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पटना साहिब में रोचक मुकाबले से काफी कुछ होगा तय

आदिति फडणीस /  April 05, 2019

मिस्टर एक्स अपनी बात पर अड़े थे। उन्होंने अनुरोध भरे अंदाज में  कहा, 'कृपया, मेरा नाम मत लीजिएगा। 'रविया' हमारा दोस्त है। आप पटना में कायस्थ माने ही नहीं जाएंगे अगर आरके सिन्हा या शत्रुघ्न सिन्हा को न जानते हों।' यह रिपोर्ट उनके विश्लेषण पर ही आधारित है। 

पटना साहिब सीट पर होने वाला चुनाव इस बार के सर्वाधिक दिलचस्प मुकाबलों में से एक होने जा रहा है। इसकी वजह यह है कि किसी और सीट पर शायद ही जाति, सत्ता की राजनीति और पीढ़ीगत बदलाव एक साथ मिलकर इतना कारगर समीकरण बनाते हैं कि वह जल्द आग पकड़ सके। 

आर के सिन्हा पटना की 'प्रबुद्ध' कही जाने वाली आबादी के एक सम्मानित एवं आदरणीय स्तंभ हैं। एक पत्रकार के तौर पर करियर शुरू करने वाले सिन्हा कई दशकों तक बिहार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की गतिविधियों के आधार रहे हैं और उन्होंने अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है। बिहार में अगड़ी जातियां कांग्रेस के साथ हुआ करती थीं। उस समय अगड़ी जातियां (खासकर कायस्थ) और दलित ही कांग्रेस का विजयी फॉर्मूला हुआ करते थे। राजेंद्र प्रसाद, सच्चिदानंद सिन्हा और महामाया प्रसाद सिन्हा के जमाने से ही कायस्थ कांग्रेस का समर्थन करते आ रहे थे।

लेकिन आपातकाल के साथ ही समीकरण बदल गया। कायस्थ समुदाय से ही ताल्लुक रखने वाले जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस के जातिगत वर्चस्व को चुनौती दी। वह एक नया सामाजिक संयोजन बनाने में भी सफल रहे जिसमें सशक्त बनाने का वादा कर मध्यवर्ती जातियों को भी अपने साथ जोड़ा गया। लालू प्रसाद जैसे नेताओं के उदय ने कायस्थों को दूसरी तरफ देखने के लिए मजबूर कर दिया। 

जब कांग्रेसवाद-विरोध का चेहरा कहे जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा बिहार में दाखिल हुई थी तो उसने कायस्थों को भी भाजपा के पाले में डाल दिया था। शत्रुघ्न सिन्हा इसी राजनीति के लाभार्थियों में से एक हैं। वह पटना की राजनीति में कोई मामूली शख्स नहीं हैं और उन्हें एक ऐसे बेटे के तौर पर देखा जाता है जो बाहर नाम कमाने के बाद भी अपनी धरती पर लौटा है।

इसी के साथ रविशंकर प्रसाद का भी नाम आता है। रविशंकर 1970 और 1980 के दशक में जनसंघ और फिर भाजपा की बिहार इकाई के अध्यक्ष रहे ठाकुर प्रसाद के बेटे हैं। वह एक मशहूर पिता के नामवर पुत्र रहे हैं। उनके पिता कर्पूरी ठाकुर मंत्रिमंडल में मंत्री भी थे। लेकिन रविशंकर ने उनसे अलग राह अपनाते हुए अपने दोस्त सुशील मोदी के साथ मिलकर चारा घोटाले में लालू प्रसाद के खिलाफ कानूनी मुकदमा भी लड़ा। वह राजनीति में कोई नौसिखुआ नहीं हैं लेकिन अमूमन एक अनिवासी बिहारी ही माने जाते हैं। 

पटना एक ऐसा शहर है जहां हर कोई एक-दूसरे को जानता है। आर के सिन्हा के बेटे ऋतुराज ने वर्ष 2015 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के वॉर रूम की अगुआई की थी। बिहार और पूर्वी यूपी में होने वाला कायस्थ समुदाय का कोई भी समारोह ऐसा नहीं होता है जिसमें आर के सिन्हा शामिल न होते हों या उसे आर्थिक मदद न करते हों। उन्होंने स्वयं-सहायता समूहों का गठन किया है, उनका संगठन चित्रगुप्त सभा समूचे उत्तर भारत में चैरिटी करता रहता है। उन्होंने वर्ष 2012 में बिहार की जदयू-भाजपा सरकार में किसी भी कायस्थ को जगह न मिलने पर खुलेआम नाराजगी जताई थी। वह दिल से बेहद उदार और प्रेस की स्वतंत्रता के प्रबल पैरोकार हैं। वह कभी भी सच बताने से मुंह नहीं चुराते हैं, चाहे वह लोगों को पसंद हो या नहीं। 

आरएसएस से आश्वासन मिलने के बाद सिन्हा ने लोकसभा चुनाव में अपनी दावेदारी रखने का मन बनाया। बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने इस मामले में लोकसभा क्षेत्र के विधायकों की राय ली। उनमें से नवल किशोर यादव को छोड़कर बाकी सभी विधायकों ने सिन्हा की दावेदारी का समर्थन किया था। यादव कुछ महीने पहले ही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से अलग होकर भाजपा में शामिल हुए थे और राज्य में मंत्री भी बनाए गए हैं।

जब इस संसदीय क्षेत्र से पार्टी उम्मीदवार का नाम तय करने के लिए भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक शुरू हुई तो यह तय था कि शत्रुघ्न सिन्हा को टिकट नहीं मिलने जा रहा है। आर के सिन्हा का नाम लगभग तय माना जा रहा था लेकिन पार्टी उम्मीदवार के तौर पर रविशंकर प्रसाद का नाम घोषित कर दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि प्रसाद का राज्यसभा में अभी साढ़े चार साल का कार्यकाल बाकी है। इस टिकट वितरण का नतीजा यह हुआ कि पटना एयरपोर्ट पर दोनों ही नेताओं के समर्थक एक-दूसरे से भिड़ गए। यह अशोभनीय होने के साथ ही बदसूरत दृश्य भी था। 

आर के सिन्हा का दिल दुखने का अहसास होने के बाद अरुण जेटली ने उन्हें फोन भी किया। जेटली ने इस चुनाव में प्रसाद का साथ देने की गुजारिश की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मिस्टर एक्स कहते हैं कि मौजूदा हालात में रविशंकर प्रसाद के लिए स्थिति संकटपूर्ण हो चुकी है। आर के सिन्हा के नाराज होने का मतलब है कि कायस्थ मतों में विभाजन होगा। दूसरी तरफ शत्रुघ्न सिन्हा अगर कुछ यादव मत जुटा लेते हैं और कुछ मुस्लिम मत भी पा लेते हैं (जो भाजपा के पाले में नहीं जाएंगे) तो प्रसाद के लिए आर के सिन्हा के नाराज रहते हुए जीत हासिल कर पाना खासा मुश्किल हो जाएगा। लेकिन आर के सिन्हा की नाराजगी खत्म होने की संभावना नहीं है। 

मिस्टर एक्स की निजी राय है कि यह प्रकरण 23 मई को चुनावी नतीजे आने के बाद की स्थिति को बयां करता है। मोदी और शाह की जोड़ी अपनी अलग सोच रखने वाले सांसद नहीं चाहती है, और ऐसे सांसद तो कतई नहीं जो सीधे आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व को फोन कर उनसे बात कर सकें। इसके अलावा दोनों नेता पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव के भी पक्षधर हैं। पटना साहिब सीट के नतीजे यह तय करेंगे कि मोदी-शाह के वर्चस्व या सीट पर जीत में से ज्यादा अहम क्या है?

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