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आनुपातिक प्रतिनिधित्व का आ चुका है वक्त!

जैमिनी भगवती /  April 08, 2019

देश की मौजूदा निर्वाचन प्रणाली में धनबल के बढ़ते प्रयोग के बीच यह विचार करने का समय आ गया है कि क्या आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली बेहतर विकल्प साबित हो सकती है। बता रहे हैं जैमिनी भगवती

 
देश में राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों का चुनावी खर्च मुद्रास्फीति को मीलों पीछे छोड़ चुका है। अटकलों पर यकीन करें तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रति सीट प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों का चुनाव खर्च 5 करोड़ और 80 करोड़ रुपये के बीच था। लोकसभा चुनाव में एक प्रत्याशी के लिए व्यय की विधिक सीमा 54 लाख रुपये से 70 लाख रुपये के बीच है। यह राशि राज्य के आकार पर निर्भर करती है। विधानसभा चुनावों में यह राशि 20 से 35 लाख रुपये के बीच रहती है। बहरहाल, राजनीतिक दलों के लिए खर्च की कोई सीमा तय नहीं है। निर्वाचन आयोग ने एक के बाद एक तमाम सरकारों से कहा है कि वे राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव पर खर्च की जाने वाली राशि को व्यक्तिगत प्रत्याशियों द्वारा किए जाने वाले व्यय की सीमा के 50 फीसदी पर निर्धारित करें।  
 
बीते कुछ दशक के दौरान सशस्त्र बलों और चुनाव पर्यवेक्षकों की बड़े पैमाने पर तैनाती ने वोट के लिए नकदी के लेनदेन और हिंसा को कम किया है। परंतु अगर निर्वाचन आयोग और अधिक संख्या में लोगों को तैनात कर दे तो भी चुनाव में तय सीमा से अधिक खर्च और संबंधित हिंसा की घटनाओं को कम कर पाना उसके बस की बात नहीं। देश में होने वाले चुनावों में इस खर्च का क्या असर होता है, इसका आकलन कर पाना आसान काम नहीं है लेकिन यह भी सही है कि जिन प्रत्याशियों के पास अतिरिक्त वित्तीय संसाधन होते हैं वे लाभ की स्थिति में होते हैं। चुनाव की बढ़ती लागत भी धनाढ्य प्रत्याशियों और संदिग्ध तथा आपराधिक अतीत वाले प्रत्याशियों को लाभ पहुंचाती है। 
 
इन हालात के बीच निर्वाचन आयोग को दुनिया भर में चुनाव के दौरान किए जाने वाले आचरण का अध्ययन करना चाहिए और ऐसे तरीके अपनाने चाहिए जिनसे चुनाव में धनबल का प्रयोग सीमित किया जा सके। उदाहरण के लिए जर्मनी, जापान, स्वीडन और नीदरलैंड आनुपातिक प्रतिनधित्व का तरीका अपनाते हैं। जर्मन संसद के निम्र सदन में आधी सीटें भारतीय चुनावों की शैली में भरी जाती हैं। बाकी आधी सीटों के लिए मतदाता कई प्रत्याशियों के बीच अपनी प्राथमिकता जाहिर करते हैं। राजनीतिक दल प्रत्याशियों के नाम देते हैं और मतदाता अपनी प्राथमिकता बताते हैं। 
 
जर्मनी की आबादी 8.1 करोड़ है और वहां के निम्र सदन में 709 सदस्य हैं। भारत की आबादी 135 करोड़ है, यानी जर्मनी की आबादी से करीब 17 गुना। जबकि हमारी लोकसभा में केवल 545 सदस्य हैं। वक्त आ गया है कि हम लोकसभा सांसदों की तादाद कम से कम दोगुनी कर दें। यह सदस्यता बढ़ाकर 1,100 की जानी चाहिए। 550 सीटों के लिए मौजूदा व्यवस्था और बाकी 550 सीटों के लिए मतदाता, राजनीतिक दलों द्वारा जारी सूची में से प्राथमिकता के आधार पर चयन कर सकते हैं। राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें इसी तरह दोगुनी की जा सकती हैं। राज्यसभा में मौजूदा 250 सदस्य रह सकते हैं। इससे संयुक्त मतदान के समय अप्रत्यक्ष चयन वाली राज्य सभा की महत्ता कम करने में मदद मिलेगी। जर्मनी में जिन दलों को 5 फीसदी से कम मत मिलते हैं उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली सीटें नहीं मिलतीं। हमारे देश में इस प्रतिशत को बढ़ाकर 10 किया जा सकता है। 
 
अगर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की 50 फीसदी सीटों का निर्धारण आनुपातिक प्रतिनिधित्व से हो तो बहस इस बात की ओर मुड़ जाएगी कि राजनीतिक दल आखिर क्या चाहते हैं। उदाहरण के लिए 25 मार्च, 2019 को कांग्रेस ने कहा कि अगर आगामी आम चुनाव के बाद वह सत्ता में आती है तो वह गरीबों के लिए न्यूनतम आय योजना लागू करेगी। इस बात ने कुछ हद तक ध्यान प्रत्याशियों के बजाय राजनीतिक दलो की ओर केंद्रित कर दिया है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व से यह काम अधिक आसानी से होगा। पार्टियों से अपेक्षा होगी कि वे यह स्पष्ट करें कि उनकी आय समर्थन योजना और कर्ज माफी के लिए फंड कहां से आएगा? बिना सुरक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार योजनाओं में कटौती किए यह कैसे होगा। 
 
फिलहाल देश में जो व्यवस्था है उसके तहत उन प्रतिभाशाली लोगों को राज्य सभा में चुना जाता है जिनके चुनाव जीतने की संभावना नहीं होती। आनुपातिक प्रतिनिधित्व में भारी खर्च और दबाव जैसे तौर तरीके काम नहीं आएंगे। इसलिए प्रतिभाशाली और बेहतर व्यक्तित्व वाले लोगों को लोकसभा में आनुपातिक प्रतिनिधित्व के रूप में बाधा रहित प्रवेश मिल सकेगा। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अतिरिक्त आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। बहरहाल, प्रत्यक्ष चुनाव के लिए मौजूदा आरक्षण बरकरार रहेगा। राजनीतिक दल आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए उम्मीदवार तय करते समय लैंगिक, सामाजिक और आर्थिक विविधता का पूरा ध्यान रखें। अगर ये दल आम जनभावना की अनदेखी करते हैं तो वे 10 फीसदी से कम मत पाकर सीट से वंचित रह जाएंगे। 
 
लोकसभा और राज्यसभा की सीटों को दोगुना करने से उनके वेतन भत्तों का भार भी दोगुना हो जाएगा। जब सत्ताधारी दल और प्रमुख विपक्षी दलों के बीच सीट का अंतर कम होता है तो अक्सर ऐसे दृश्य बनते हैं जहां विधायकों को महंगे रिजॉर्ट आदि में रखा जाता है ताकि वे दलबदल न कर लें। बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए अगर अतिरिक्त सांसदों और विधायकों के वेतन भत्तों का बोझ सहना पड़े तो सह लेना चाहिए।  अगर ऐसी स्थिति बनती है कि विभिन्न राजनीतिक दल आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए तैयार हो जाएं तो अदालत कह सकती हैं कि यह संविधान विरुद्घ है। ऐसे में जनमत संग्रह समेत अन्य वैधानिक उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। चाहे जो भी हो, मौजूदा निर्वाचन प्रक्रिया में बदलाव पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए। 
 
लब्बोलुआब यह कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद मई में जब सरकार बन जाए तो यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि कि हम आनुपातिक प्रतिनिधित्व की दिशा में बढ़ सकते हैं या नहीं। इस स्तंभ के पाठकों को लग सकता है कि यह अभी दूर की कौड़ी है लेकिन सवाल यह है कि बिना शुरुआत के कुछ हासिल नहीं होता। मौजूदा निर्वाचन प्रक्रिया को हमेशा जारी रखने का मतलब है पैसे का बेतहाशा इस्तेमाल। यह भी देश के लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं। 
 
(लेखक भारत सरकार और विश्व बैंक के साथ जुड़े रहे हैं।)
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress,,
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