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वृद्घि के लिए कटौती

संपादकीय /  April 04, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने लगातार दूसरी बार 25 आधार अंकों की कटौती की है। हालिया नीति में व्यापक संदेश यही है कि अगस्त 2017 के बाद गत फरवरी में मानक दर में जो पिछली कटौती की गई थी वह सिलसिला अब भी जारी है। इसके साथ ही मौद्रिक नीति का रुख भी समाकलित सख्ती से बदलकर निरपेक्ष कर दिया गया था। वह सिलसिला भी जारी है क्योंकि एमपीसी शायद मॉनसून की स्थिति, ईंधन कीमतों और अगले बजट जैसे अनिश्चित कारकों पर और अधिक स्पष्टता चाहती है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एमपीसी ने वर्ष 2019-20 में देश के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्घि को लेकर अपना अनुमान 7.4 फीसदी से कम करके 7.2 फीसदी कर दिया है। व्यापक संदेश यह है कि ऐसे वक्त में जबकि मुद्रास्फीति सीमित है और वृद्घि संघर्ष कर रही है, तब आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। आरबीआई ने यह कहकर अपनी प्राथमिकताएं स्पष्टï कर दी हैं कि घरेलू वृद्घि की मजबूत करने की जरूरत है और इस क्रम में निजी निवेश को बढ़ावा देना होगा जो काफी हद तक धीमा है। 

रीपो दर में जो ताजा कटौती की गई है वह अनुमान के अनुरूप ही है। यह सच है कि मुख्य खुदरा महंगाई, जिसका आकलन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में सालाना आधार पर आए बदलाव के अनुरूप किया जाता है, उसमें फरवरी में 2.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे पहले इसमें लगातार चार महीने तक गिरावट दर्ज की गई थी। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने जोर देकर कहा कि यह बढ़ोतरी अनुमानित से कम है।

हाल के दिनों में असली चिंता यह है कि मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी मुख्यतौर पर गैर खाद्य और गैर ईंधन क्षेत्र की वस्तुओं की मूल्य वृद्घि के कारण हो रही है। परंतु आरबीआई के नीतिगत वक्तव्य में यह भी उल्लेख किया गया कि आरबीआई के घरेलू सर्वेक्षण के आधार पर आकलित मुद्रास्फीति संबंधी अनुमान फरवरी में पहले की तुलना में 40 आधार अंक घटा है। 

ऐसे में मुख्य चिंता है आर्थिक वृद्घि में आ रहा धीमापन। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि वृद्घि में चिंतित करने की हद तक धीमापन दर्ज किया गया है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने फरवरी 2019 में 2018-19 का जो दूसरा अग्रिम अनुमान जारी किया उसमें देश के वास्तविक जीडीपी वृद्घि अनुमान को पहले अग्रिम अनुमान के 7.2 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी कर दिया गया। यह घरेलू खपत में निजी और सार्वजनिक दोनों तरह की गिरावट का संकेतक था। 

अन्य प्रमुख संकेतक मसलन औद्योगिक उत्पादन सूचकांक और आठ प्रमुख उद्योगों की वृद्घि भी निराशाजनक रही। निवेश गतिविधियों के संकेतक मसलन जनवरी में पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन और फरवरी में इनका आयात, दोनों कम हुए। हालांकि सबकुछ बुरा नहीं रहा। मिसाल के तौर पर विनिर्माण क्रय प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) मार्च में लगातार 20वें महीने विस्तार दर्शाने वाला रहा। इसी तरह विनिर्माण क्षेत्र के संकेतक मसलन इस्पात खपत और सीमेंट उत्पादन के क्षेत्र में अच्छी वृद्घि देखने को मिलती रही। 

एकमात्र निराश करने वाली बात यह रही कि नीतिगत क्षेत्र में ब्याज दरों के पारेषण में कमी की समस्या को हल करने के लिए समुचित कदम नहीं उठाए गए। आरबीआई द्वारा फरवरी में 25 आधार अंकों की कटौती के बावजूद बैंकों ने अपनी ऋण दर में केवल 5 से 10 आधार अंक की ही कटौती की। अगर उस लिहाज से देखा जाए तो बाजार जो नकदी की स्थिति में परिवर्तन की राह तक रहा था, वह यह देखकर निराश हुआ होगा कि बैंकिंग क्षेत्र को पर्याप्त नकदी मुहैया कराने के क्षेत्र में केवल आश्वस्ति ही प्रदान की गई है।
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