही निर्भर नहीं होते हैं, मतदान प्रतिशत का भी इसमें योगदान होता है। मसलन, बिहार के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में यह देखने को मिला कि पुरुष मतदाताओं में से केवल 30 फीसदी ने ही मताधिकार का इस्तेमाल किया जबकि ऐसा करने वाले महिला मतदाताओं की संख्या 70 फीसदी थी। केरल की तरह बिहार से भी बड़ी संख्या में लोग अब पश्चिम एशिया के देशों में कामकाज के सिलसिले में जाने लगे हैं और पुरुषों के मतदान प्रतिशत में आई गिरावट की एक वजह यह भी है। इसी तरह चुनावों के दौरान सुरक्षा के बेहतर इंतजाम होने से भी महिलाएं अब अधिक संख्या में मतदान के लिए निकलने लगी हैं। हालांकि इस पहलू पर अध्ययन किया जाना बाकी है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं जातिगत आस्था के प्रति कम निष्ठावान होती हैं। इसके अलावा कुछ लोकप्रिय नेता और दल किसी खास क्षेत्र में पडऩे वाले मतों का अच्छा हिस्सा हासिल कर लेते हैं, भले ही राज्य स्तर पर उन्हें मिलने वाले कुल मतों की संख्या अधिक न हो। एक चुनाव अनुमान लगाने वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति में पूर्वानुमान का कौन सा ढांचा तैयार करेगा? उसके लिए दोनों पहलुओं को अपने विश्लेषण में शामिल करना काफी चुनौतीपूर्ण होगा।
 
हम उन चार कारणों पर गौर करेंगे जिनकी वजह से बाजारों पर चुनावी नतीजों का कोई असर नहीं पडऩा चाहिए। पहला, वर्ष 1991 के बाद से ही केंद्र ने अपनी आर्थिक मौजूदगी को कम किया है और अब अधिकांश बड़े सुधारों को राज्यों के स्तर पर अंजाम देने की जरूरत होती है लेकिन राज्यों में चुनाव का वक्त अलग होता है। संवैधानिक रूप से राज्य सरकारों को जमीन, श्रम, बिजली वितरण, पर्यावरण और नगरीय प्रशासन की शक्तियां दी गई हैं। ये कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा मायने रखने वाले मुद्दे हैं। राज्यों में कुल मिलाकर केंद्र की तुलना में चार गुना कर्मचारी नियुक्त होते हैं और केंद्र की तुलना में राज्य सामूहिक तौर पर करीब 90 फीसदी अधिक रकम खर्च करते हैं। पिछले वर्षों में लोकसेवक राज्य छोड़कर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने में आनाकानी करते दिखे हैं। उसकी एक वजह केंद्र सरकार की विवेकाधीन शक्तियों में आई कमी भी है। 
 
दूसरा, भारत में राजनीतिक दलों की विचारधारा के बीच फर्क आर्थिक न होकर असल में सामाजिक हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि दलों के बीच कोई मतभेद ही नहीं हैं। मसलन, राजकोषीय अनुशासन पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकारों ने दूसरों की तुलना में अधिक अनुशासन दिखाया है। वैसे संकट आने पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और तीसरे मोर्चे की सरकारों ने भी राजकोषीय मजबूती की दिशा में कोशिशें की हैं और राजग ने भी राजनीतिक रूप से जरूरी होने पर खैरातें बांटी हैं। सबसे बड़ी बात, सभी दलों को संस्थागत बदलाव लाते समय सख्त नौकरशाही से भी निपटना होता है।
 
तीसरा, अर्थव्यवस्था और बाजार दोनों एक नहीं है। बाजार के मुख्य संकेतकों में शामिल कंपनियों का आधे से अधिक राजस्व भारत से संबंधित नहीं होता है। आईटी सेवाएं, फार्मा और ऑटो के अलावा कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियां मुख्यत: निर्यात-केंद्रित होती हैं। धातु एवं पेट्रो-रसायन क्षेत्रों में भी मुनाफा वैश्विक रुझानों से जुड़े होते हैं, भले ही बड़े पैमाने पर घरेलू उपभोग ही होता है। इन गतिविधियों पर सरकार बदलने से भी फर्क नहीं पडऩे वाला है। भारत से जुड़ा राजस्व मुख्यत: निजी बैंकों और उपभोग-केंद्रित फर्मों में ही होता है। निजी क्षेत्र के बैंकों की बाजार हिस्सेदारी में स्थायित्व होने से उन पर भी सत्ता परिवर्तन का असर पडऩे के आसार नहीं हैं। 
 
चौथा, भारतीय इक्विटी बाजार में 40 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी विदेशी निवेशकों के पास है और उन्हें बाजार से निकलने एवं आने की पूरी आजादी होती है। उनका नजरिया वैश्विक स्तर पर निवेश किए जा सकने लायक अन्य संपत्तियों से प्रभावित होता है। मसलन, निफ्टी में आई हालिया तेजी के बारे में यह मत रहा है कि अस्थिर सरकार आने की आशंका कम होने से ऐसा हुआ है लेकिन इसकी बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की नजर में सुरक्षा भाव बढऩी रही। भारत में दो महीने के दौरान प्रवाह रिकॉर्ड 7 अरब डॉलर पर पहुंच गया क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत पृथक मानी जाती है। अमेरिका में सॉवरिन बॉन्ड प्रतिफल कम होने से भारतीय प्रतिभूतियों का महंगा मूल्यांकन कम हो गया है।  
 
वर्ष 1996 के बाद से चुनावों के करीब बाजार परिदृश्य का अध्ययन करने पर कई दूसरी बातें भी पता चलती हैं: एशियाई एवं रूसी संकट, पोकरण परीक्षण के बाद लगे प्रतिबंध, डॉटकॉम बुलबुले का बनना और फूटना, वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2004-08 के दौरान तेजी का रुख और वित्तीय संकट से उबरना। हालांकि छोटी बाजार पूंजी वाले स्टॉक जैसे कुछ बाजार हिस्से चुनावी नतीजे से प्रभावित हो सकते हैं। मिडकैप और स्मॉलकैप का अर्थव्यवस्था से अधिक संपर्क होता है, घरेलू स्वामित्व अधिक होता है और कारोबार में तरलता कम होने से वे बाजार धारणा में बदलाव के शिकार जल्द हो जाते हैं।   राजनीतिक रुझानों और परिदृश्य के बारे में चर्चा करना दिलचस्प है, लेकिन 23 मई को चुनावों के नतीजे आने के बाद के हालात पर नजर रखना समझदारी होगी।
 
(लेखक क्रेडिट सुइस की एशिया-प्रशांत एवं भारत रणनीति के सह-प्रमुख हैं)
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress,,
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