बिजनेस स्टैंडर्ड - विमानन संकट से निकले कुछ सबक
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विमानन संकट से निकले कुछ सबक

अजय शाह /  April 04, 2019

विमानन क्षेत्र को पिछले दिनों आपूर्ति क्षेत्र में कई झटके एक साथ लगे। किसी बाजार में अगर आपूर्ति अचानक सीमित हो जाए तो क्या होता है? कीमतों में तब तक बदलाव होता रहता है जब तक कि आपूर्ति और मांग के बीच का अंतर समाप्त नहीं हो जाता। अगर हम इस बात को सस्ती विमानन सेवा के टिकट पर लागू करके देखें तो मांग में जबरदस्त लचीलापन रहता है और कीमतों में अपेक्षाकृत मामूली बदलाव से ही संतुलन कायम हो जाता है। इस बीच बची हुई विमानन सेवाओं के मुनाफे में काफी इजाफा होता है। ये कंपनियां और अधिक विमान किराये पर लेती हैं और आपूर्ति का अंतर कम होता है। कीमतों में उतार-चढ़ाव और किसी फर्म का बंद होना भी, ये सब बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की दृष्टि से काफी अहम होता है। 

जेट एयरवेज की कठिनाइयां और बोइंग कंपनी द्वारा कुछ विमानों को उड़ान भरने से रोकना, संयोगवश ये घटनाएं एक साथ घटी हैं और इन्होंने विमानन क्षेत्र के लिए आपूर्ति का एक संकट सा उत्पन्न कर दिया है। क्या इससे हवाई टिकटों के दाम में नाटकीय उछाल आएगी? बाजार इसे लेकर कैसी प्रतिक्रिया देगा? 

कीमतों के बारे में मूल बात यह है कि वे तब तक बदलती हैं जब तक कि आपूर्ति और मांग के बीच संतुलन नहीं स्थापित हो जाता। उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि सूखा पड़ा है और गेहूं की आपूर्ति कम हो रही है, ऐसे में बाजार में मांग और आपूर्ति का असंतुलन कायम हो जाएगा। कीमत में तब तक बदलाव आएगा जब तक कि कुछ खरीदार बाहर नहीं हो जाते और उसके बाद आपूर्ति सुनिश्चित होने से मांग पूरी नहीं होने लगती। समस्या यह है कि अधिकांश लोग गेहूं की कीमत को लेकर उतने संवेदनशील नहीं हैं। गेहूं की कीमत में मामूली बदलाव से उसकी मांग में कोई बड़ा बदलाव आने वाला नहीं है। ऐसे में आपूर्ति क्षेत्र की दिक्कत दूर करने के लिए मांग में बड़ा बदलाव आवश्यक है।

विमानन क्षेत्र के हालात इससे एकदम उलट हैं। बीते 20 वर्ष या उससे अधिक समय में मध्य वर्ग के विमान यात्रियों की तादाद बढ़ी है जो इकनॉमी क्लास की सस्ती उड़ान के टिकट खरीदते हैं। ये यात्री किराये को प्राथमिकता देते हैं। जब टिकट की कीमत बढ़ती है, तो ये लोग ट्रेन या बस से सफर करना शुरू देते हैं। मांग में इस भारी भरकम लचीलेपन का अर्थ यह हुआ कि कीमतों में थोड़ा सा भी इजाफा होने पर मांग में कमी आएगी। समय बीतते जाने पर यह प्रवृत्ति और अधिक जड़ पकड़ती जाएगी क्योंकि मौजूदा उड़ानों में कई सीटें पहले बिक चुकी थीं और मांग से निपटने के लिए बहुत कम संभावना होगी।

पहले तो बची हुई कंपनी को मुनाफा होगा, यह बाजार की सामान्य और निष्पक्ष प्रक्रिया है। बाजार तंत्र कठिन समय में कम मुनाफे पर काम करता है ताकि ऐसे अच्छे दिनों में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके। देश के कंपनी जगत में बेहतर स्थिति बहाल करने के लिए कमजोर कंपनियों को बंद करने की आवश्यकता है। जो विमानन कंपनियां सक्षम हैं वे बच जाएंगी। जब उन्हें लगेगा कि हालात बेहतर हैं तो वे अपनी क्षमता बढ़ाएंगी और नए विमानों का परिचालन शुरू करेंगी। विमानों पर ध्यान केंद्रित करना उपयोगी है। मान लेते हैं कि कोई विमान मुंबई से नागपुर तक उड़ान भरता है। पहले जेट एयरवेज इन विमानों का स्वामित्व रखता था या इन्हें लीज पर लेता था। एक बेहतर वित्तीय व्यवस्था वह होती है जहां लीज पर विमान देने वाली कंपनियां अपने विमानों को एक कंपनी से दूसरी विमानन कंपनी को हस्तांतरित करती रहती हैं। जब तक विमान उड़ान भरता है, इस बात से कोई मतलब नहीं कि उस पर किस कंपनी का लोगो (चिह्न) लगा है।

कुछ लोग इस बात से नाखुश हैं कि कीमतों में अस्थायी ही सही उछाल आई है। हमें ऐसा लगता है कि कीमतों में इजाफा नहीं होना चाहिए। परंतु बाजार प्रक्रिया में कीमतों में उतार-चढ़ाव होता ही है। आपूर्ति में कमी आने की स्थिति में हमें उच्च कीमतों की आवश्यकता होती है ताकि उन ग्राहकों को रोका जा सके जो ट्रेन, बस या वीडियो कॉल की ओर स्थानांतरित हो जाते हैं, तथा ये सीटें अन्य खरीदारों को आवंटित की जा सकें। एक बेहतर बाजार वही है जिसमें कीमतों में निरंतर बदलाव आता रहे और खबरों पर तेजी से प्रतिक्रिया हो। 

कुछ लोग बची हुई विमानन कंपनियों के मुनाफे में हो रहे इजाफे से अप्रसन्न हैं। लब्बोलुआब यह है कि बेहतर कंपनियों की मदद से देश में निवेश बढ़ाया जाए। देश में कई उद्योग ऐसे हैं जो अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके बावजूद इनकी कम दरों का नुकसान समूचे उद्योग के मुनाफे पर पड़ता है। इन कंपनियों को बाजार से बाहर करने से मुनाफा बढ़ता है और निवेश की जमीन तैयार होती है। 

एक अच्छी बाजार आधारित अर्थव्यवस्था वह होती है जिसमें निरंतर और स्थिर गति से रचनात्मक विनाश की प्रक्रिया चलती रहे। हर वर्ष कुछ कंपनियों का खात्मा होना चाहिए और कुछ नई कंपनियों को बाजार में शामिल होना चाहिए। उदाहरण के लिए देश के हर मॉल में हम ऐसा होता देखते हैं। हर कुछ महीनों में दुकानों के मालिक बदलते हैं। अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में ऐसा बदलाव होना चाहिए।

सरकार को क्या करना चाहिए? सबसे पहले तो उसे मूल्य तंत्र को लागू करना चाहिए। अगर कोई कंपनी दिक्कत में हो तो उसे उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए। सरकार की भूमिका दिवालिया प्रक्रिया से जुड़ी है। हमे दिवालिया प्रक्रिया में इतनी क्षमता तैयार करनी होगी इसे तेजी से अंजाम दे सकें। यह प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष होनी चाहिए। सरकार को ऐसी क्षमता तैयार करनी चाहिए ताकि ऋणशोधन प्रक्रिया शुरू हो सके।

सरकार को ऐसे वित्तीय सुधारों को अंजाम देना चाहिए जो वित्तीय व्यवस्था के अच्छे नतीजे दिला सकें। लीज पर लिए गए विमानों की भूमिका भी अहम है। इससे उनके पुनर्आवंटन में सहूलियत होती है। एक विमान को थोड़े बहुत बदलाव के बाद आसानी से एक कंपनी से दूसरी कंपनी को दिया जा सकता है। कर नीति, वित्तीय नियमन आदि की दिशा में काफी काम किया जाना है ताकि लीजिंग की प्रक्रिया को सहज बनाया जा सके। ऐसा करने से उत्पादक परिसंपत्तियों को उनका इस्तेमाल करने वाली फर्म को अलग किया जा सके।

कंपनियों के बहिर्गमन और कीमतों में उतार-चढ़ाव को दिक्कत के रूप में देखा जाता है। हमारे देश में वास्तविक बाजार अर्थव्यवस्था की भावना का लागू होना शेष है। कंपनियों के बाजार में प्रवेश या बहिर्गमन के साथ हस्तक्षेप या कीमतों में उतार-चढ़ाव के साथ छेड़छाड़ करना बाजार में ठहराव की वजह बनता है।
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