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जीएसटी के बाद भी व्याख्या संबंधी कुछ मसले बाकी

कराधान
सुकुमार मुखोपाध्याय /  April 07, 2019

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के 1 जुलाई 2017 को लागू होने के पहले देश में केंद्रीय उत्पाद शुल्क में कर दरों की विविधता होती थी जिससे वर्गीकरण को लेकर बेहद विवादास्पद स्थिति पैदा हुई। इससे नियमों की व्याख्या करने की अक्सर जरूरत पडऩे लगी और मामले अदालतों तक जाने लगे। कर नियमों की व्याख्या से संबंधित तमाम अदालती फैसले कानूनी किताबों में दर्ज होने लगे।  अब भारत में जीएसटी की केवल दो दरें-12 फीसदी और 18 फीसदी ही ऐसी हैं जिन्हें लेकर वर्गीकरण की समस्या पैदा होगी। ऐसा होने पर एक बार फिर नियमों की व्याख्या का मसला कुछ हद तक खड़ा होने के आसार बने हुए हैं।

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यहां मैं व्याख्या से जुड़ी कुछ समस्याओं पर चर्चा कर रहा हूं जो आगे नहीं भी जारी रह सकती हैं। हालांकि मैं यह दावा नहीं करता कि आगे चलकर व्याख्या से संबंधित ऐसे मामले सामने ही नहीं आएंगे जिन्हें अदालत में चुनौती दी जाए। हालांकि मध्यवर्ती उत्पादों की कराधान क्षमता के मामले में व्याख्या का मसला आगे भी जारी रहने के आसार नहीं है। पहले, एक मध्यवर्ती उत्पाद की श्रेणी निर्धारित करने का भी सवाल खड़ा होता था। इसमें यह तय करना होता था कि किसी कारखाने में तैयार होने वाले किसी उत्पाद के उत्पादन में लगने वाले कच्चे माल के तौर पर लगने वाला उत्पाद है या नहीं। हालांकि मध्यवर्ती उत्पाद कभी भी पूरी तरह तैयार अंतिम उत्पाद नहीं होता है।
 
इस सवाल पर विचार करते समय सबसे अहम बिंदु यह होता था कि कथित उत्पाद पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क लगेगा या नहीं। इसके लिए उस उत्पाद को बेचने की क्षमता (मार्केटेबिलिटी) अहम कारक होती थी। हालांकि मार्केटेबिलिटी के मसले पर कई बार उच्चतम न्यायालय के निर्णय भी आ चुके हैं। इन फैसलों का सार यह था कि उत्पाद अगर बिक्री लायक होते हुए भी वास्तव में नहीं बेचे जा रहे हैं तो भी उन्हें बिक्री-योग्य माना जाएगा। यह स्थिति तलवार की धार पर चलने की तरह था। जीएसटी आने के बाद वह स्थिति सुधरी है क्योंकि अब विनिर्माता नहीं बल्कि आपूर्ति के स्तर पर करारोपण का प्रावधान है। 
 
अगर मध्यवर्ती उत्पादों पर शुल्क लगता भी है तो वे इनपुट क्रेडिट पाने के हकदार होंगे, लिहाजा उन पर राजस्व पहलू शामिल नहीं है। सिद्धांत तौर पर पुरानी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन इस पर विवाद होने की स्थिति खत्म कर दी गई है।  व्याख्या से संबंधित एक और विवादास्पद मुद्दा कई तरह के कार्य संपादित करने वाली मशीनों के वर्गीकरण से संबंधित था। उच्चतम न्यायालय ने जेरॉक्स इंडिया लिमिटेड बनाम सीमा-शुल्क आयुक्त मामले में इससे संंबंधित फैसला सुनाया था। मामला एक मल्टी-फंक्शनल मशीन के वर्गीकरण से जुड़ा हुआ था जो प्रिंटर, फैक्स मशीन, कॉपियर और स्कैनर के तौर पर भी काम कर सकती है। आयातक फर्म इस मशीन को उत्पाद समूह 8471 में शामिल कराना चाहता था जिस पर शून्य शुल्क लगता है। इस उत्पाद में ऑटोमेटिक डेटा प्रोसेसिंग करने वाली मशीनें लगती हैं, लिहाजा मशीन में समेकित इनपुट और आउटपुट इकाइयां शामिल हैं। राजस्व विभाग इस मशीन को अवशिष्ट उत्पाद समूह 8479 में शामिल करना चाहता था जिसमें अन्यत्र निर्दिष्ट कार्य करने वाली मशीनें रखी जाती हैं। इस समूह के उत्पादों पर 7.5 फीसदी शुल्क लगता है।
 
आयातक की दलील थी कि इस मशीन के साथ इनपुट और आउटपुट इकाई के तौर पर कंप्यूटर लगा होता है। उच्चतम न्यायालय ने इस बात को ध्यान में रखा कि इस मल्टी-फंक्शनल मशीन के कुल उपकरणों एवं पुर्जों का करीब 85 फीसदी हिस्सा प्रिंटिंग में ही इस्तेमाल होता है। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि मशीन का मुख्य कार्य प्रिंटिंग ही है और इससे उस मशीन के बुनियादी चरित्र का पता चलता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि प्रिंटर के  8471 उत्पाद समूह में शामिल होने से जेरॉक्स मशीन को प्रिंटर के मद में रखना न्यायोचित है। 
 
इस तरह के विवाद खड़े होने की आशंका अब भी कायम है। खास तौर पर मशीनों के मामले में ऐसा होने की आशंका अधिक है। मशीनरी से संबंधित अध्यायों- 84 और 85 में 12 और 18 फीसदी की केवल दो दरें ही होने से विवाद की आशंका बरकरार है। इसका मतलब है कि जीएसटी आने पर भी कोई मदद नहीं मिली है।  एक और मसला अवशिष्ट शुल्क से संबंधित था। उच्चतम न्यायालय ने इस विषय पर दिए गए अपने कई फैसलों में यही सिद्धांत रखा था कि किसी सीमा शुल्क इंट्री में अगर कई सब-इंट्री हैं तो वर्गीकरण उस सब-इंट्री में ही होना चाहिए और केवल अंतिम विकल्प के ही तौर पर 'अन्य' श्रेणी में रखा जाना चाहिए। वह समस्या अब भी बरकरार है। निहितार्थ यह है कि भले ही जीएसटी ने कर नियमों की व्याख्या से संंबंंधित कई विवाद खत्म कर दिए हैं लेकिन कुछ मसले अब भी करदाताओं को प्रभावित कर रहे हैं।
 
(लेखक केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के पूर्व सदस्य हैं) 
Keyword: economy, GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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