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पर्यावरण के अनुकूल हो औद्योगिक नीति

अरुणाभ घोष /  April 05, 2019

दुनिया जहां स्थायी विकास और कम कार्बन उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था की ओर चरणबद्घ ढंग से बढ़ रही है, क्या भारत को सोलर पैनल के विनिर्माण पर दांव लगाना चाहिए? या इलेक्ट्रॉनिक वाहनों के निर्माण पर? स्थिर और चलित वस्तुओं के लिए बैटरियों का निर्माण कैसा रहेगा या फिर रेफ्रीजरेट और वातानुकूलक जैसे उपकरणों का निर्माण? हम अत्यधिक कम कार्बन वाले स्टील के निर्माण से संबंधित शोध कर सकते हैं या फिर छोटे और मझोले उपक्रमों को अधिक किफायती बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं। अगर भारत अधिक प्रतिस्पर्धी और नवाचारी रुख अपनाकर इनमें से कुछ या सभी उपकरणों का निर्माण करता है या उनके घटक तैयार करता है तो इसमें कोई दिक्कत नहीं है। सवाल यह है कि इनको दरकिनार करके भला भारत भविष्य के हरित उद्योगों में अपने लिए जगह कैसे बना पाएगा? 

बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में पर्यावरण के अनुकूल औद्योगिक नीतियों को लेकर रुझान बढ़ा है। ये वे नीतियां हैं जो सतत विकास के अनुरूप हैं और स्वच्छ तकनीक की मदद से काम करती हैं। ऐसा करते हुए बाजार की विफलताओं से निपटना है। स्वच्छ तकनीक में अभी भी पर्याप्त निवेश नहीं है क्योंकि उनके सकारात्मक प्रभावों को पूरी तरह समझा नहीं गया है और पर्यावरण को वायु, जल एवं भूमि प्रदूषण से हो रहे नुकसान, जैव विविधता के नुकसान आदि का पूरी तरह आकलन नहीं किया जा सका है। 

विकसित और उभरते बाजार (ब्राजील, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, जापान, नीदरलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका आदि) ने कई सहयोगात्मक उपाय अपना रखे हैं। जर्मनी ने पवन, सौर फोटोवॉल्टिक, सौर ताप, भूताप और नवीकरणीय ऊर्जा को समेकित करने के उपायों पर अरबों यूरो की राशि व्यय की है। सन 2008 के वित्तीय संकट के बाद अमेरिका ने पर्यावरण के अनुकूल तकनीक से जुड़े शोध में 2000 करोड़ डॉलर का निवेश किया। जर्मनी ने नवीकरणीय ऊर्जा के लिए कम ब्याज दर पर ऋण देने का निर्णय लिया और ऊर्जा किफायत, ऊर्जा भंडारण, ई मोबिलिटी और प्रशीतन के लिए अलग कोष बनाने की बात कही। उसने जर्मन तकनीक के निर्यात के लिए द्विपक्षीय सहयोगी की बात भी कही। 

चीन ने घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग को हजारो करोड़ डॉलर की राशि कम ब्याज पर उपलब्ध कराई है। इसके अलावा उसने कर रियायत और छूट देने तथा ऊर्जा क्षेत्र को सस्ती बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने का काम भी किया है। उसने इलेक्ट्रिक वाहनों  पर सब्सिडी के रूप में 5,900 करोड़ डॉलर की राशि व्यय की है। यही कारण है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता देश है। 

इससे जुड़ी तमाम अन्य प्रेरणाएं भी हैं। स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में वैश्विक आपूर्ति शृंखला तैयार करने के बजाय घरेलू कंपनियों को बचाने और बाजार हिस्सेदारी पर पकड़ मजबूत करने की कोशिशें जोर पकड़ रही हैं। स्वच्छ कंपनियों के विकास के क्षेत्र में जो पेशकदमी करेगा उसे लाभ मिलना तय है। क्योंकि वह इस तकनीक को दूसरों को देकर लाभ कमा सकता है। सन 2002 में सौर पीवी निर्माण में जापान का दबदबा था। सन 2012 तक सात चीनी कंपनियां इसके शीर्ष 10 निर्माताओं में शामिल थीं। चीन ने उच्च गति की रेल के मामले में भी खुद को बहुत तेजी से स्थापित किया। इस समय दुनिया का सबसे बड़ा उच्च गति रेल नेटवर्क चीन में है। उसने इस क्षेत्र में जर्मनी और जापान जैसे पारंपरिक बढ़त वाले देशों को पीछे छोड़ दिया है। 

ऐसी प्रेरणा नियामकीय नियंत्रण और नीतिगत विसंगति के जोखिम के साथ आती है। भारत में सौर पीवी विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय सामग्री आवश्यकता (एलसीआर) और सेफगार्ड शुल्क का इस्तेमाल किया गया। परंतु एलसीआर नीति के साथ छेड़छाड़ की गई और निर्माताओं ने पाया कि आयातित कच्चे माल पर लगने वाला शुल्क अंतिम उत्पाद पर लगने वाले शुल्क से अधिक है। इसके परिणामस्वरूप देश का पीवी विनिर्माण क्षेत्र लगातार दबाव में बना हुआ है। 

चीन के मॉडल का अनुसरण करने की भावना के बीच यह समझना होगा कि किन विशेष परिस्थितियों में क्या कारगर साबित हुआ। चीन जिस समय विश्व व्यापार संगठन में शामिल हुआ, उसी वक्त उसने घरेलू सौर उद्योग का विकास शुरू किया था। इससे उसके निर्माताओं को यूरोप और उत्तर अमेरिका का बाजार मिला। बहरहाल, बीते दशक के दौरान विश्व व्यापार संगठन में स्वच्छ ऊर्जा को लेकर बढ़ते विवादों का अर्थ यह हुआ कि नए आने वाले देश स्वच्छ प्रौद्योगिकी को हल्के में नहीं ले सकते थे। 

जर्मनी ने अरबों डॉलर की राशि सौर ऊर्जा उपभोक्ताओं को सब्सिडी देने में व्यय की है। यह राशि सीधे-सीधे चीन से निर्यात होकर आने वाले सौर पीवी के खाते में गई। पवन ऊर्जा को इसका अधिक हिस्सा नहीं मिला। यानी समर्थन सीधे जर्मन उपकरण निर्माताओं को मिला और वे प्रतिस्पर्धी बने रहे।  

भारत इससे क्या सीख सकता है? पहली बात, पर्यावरण के अनुकूल औद्योगिक नीति के लक्ष्यों को सही ढंग से परिभाषित किया जाए। रोजगार संरक्षण समेत तमाम लक्ष्यों को पर्यावरण लक्ष्यों के साथ जोड़ा जाए क्योंकि इससे अनुशासन और जवाबदेही पर असर पड़ता है। दूसरी बात, जब डिजाइनिंग चुनौतियों पर भारी पड़े तो बेहतर है कि कड़े तकनीकी और प्रदर्शन मानक तय किए जाएं बजाय कि विशिष्ट तकनीक को तवज्जो देने के। यह बात इलेक्ट्रिक वाहन और ऊर्जा भंडारण उद्योग पर खासतौर पर लागू होती है। तीसरा, ऐसी औद्योगिक नीतियां बेहतर होती हैं जो तमाम क्षेत्रों पर लागू होती हों। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद ने नैनोटेक्रॉलजी, औद्योगिक बायोटेक्रॉलजी और एडवांस मटीरियल को सबसे उन्नत तकनीक के रूप में चिह्निïत करती है। 

चौथा, भारत को बाजार के विशाल आकार का लाभ लेना चाहिए। चीन में नवीकरणीय ऊर्जा पर होने वाला विश्वविद्यालयीन शोध इसके विनिर्माण को जल्दी प्रभावित नहीं करता। चीन को विदेशी प्रौद्योगिकी ज्ञान के हस्तांतरण से अधिक लाभ मिला है। भारत को भी इसके लिए प्रोत्साहन देना चाहिए।

पांचवां, बिना शोध एवं विकास पर व्यय के तकनीकी नेतृत्व नहीं हासिल हो सकता। उपभोक्ताओं को सब्सिडी या कंपनियों को कर रियायत देने से प्रौद्योगिकी विकास में लाभ नहीं होगा। छठा, प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना चाहिए। प्रत्यक्ष समर्थन के उपाय तब बेहतर ढंग से काम करते हैं जब वे घरेलू या निर्यात बाजार में प्रतिस्पर्धा से संबद्घ हों। व्यक्तिगत फर्म को लाभ देने से निजी निवेशक व्यवस्था का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं। 

जल्दी ही नई सरकार को देश में औद्योगिक वृद्घि और देश में सतत विकास पर विचार करना होगा। उसे प्रभावी हरित पर्यावरण नीति के लिए सही माहौल तैयार करना होगा। ऐसा करके ही हम भविष्य में एक बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकते हैं।
(लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वॉयरनमेंट ऐंड वाटर के सीईओ हैं।)
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