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अगला संकट?

संपादकीय /  April 08, 2019

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की प्रमुख आर्थिक योजनाओं में से एक रही है। लघु एवं सूक्ष्म ऋण वितरित करने के लिए भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की इस नई पैकेजिंग को हाल के वर्षों में समुचित रोजगार न होने से जुड़ी चिंता और दावों के उत्तर के रूप में प्रस्तुत किया गया। इन ऋणों को आकर्षक माना जाता था क्योंकि इनमें से अधिकांश बिना किसी गारंटी के दिए जाते थे। उम्मीद की जा रही थी कि माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट ऐंड रिफाइनैंसिंग एजेंसी (मुद्रा) के ऋणों का इस्तेमाल रचनात्मक कार्यों में होगा और देश में उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा। वहीं वर्ष 2018 तक के आधिकारिक आंकड़ों की बात करें तो मुद्रा ऋण के पुनर्भुगतान का स्तर काफी अच्छा था। मार्च 2018 तक यह 5 से 6 फीसदी था। इससे सरकारी क्षेत्र के बैंकों के कुल ऋण की स्थिति में सुखद परिवर्तन आ रहा था। बहरहाल, अब कुछ चिंताएं अवश्य सर उठाएंगी। 

 
मिसाल के तौर पर, खबरों के मुताबिक मार्च 2019 में बैंकों ने मुद्रा ऋण के रूप में 70,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बांटी। यह पूरे वर्ष के लिए तय लक्ष्य का एक चौथाई है।  इस राशि के वितरण का समय जरूरी वाजिब चिंताएं पैदा करता है क्योंकि ऐसा आम चुनाव के ऐन पहले हुआ है। इस समय मुद्रा ऋण के लाभार्थियों की कुल संख्या 5.4 करोड़ है। ऋण में इतनी अधिक तेजी चिंतित करने वाली बात है। आम चुनाव के ऐन पहले इतने बड़े पैमाने पर ऋण के इस्तेमाल के अलावा इन परिस्थितियों में वितरित किए गए ऋण की गुणवत्ता पर भी सवाल उठना लाजिमी है। मुद्रा ऋण हासिल करना आसान माना जाता है। परंतु अगर एक महीने की अवधि में 70,000 करोड़ रुपये की राशि का ऋण वितरित कर दिया जाए तो सवाल यह उठता है कि बैंक कर्ज चाहने वालों से जरूरी सवाल कर भी रहे हैं या नहीं? सिडबी इनके तथा अन्य संंबंधित ऋण के लिए प्रासंगिक जवाबदेही तय करता है और इसका असर सरकार की राजकोषीय स्थिति पर पडऩा तय है। भले ही ये राजकोषीय घाटे के आंकड़ों में नजर नहीं आएं। यह बात भी चिंतित करने वाली है कि निजी क्षेत्र के बैंक जो फंसे हुए कर्ज को आमतौर पर कम करने में कामयाब रहे हैं, वे मुद्रा ऋण के मामले में सरकारी बैंकों के समान ही शामिल हुए। 
 
मुद्रा ऋण योजना पहले ही फंसे हुए कर्ज का अगला स्रोत बनती नजर आ रही है। पिछले वर्ष इस योजना की कुल राशि का 53 फीसदी फंसा हुआ था। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की बात करें तो इन योजनाओं में फंसे हुए कर्ज की राशि को अब कम करके आंका जा रहा है और यह अग्रिम का 10 से 15 फीसदी हो सकती है। जबकि मुद्रा योजना की कारोबारी प्रकृति काफी हद तक अस्थिरता और वार्षिक चक्र की दृष्टि से शंकास्पद रही है। फंसे हुए कर्ज में हो रही बढ़ोतरी दर्शाती है कि बैंक समय पर पुनर्भुगतान के लिए इनकी निगरानी का प्रयास नहीं कर रहे। 
 
मार्च महीने में मुद्रा ऋण के वितरण में हुआ जबरदस्त इजाफा इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि यह अतीत में चुनाव के समय आने वाली ऋण की बहार की याद दिलाता है। ये हमेशा वित्तीय अस्थिरता की वजह रहा है। सरकार यह दलील दे सकती है कि ऋण में यह मजबूत वृद्घि आर्थिक आशावाद का उदाहरण है। यह भी स्पष्ट है कि ऐसे राजनीतिक कारणों से फंसे हुए कर्ज का बढऩा कोई जवाबदेही भरी नीति नहीं मानी जा सकती। बैंकिंग नियामक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक को मुद्रा योजना की परिस्थितियों पर करीबी नजर रखनी चाहिए और देखना चाहिए कि किसी तरह के नियामकीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है अथवा नहीं। 
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