बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी 2.0 की तैयारी
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जीएसटी 2.0 की तैयारी

सुदीप्त दे /  April 07, 2019

जीएसटी 2.0 का मुद्दा आम चुनावों के घोषणापत्र की शब्दावली में शामिल हो गया है। लेकिन अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में सुधार के किसी भी प्रयास को कारोबारियों के समक्ष पेश आ रहे दो अहम मुद्दों से निपटना होगा। ये मुद्दे हैं- विवाद निपटान व्यवस्था और मुनाफाखोरी रोकने के उपाय। विशेषज्ञों का कहना है कि इन दो मुद्दों से निपटने के लिए विधायी बदलाव और ढांचागत सुधारों की जरूरत है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की आपूर्ति के स्थान का निर्धारण जीएसटी कानून के तहत सबसे विवादित मुद्दों में से एक है। विधि कॉलेज फॉर लीगल पॉलिसी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक कई ऐसे असली करदाता हैं जो अनिश्चितता में काम कर रहे हैं। कई खारिज फैसले जीएसटी की आपूर्ति के स्थान के निर्धारण या अंतरराज्यीय और अंतराराज्यीय आपूर्ति से संबंधित हैं। 

 
रिपोर्ट में कहा गया है कि जीएसटी व्यवस्था के तहत विवाद निपटान व्यवस्था में खामियों के कई कारण हैं। लंबित मामलों को लेकर स्पष्टता नहीं है, फैसलों में विरोधाभास है, कानूनी सिद्घांतों का क्रियान्वयन बेहद खराब है और प्रशासनिक तथा प्रवर्तन की व्यवस्था बेहद जटिल है। लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन के मैनेजिंग पार्टनर वी लक्ष्मीकुमारन कहते हैं, 'एडवांस रूलिंग का दायरा बढ़ाकर आपूर्ति के स्थान से संबंधित मुद्दों को भी इसमें लाया जाना चाहिए।' विशेषज्ञों का कहना है कि अथॉरिटी ऑफ एडवांस रूलिंग राज्यवार है जिससे अलग-अलग राज्यों में इनके फैसले विरोधाभासी होते हैं। लक्ष्मीकुमारन ने कहा, 'इस तरह के विवादों से निपटने के लिए एक केंद्रीय अपीली व्यवस्था की तुरंत जरूरत है।' कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि विभिन्न राज्यों की एडवांस रूलिंग अथॉरिटी द्वारा दिए गए फैसलों में विरोधाभास से निपटने की व्यवस्था नहीं होने के कारण कारोबारियों को मुश्किल आती है। लक्ष्मीकुमारन ने कहा, 'जब तक इस तरह की व्यवस्था नहीं बनाई जाती है तब तक करदाताओं को यह मामला उच्च न्यायालय में ले जाना पड़ेगा और फिर उच्चतम न्यायालय की शरण लेनी होगी।'
 
अनुबंध संबंधी विवादों में भी अनिश्चितता चिंताजनक है। चैलाना ऐंड चैलाना लॉ ऑफिसेज के मैनेजिंग पार्टनर संदीप चैलाना का कहना है कि कंपनियों को वहां समस्या का सामना करना पड़ता है स्पष्टता के अभाव के कारण भ्रम पैदा होता है। जीएसटी परिषद ने विरोधाभासी एडवांस रूलिंग से निपटने के लिए केंद्रीय अपीली प्राधिकरण के विकल्प पर विचार किया है। इसके लिए जरूरी विधायी बदलावों का इंतजार है।   लॉ फर्म सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर मेखला आनंद ने कहा कि विभिन्न एडवांस रूलिंग अथॉरिटी में न्यायिक सदस्यों का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। यही वजह है कि कई फैसले राजस्व समर्थक पूर्वग्रह से ग्रसित होते हैं। चैलाना ने कहा, 'इन अधिकारियों को राजस्व का प्रशिक्षण मिलता है और वे उसके प्रति पूर्वग्रह रखते हैं। यही वजह है कि कई मामलों में कानून की व्याख्या इस तरह की जाती है कि इससे राजस्व को फायदा मिले।'
 
विधि के अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि अथॉरिटी में न्यायिक सदस्यों की संख्या तकनीकी सदस्यों से अधिक होनी चाहिए। इससे पूरे देश में राज्य प्राधिकरणों द्वारा दिए गए फैसलों में कुछ हद तक मानक सुनिश्चित किया जा सकेगा।  जीएसटी कानून के तहत मुनाफाखोरी रोधी योजना में इस बात का अभाव है कि मुनाफाखोरी और इसके अनुरूप कीमतों में कमी की कैसे और कब गणना की जाएगी। साथ ही कानून में यह नहीं बताया गया है कि कीमतों में कमी कितने समय के भीतर की जा सकती है। विधि के अध्ययन में कहा गया है, 'मुनाफाखोरी रोधी की संवैधानिक वैधता के पीछे एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इसमें स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।'
 
अद्घैत लीग में पार्टनर (कर विवाद प्रबंधन एवं अनुबंध दस्तावेज) सुदीप्त भट्टाचार्य का कहना है कि सरकार को मुनाफाखोरी की गणना के लिए क्षेत्रवार विस्तृत दिशानिर्देश जारी करने चाहिए। उन्होंने कहा, 'उन्हें क्षेत्रवार लेनदेन पर व्यापक चर्चा करनी चाहिए और इसके मुताबिक दिशानिर्देश जारी करने चाहिए।' अधिकांश कानूनी विशेषज्ञ इस बात से सहमत है कि राष्ट्रीय मुनाफाखोरी विरोधी प्राधिकरण (एनएए) को दी गई शक्तियों पर फिर से विचार होना चाहिए। विधि के अध्ययन में कहा गया है कि एनएए को सीमित उद्देश्य के लिए गठित किया गया है और इसे दी गई कुछ शक्तियां बहुत ज्यादा हैं। इस चिंता को दूर करने के लिए जरूरी संशोधन किए जाने चाहिए।
 
भट्टाचार्य ने कहा, 'इस खामी को दुरुस्त करने का एकमात्र तरीका यह होगा कि जीएसटी कानून की धारा 171 में संशोधन करके मुनाफाखोरी के निर्धारण के लिए नीतिगत दिशानिर्देश शामिल किए जाएं। साथ ही प्राधिकरण को मुनाफे की रकम की वसूली, पंजीकरण रद्द करने और ब्याज लगाने का अधिकार भी मिलना चाहिए।'
Keyword: election, economy, GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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