बिजनेस स्टैंडर्ड - अगले दो-तीन साल में बाजार में तेजी के आसार
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अगले दो-तीन साल में बाजार में तेजी के आसार

पुनीत वाधवा /  April 07, 2019

अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में उतार-चढ़ाव और दुनिया की इस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में मंदी की आशंका से हाल में दुनियाभर के इक्विटी बाजारों में गिरावट को बढ़ावा मिला। हालांकि साथ ही रिकवरी भी समान रूप से तेजी से हुई। एवेंडस कैपिटल पब्लिक मार्केट्स अल्टरनेट स्ट्रेटेजीज के सह-मुख्य कार्याधिकारी वैभव सांघवी ने पुनीत वाधवा को बताया कि आर्थिक आंकड़े पर नजर डालें तो पता चलता है कि अमेरिका अभी ऐसी स्थिति से दूर बना हुआ है। पेश हैं मुख्य अंश:

 
क्य वैश्विक बाजारों में अमेरिकी मंदी की आशंका का असर दिखा है?
 
बॉन्ड प्रतिफल और मंदी के बीच ऐतिहासिक संबंध मजबूत रहा है। कोई भी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता। हालांकि नए जमाने की अर्थव्यवस्था में मंदी की भविष्यवाणी करना काफी कठिन है, क्योंकि मौद्रिक और वित्तीय माध्यमों का इस्तेमाल व्यापक रूप से अनुमान में किया जाता है न कि प्रतिक्रिया के तौर पर। फिलहाल, अमेरिका मंदी से दूर बना रह सकता है।
 
क्या भारत 'गिरावट पर खरीदारी' वाला बाजार है?
 
हमारे लिए, 2019 दो हिस्सों की कहानी साबित होने की संभावना थ्ाि, जिसमें पहली छमाही में अस्थिर और चुनौतीपूर्ण हालात रहने की आशंका थी, जो अभी तक बरकरार हैं और दूसरी छमाही मजबूत रहने की। हाल के महीनों में आया बदलाव इसकी पुष्टि करता है। वैश्विक रूप से कमजोर वैश्विक वृद्घि पर उम्मीद की तुलना में बेहतर नकदी परिदृश्य के साथ दरें शीर्ष पर रही हैं। चुनाव को लेकर स्थिति कुछ हद तक स्पष्ट होने और कम दरों की मदद से कॉरपोरेट आय में सुधार से भारत की वृद्घि मजबूत रहने की संभावना है। इसे देखते हुए बाजारों के भी अगले दो-तीन साल के दौरान ऊंचाई पर पहुंचने की संभावना है। 
 
विदेशी प्रवाह पर आपका क्या नजरिया है?
 
भारत के लिए विदेशी प्रवाह संपूर्ण उभरते बाजार (ईएम) प्रवाह के अनुरूप है। इसे वैश्विक ब्याज दर के नरम परिदृश्य और कमजोर नकदी परिवेश से भी मदद मिली है। इस तरह के परिवेश में सक्रिय प्रवाह सहायक है, जो हम मौजूदा समय में देख रहे हैं। जब चुनाव से जुड़ी अल्पावधि अनिश्चितता दूर हो जाएगी, सक्रिय फंड भी निवेश बढ़ाना शुरू कर देंगे जिससे अधिक मजबूत प्रवाह को बढ़ावा मिलेगा। जोखिम का कारक बदलते वैश्विक घटनाक्रम होंगे जिनसे अल्पावधि प्रवाह प्रभावित हो सकता है।
 
पिछले कुछ महीनों में आपकी निवेश रणनीति क्या रही?
 
चूंकि हम एक जोखिम-समायोजित रिटर्न फंड हैं, इसलिए सामान्य तौर पर चुनाव जैसे बड़े घटनाक्रम को लेकर सतर्क रहते हैं। बाजार मूल्यांकन काफी अलग है और बड़े सूचकांकों के संदर्भ में सिर्फ मूल्यांकन पर विचार करना गलत होगा। कुल मिलाकर मूल्यांकन उचित है और भविष्य में बाजार पी/ई वृद्घि के बजाय आय वृद्घि पर ज्यादा ध्यान देगा।
 
क्या वैश्विक वृद्घि में कमजोरी बाजारों के लिए एक प्रमुख चिंता है?
 
मुद्रास्फीति के नरम होने की वजह से वैश्विक रूप से वृद्घि के अनुमान घटाए जा रहे हैं। हमने महसूस किया है कि मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों पर लंबे समय तक समायोजित रुख अपनाए जाने के बावजूद वैश्विक वृद्घि प्रभावित हो रही है। इससे पर्याप्त नकदी के साथ लंबे समय के लिए दरें नरम बनी रहेंगी। स्थानीय तौर पर, हमें मजबूत खपत और निवेश में सुधार की वजह से लगातार मजबूती आने की संभावना है। राजकोषीय घाटे को लेकर हम काफी हद तक लक्ष्य के नजदीक हैं, लेकिन कम खाद्य महंगाई की वजह से मुद्रास्फीति नियंत्रित है। मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्वारा तब तक अपने रुख में बदलाव किए जाने की संभावना नहीं दिख रही है जब तक कि तेल में तेजी नहीं आए और मुद्रास्फीति की राह में कोई बड़ा बदलाव नहीं आए। 
 
क्या रुपये और तेल कीमतों के संदर्भ में बुरा समय बीत चुका है?
 
भारत वैश्विक रूप से सबसे ज्यादा ब्याज दरों वाले देशों में से एक है और कमजोर वैश्विक ब्याज दर परिदृश्य ने हमें दर कटौती की पर्याप्त गुंजाइश दी है। मुद्रास्फीति को निचले स्तर पर रखने के लिए निश्चित तौर पर तेल प्रबंधन योग्य स्तर पर बनाए रखने की जरूरत होगी। रुपया महंगा बना हुआ है और इसमें धीमी रफ्तार से गिरावट आने का अनुमान है। 
 
कॉरपोरेट आय वृद्घि को लेकर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
 
आय वृद्घि का अनुमान व्यक्ति करना आसान काम नहीं है। हालांकि कुछ मजबूत विश्वास के साथ मैं कह सकता हूं कि वित्त वर्ष 2020 के लिए आय में अच्छा सुधार आएगा। बैंकिंग और वित्त क्षेत्रों का आय वृद्घि में अहम योगदान रहेगा। प्रमुख सूचकांकों में इन क्षेत्रों का अच्छा दबदबा है। ब्याज दरें कमजोर बने रहने से वित्तीय दक्षता का प्रभाव प्रमुख बाजार आय पर सकारात्मक रहेगा।
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