बिजनेस स्टैंडर्ड - अधिग्रहण के बारे में नई नियामक प्रणाली जरूरी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, April 22, 2019 06:26 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

अधिग्रहण के बारे में नई नियामक प्रणाली जरूरी

सोमशेखर सुंदरेशन /  April 04, 2019

यह लेख जेट एयरवेज को बचाने की कर्जदाताओं की जद्दोजहद से संबंधित है। कुछ लोग यह दलील देंगे कि दिवालिया होने के कगार पर जा पहुंची किसी भी कंपनी को डूब जाने देना चाहिए, भले ही उसका आर्थिक व्यवस्था पर तात्कालिक असर जो हो। वहीं कुछ यह दलील देंगे कि सरकार को संकटग्रस्त कंपनी की मदद के लिए आगे आना चाहिए। कुछ लोग यही राय रखेंगे कि नियामक मनमाने ढंग से काम कर रहा है और कुछ कंपनियों के पक्ष या विपक्ष में अनजान कारणों से भेदभाव कर रहा है।

तमाम शोरशराबे से इतर, विमानन उद्योग के मामले में नियामकीय नीति का एक चेहरा मजबूती से नजर आता है। यह क्षेत्र नियामकीय नीति के मामले में एक चट्टान और एक सख्त जगह के बीच फंसा हुआ है। विमानन क्षेत्र में विदेशी निवेश के प्रावधान संबंधी कानूनों के तहत कोई भी विदेशी एयरलाइन भारत की किसी एयरलाइन में 49 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकती है। अधिग्रहण संबंधी प्रतिभूति कानूनों के तहत एक सूचीबद्ध कंपनी में 25 फीसदी या उससे अधिक हिस्से का अधिग्रहण करने के लिए यह जरूरी है कि अधिग्रहणकर्ता दूसरे शेयरधारकों से अतिरिक्त 26 फीसदी हिस्सा खरीदने के लिए खुली पेशकश करे।

दूसरे शब्दों में, एक कानून विदेशी एयरलाइन की हिस्सेदारी 50 फीसदी से कम रहने की बात करता है तो दूसरा कानून विदेशी एयरलाइन के लिए 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी लेने को कहता है। नियमों में अंतर्निहित यह विरोधाभास भारत में कारोबारी सुगमता को मुश्किल बना देता है। 

भारत में एक के बाद कई एयरलाइन इन बाधाओं के जाल में फंसती रही हैं। इसी वजह से कोई भी विदेशी एयरलाइन किंगफिशर के अधिग्रहण एवं संचालन के लिए उस पर नजदीकी नजर नहीं डाल सका। स्पाइसजेट का अधिग्रहण करने वालों ने पूंजी बाजार नियामक की नाक के ठीक नीचे रहते हुए भी खुली पेशकश करने की बाध्यता से अपना मुंह मोड़ लिया था। एक सक्षम प्राधिकरण द्वारा मान्यता-प्राप्त इंतजामों की योजना के अनुरूप अधिग्रहण में खुली पेशकश की बाध्यता से राहत देने वाले प्रावधान पर यकीन करते हुए स्पाइसजेट के लिए एक पुनरुद्धार योजना को नागरिक उड्डïयन मंत्रालय ने मंजूरी दी थी। दुस्साहसी तरीके से की गई इस व्याख्या को बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने व्यापक मीडिया कवरेज के बावजूद अधिक तवज्जो नहीं दी। 

अब जेट एयरवेज की बारी आई है। पहले से ही जेट में 24 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली एतिहाद को भी शायद इस विरोधाभास की जानकारी मिल चुकी है जबकि इस एयरलाइन में पैसे लगाने के लिए तैयार कर्जदाता बैंक जेट को उस कंपनी के हाथों बेचना चाहेंगे जो इसे ठीक से चला सके। वे इस बार भी उसी तरह के नियामकीय विरोधाभासों की चपेट में आएंगे जो उन्हें अलग-अलग दिशा में ले जाना चाहेंगे।

जहां एक्सचेंज नियंत्रण भारतीय हाथों में महत्त्वपूर्ण भारतीय परिसंपत्तियों के स्वामित्व को बचाए रखने की कोशिश करता है, वहीं प्रतिभूति नियम एक सूचीबद्ध कंपनी के स्वामित्व में बड़े बदलाव होने पर शेयरधारकों को उससे निकलने का मौका देकर उनके हितों को संरक्षित करने की बात करते हैं। इन दोनों में से एक भी परिप्रेक्ष्य अधूरा रह जाने पर वह हिस्सेदारी खरीद गैर-कानूनी हो जाएगी। इस तरह जब एक सूचीबद्ध विमानन कंपनी की बात आती है तो उसे दोनों ही मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। 

इस स्थिति को सुधारने का सीधा तरीका यह है कि शेयरधारकों की मदद के लिए एक ऐसा नियामकीय ढांचा बनाया जाए ताकि वे यह फैसला कर पाएं कि प्रतिभूति नियमों के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करना है या वे ऐसे अधिकार को छोडऩा चाहते हैं। दूसरे देशों में 'व्हाइटवॉश' के नाम से जाना जाने वाला यह प्रावधान एक प्रस्तावित लेनदेन के संदर्भ में शेयरधारकों को यह तय करने को कहता है कि वे खुली पेशकश के जरिये अपने शेयर दोबारा खरीदना चाहते हैं? अगर शेयरधारकों की बड़ी संख्या (मसलन, 90 फीसदी) इस बात की पुष्टि कर देते हैं कि वे खुली पेशकश नहीं चाहते हैं और अपनी कंपनी को संकट से उबारना चाहते हैं तो खुली पेशकश रखने की बाध्यता से राहत मिल जाएगी। 

दूसरे शब्दों में, खुली पेशकश संबंधी प्रावधानों से संरक्षित शेयरधारकों के हित एक संकटग्रस्त कंपनी के निष्क्रिय शेयरों को बनाए रखने से प्रभावित होते हैं। व्हाइटवॉश व्यवस्था ऐसी कंपनियों को बेलआउट करने का विकल्प देती है जिसमें शेयरधारकों को यह चुनने का अधिकार मिलता है कि वे बड़े एवं बेहतर सौदे के विकल्प को आजमा सकें।

अधिग्रहण नियम परामर्श समिति (लेखक भी इसके सदस्य रह चुके हैं) ने भी व्हाइटवॉश की ही तरह प्रणाली अपनाने का सुझाव दिया था लेकिन एक दशक बीतने के बाद भी अब तक इस दिशा में कुछ किया नहीं गया है। अब उस फाइल से धूल झाडऩे का वक्त आ गया है।
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: Jet airways, Airlines, debt, airlines service, Economy, जेट एयरवेज, सस्ती विमानन सेवा, Spicejet, Acquisition,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या पवन हंस की विनिवेश योजना होगी सफल?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.