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राज्यों के नेताओं का है यह राष्ट्रीय चुनाव

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 07, 2019

अगर आप समझना चाहते हैं कि भारत को दो तरह से देखा जा सकता है तो आपको दिल्ली से बाहर जाना होगा। एक तरीका है दिल्ली और अन्य हृदय प्रदेशों में बैठकर देश के बाकी हिस्सों को देखना और दूसरा बाहरी हिस्सों से दिल्ली तथा देश के अन्य अंदरूनी हिस्सों को देखना। अगर आप भीतर से बाहर की ओर देखेंगे तो आपको निश्चित तौर पर तस्वीर पूरी तरह राष्ट्रीय पार्टी और राष्ट्रीय नेताओं से संदर्भित दिखेगी। अगर आप खुले दिमाग से और दूर से देखेंगे तो आपको इस नए भारत में बदलाव दिखेगा। राष्ट्रीय पार्टियों का पराभव हो रहा है। देशव्यापी राष्ट्रीय नेता की अवधारणा इंदिरा गांधी के साथ समाप्त हो गई है।

 
भारतीय राजनीति की इस मुखर हकीकत को पिछले दिनों दो सबसे मजबूत क्षेत्रीय क्षत्रपों तेलंगाना के के चंद्रशेखर राव (केसीआर) और वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने अपने-अपने ढंग से दोहराया। उनका कहना था कि देश में अब राष्ट्रीय पार्टी जैसी कोई चीज नहीं है। जिन्हें राष्ट्रीय दल कहा जाता है यानी भाजपा और कांग्रेस, वे भी क्षेत्रीय हैं बस उनका विस्तार एकाधिक राज्यों में है।  राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस के पराभव को समझा जा सकता है लेकिन भाजपा को राष्ट्रीय दल क्यों नहीं कहा जा सकता? सन 2014 में उसने पूर्ण बहुमत भी हासिल किया था। इसे समझने के लिए दिल्ली से बाहर जाना होगा। 
 
दिल्ली में रहकर हम हिंदी प्रदेश को ही देश समझ लेते हैं। भाजपा ने 2014 में जो 282 सीट हासिल की थीं उनमें से अधिकांश उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड (कुल 190) से हासिल की थीं। बाकी की सीटों में से 49 महाराष्ट्र और गुजरात जैसे पश्चिमी राज्यों में मिली थीं। यानी इन राज्यों की 299 में से 239 सीट पर भाजपा जीती थी। देश के शेष हिस्से यानी समूचे दक्षिण (कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु), पूर्व (पूर्वोत्तर के राज्य, पश्चिम बंगाल और ओडिशा) और यहां तक कि सुदूर उत्तर में जम्मू कश्मीर तथा पंजाब की कुल मिलाकर 244 में से भाजपा को केवल 43 सीटों पर जीत मिली। यह परिदृश्य किसी राष्ट्रीय दल का तो नहीं है। यह 10 राज्यों वाला दल है जो इन राज्यों में अधिकतम सीट जीतकर बहुमत हासिल कर पाया।
 
राष्ट्रीय नेताओं की बात करें तो आज केवल मोदी ही इसका दावा कर सकते हैं। उन्हें सब जानते हैं लेकिन क्या वह इन 10 राज्यों के बाहर अपने लिए वोट जुटा सकते हैं? इन 10 राज्यों में भी अधिकांश प्रमुख राज्यों में उनको स्थानीय दलों और नेताओं से चुनौती मिल रही है। उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव के साथ वह आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं। बिहार में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार इन नेताओं के समकक्ष हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने इनमें से एक-एक के साथ कनिष्ठ सहयोगी के रूप में गठबंधन किया है। पंजाब में भाजपा अकाली दल के साथ है, हरियाणा में भाजपा और कांग्रेस दोनों साझेदार तलाश रही हैं। भाषण कला में निपुण होने के बावजूद मोदी काल्पनिक तौर पर भी सात राज्यों से ज्यादा में अपनी पार्टी को जीत दिलाने की स्थिति में नहीं हैं। काल्पनिक इसलिए क्योंकि इनमें उत्तर प्रदेश शामिल है।
 
अगर भाजपा सात से नौ राज्यों वाला राष्ट्रीय दल है तो कांग्रेस के पास छह राज्य हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल, पंजाब और कर्नाटक। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और बिहार में पार्टी अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। यही कारण है कि एकदम बेहतरीन किस्मत होने पर भी कांग्रेस 150 से अधिक सीट नहीं जीत सकती। मुझे पता है कि यह संभव नहीं लगता और शायद 100 सीटों का अनुमान भी आशावादी होगा। परंतु इससे यह साबित करने का लक्ष्य पूरा नहीं होता कि भाजपा 50 प्रतिशत तो कांग्रेस बमुश्किल एक तिहाई राष्ट्रीय पार्टी है। क्या आप किसी राज्य का नाम ले सकते हैं जहां राहुल गांधी अपने दम पर लोकसभा चुनाव का रुख बदलने की काबिलियत रखते हों। 
 
सच यह है कि इंदिरा गांधी आखिरी राष्ट्रीय नेता थीं जो सभी राज्यों में जीत सकती थीं। उनके निधन के बाद दिसंबर 1984 के आम चुनाव को छोड़ दें तो कोई राष्ट्रीय नेता या राष्ट्रीय दल नहीं उभरा है। अब उनकी जगह ताकतवर और करिश्माई क्षेत्रीय और जातीय नेताओं ने ले ली है। इनमें से किसी को क्षेत्रीय नेता कहना भी एक छलावा होगा। उनको मिलने वाले वोट इसके गवाह हैं।  सन 1952 से 1977 के बीच मत हिस्सेदारी में 4 फीसदी से बढ़ते हुए क्षेत्रीय दल 2002-2018 के बीच 34 फीसदी तक आ गए। इन गर्मियों में इसमें और इजाफा होगा। चूंकि ये पार्टियां एक खास क्षेत्र में सीमित होती हैं इसलिए उन्हें मत प्रतिशत के हिसाब से सीट भी अधिक मिलती हैं। आज 34 फीसदी मतों के साथ ये पार्टियां 34 प्रतिशत लोकसभा सीट जीतती हैं। हर बढ़ते प्रतिशत के साथ उन्हें 11 और सीट मिलेंगी जबकि राष्ट्रीय दलों को केवल सात। मैंने ये आंकड़े प्रणय रॉय और दोराब सुपारीवाला की किताब द वरडिक्ट से लिए हैं।
 
अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की मत हिस्सेदारी पारंपरिक रूप से 40 फीसदी के करीब रही है। नए बने राज्य में घटकर 3 फीसदी रह गई। भाजपा के पश्चिम बंगाल और ओडिशा में बढ़ते प्रभाव के दावों की परीक्षा जल्दी हो जाएगी। असम और त्रिपुरा को छोड़कर उसने कोई नया राज्य नहीं जीता है, भले ही बहुमत मोदी के साथ हो और भाजपा के पास 10 करोड़ से अधिक सदस्य हों। भारत में आज करीब 20 ऐसे नेता हैं जो सीमित भौगोलिक या राजनीतिक क्षेत्र में इतने ताकतवर हैं कि मोदी समेत कोई उनके वोट छीन नहीं सकता। उनमें से अधिकांश के पास प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव है और विभिन्न क्षेत्रों तक उनका नेटवर्क फैला है। उनकी चिंताएं और विचारधारा अलग हो सकती हैं लेकिन राष्ट्रीय दलों का वर्चस्व खत्म करने के नाम पर वह एकजुट हैं।
 
दिल्ली और हिंदी प्रदेश के बाहर एक प्रगतिशील दुनिया है जो हमारे बुर्जुआ वर्ग की उस असुरक्षा से दूर है कि अगर मोदी नहीं जीते तो देश में खिचड़ी सरकार बनेगी। दक्षिण और पूर्वी भारत में आपको यह चिंता सुनने को नहीं मिलेगी कि मोदी नहीं तो कौन? बीते तीन दशक में कांग्रेस कमजोर हुई है और भारत सही अर्थों में एक संघीय गणराज्य बना है। राष्ट्रीय चुनाव का स्थान राज्यों में होने वाले 30 चुनावों ने ले लिया है। कोई ऐसा दल नहीं है जिसका इनमें से कम से कम एक तिहाई राज्यों में दबदबा हो। भाजपा और कांग्रेस मिलकर आधे राज्यों में भी दबदबा नहीं रखते।
 
हिंदी प्रदेश की राजनीति में टीना (कोई विकल्प नहीं) तत्त्व क्यों हावी है और इसके बाहर यह निष्प्रभावी क्यों है? एक अहम वजह यह है कि जिन राज्यों में कांग्रेस और भाजपा अपने रसूख के लिए लड़ रही हैं वहां कोई सच्चा क्षेत्रीय नेता नहीं उभरा है। बिहार और उत्तर प्रदेश में लालू, नीतीश, मायावती और अखिलेश बड़े नेता हैं लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। भाजपा उन्हें चुनौती देती है या साथ आने को मजबूर करती है। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में अभी भी बड़े दल प्रभावी हैं। कुछ हद तक कर्नाटक में भी।
 
दूसरी वजह यह कि राष्ट्रीय दल मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व तैयार करना पसंद नहीं करते। कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में में स्वाभाविक उत्तराधिकारी को पनपने न देकर आत्महत्या कर ली। हेलीकॉप्टर दुर्घटना में जगनमोहन रेड्डी के पिता के निधन के बाद पार्टी ने उन्हें सामान्य इज्जत भी नहीं दी। कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर सिंह के रूप में एक ही महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय नेता है। भाजपा के पास योगी आदित्यनाथ के रूप में एक अधूरा क्षेत्रीय नेता है। शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह को दरकिनार कर दिया गया है। भारतीय राजनीति दिलचस्प मोड़ पर है जहां कोई राष्ट्रीय नेता या दल नहीं है और हिंदी प्रदेश के बाहर गठबंधन को लेकर असुरक्षा कम हो रही है। जैसा हमने 2014 में देखा अगर कोई दल आपस में जुड़े राज्यों में 200 सीटें जीत लेता है तो वह अब भी बहुमत हासिल कर सकता है।
 
इन चुनावों में कोई हवा नहीं बह रही है। हम भरोसे के साथ यह कह सकते हैं कि यह चुनाव अलग-अलग राज्य के आधार पर लड़ा जाएगा, काफी हद तक 2004 की तरह। मुझसे यह मत पूछिए कि अगले गठबंधन का नेता कौन होगा। मैं बस यह कह सकता हूं कि अगली सरकार का नेतृत्व कोई भी करे लेकिन यह ऐसा मंत्रिमंडल होगा जहां राम विलास पासवान भी अपनी बात कह सकेंगे। 
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