बिजनेस स्टैंडर्ड - भाजपा, तृणमूल में दार्जिलिंग के लिए होड़
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, December 06, 2019 01:30 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम जिरह खबर

भाजपा, तृणमूल में दार्जिलिंग के लिए होड़

अभिषेक रक्षित /  04 03, 2019

लोकसभा चुनाव

ताकत
भाजपा: जीजेएम और जीएनएलएफ जैसे स्थानीय दलों के साथ आधिकारिक गठजोड़, गुरुंग भी भाजपा उम्मीदवार का कर रहे हैं समर्थन
तृणमूल: स्थानीय लोग टीएमसी के उम्मीदवार अमर सिंह राय का काफी सम्मान करते हैं और उन्हें जीजेएम में दरार का अंदाजा है

कमजोरी
भाजपा: बाहरी उम्मीदवार को चुनाव के मैदान में उतारा है
तृणमूल : स्थानीय लोगों को याद है कि तृणमूल के नेतृत्व में कितने खराब तरीके से 2017 के संकट से निपटा गया था

मौका
भाजपा: तृणमूल के नेतृत्व वाली राज्य सरकार द्वारा 2017 के संकट का प्रबंधन ठीक तरीके से नहीं हुआ जिससे भाजपा को वोट पाने में मिल सकती है बढ़त
तृणमूल: जीजेएम के भीतर कई धड़े बनने से तृणमूल को अपने पक्ष में वोटों को जुटाने में मदद मिलेगी

खतरे
भाजपा: गोरखा समुदाय का एक बड़ा वर्ग भाजपा से भ्रमित होता है। लेप्चा और अन्य दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय तृणमूल का समर्थन कर सकते हैं
तृणमूल: विमल गुरुंग के सार्वजनिक रूप से सामनेे आने पर सभी राजनीतिक समीकरण गड़बड़ हो सकते हैं

 

बिजनेस स्टैंडर्ड भाजपा, तृणमूल में दार्जिलिंग के लिए होड़पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों पर होने वाले चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच दार्जिलिंग पर नियंत्रण बनाने के लिए कड़ा मुकाबला होने की संभावना है। भाजपा दार्जिलिंग सीट को अपने खाते में बनाए रखने की पुरजोर कोशिश कर रही है जबकि तृणमूल इस लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में पहली बार जीत के लिए व्यग्र है।

भाजपा ने 2004 में हार के बाद दार्जिलिंग लोकसभा सीट जीतने के साथ ही पश्चिम बंगाल में अपनी वापसी की थी। दार्जिलिंग के अलावा भाजपा को पिछले लोकसभा चुनाव में आसनसोल निर्वाचन क्षेत्र में जीत मिली थी। दूसरी तरफ 1998 में अपनी स्थापना के बाद से तृणमूल एक बार भी दार्जिलिंग से चुनाव जीतने में सफल नहीं रही है। 

दार्जिलिंग जातीय आधार के लिहाज से संवेदनशील है जहां गोरखा समुदाय का दबदबा है और साथ ही लेप्चा, तमांग और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की भी मौजूदगी है। इन सभी समुदायों की लंबे समय से ख्वाहिश यह है कि गोरखालैंड के नाम से उनका एक स्वतंत्र राज्य बन जाए जो अब तक महज एक मिथक ही बना हुआ है। इस खूबसूरत पर्वतीय क्षेत्र को इस आकांक्षा के चलते राजनीतिक तनाव से लेकर हत्या, लूट, आगजनी और अनिश्चितकालीन बंद का खमियाजा भुगतना पड़ा है।

दो साल पहले 104 दिनों के बंद के बाद दार्जिलिंग में हालात सामान्य हुए। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) को अपने धुर विरोधी तृणमूल के साथ समझौता करना पड़ा जो यहां खाता तक नहीं खोल पाई है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख बिमल गुरुंग आधिकारिक रूप से फरार हैं और पार्टी का दारोमदार अब बिनय तमांग के हाथों में है जिनके संबंध तृणमूल से अपेक्षाकृत बेहतर हैं।

तृणमूल उम्मीदवारों की सूची की घोषणा होने के साथ ही पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह मुद्दा बनाया है कि इस पर्वतीय क्षेत्र में तृणमूल का झंडा बुलंद करने वाला नेता पर्वतीय क्षेत्र में स्थानीय लोगों के बीच लोकप्रिय हो।  ऐसे में स्वाभाविक रूप से अमर सिंह राय का चयन किया गया जो एक पूर्व गोरखा शिक्षक हैं। वह जीजेएम बैनर के तले राजनीति से जुड़े हैं और राज्य के विधानसभा चुनावों में दार्जिलिंग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

गोरखा समुदाय के एक वर्ग के बीच राय का सम्मान है। उन्होंने अब लोकसभा चुनाव में तृणमूल का दामन थाम लिया है। भाजपा ने एक ताजा चेहरा उतारा है राजू सिंह बिष्टï, जो मणिपुर के गोरखा हैं। उन्होंने मौजूदा सांसद एस एस आहलूवालिया की जगह ली है जिन्होंने पिछली दफा दार्जिलिंग सीट 1.5 लाख वोटों के अंतर से जीती थी। 

भाजपा और तृणमूल के नेता दार्जिलिंग की इस स्थिति को पहले के मुकाबले थोड़े अलग तरीके से देखते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षक भी दार्जिलिंग को एक जटिल क्षेत्र मानते हैं। तृणमूल खेमे के नेताओं का मानना है कि राय तृणमूल के लिए वोट जुटाने में कारगर होंगे और जीजेएम के भीतर तमांग धड़े के लोग लोकसभा सीट के लिए राय के दावे का समर्थन करेंगे। भाजपा नेता अपना पूरा भरोसा, भाजपा-जीजेएम-गोरखा नैशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) गठजोड़ और उम्मीदवार के लिए गुरुंग के समर्थन पर जता रहे हैं।

भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष चंद्र कुमार बोस कहते हैं, 'दार्जिलिंग हमारे लिए एक सुरक्षित सीट रही है लेकिन राजनीतिक समीकरण में बदलाव की वजह से अब ऐसा नहीं है। इस बार कड़ा मुकाबला होगा।' वहीं दूसरी तरफ बिष्ट के भाजपा उम्मीदवार की घोषणा होने से जीजेएम में असंतोष बढ़ा है। इसकी केंद्रीय समिति के सदस्य स्वराज थापा ने विरोध जताते हुए पार्टी छोड़ दी। उन्होंने गुरुंग को पत्र लिखकर कहा कि भाजपा के उम्मीदवार बिष्टï बाहरी हैं, भले ही वह गोरखा हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सालों से चल रहे विद्रोह की वजह से जीजेएम की ताकत कम हुई है और पार्टी के भीतर कई धड़े बन गए हैं जिनका फायदा राजनीतिक दल उठा सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य सरकार ने अद्र्ध स्वायत्त गोरखालैंड प्रादेशिक प्रशासन के तहत जातीय अल्पसंख्यकों के लिए अलग बोर्ड बनाने की पहल की है जिसकी वजह से तमांग, लेप्चा और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों ने गोरखा से दूरी बना ली है जो इस पर्वतीय इलाके में दबदबे वाले समुदाय हैं।

राजनीतिक टिप्पणीकार सव्यसाची बसु रॉयचौधरी कहते हैं, 'इस पर्वतीय इलाके में गुरुंग का सम्मान मतदाता करते हैं जबकि तमांग की स्वीकार्यता सीमित है। वहीं दूसरी तरफ राय के प्रति लोगों के मन में श्रद्धा है लेकिन तृणमूल के साथ उनके जुडऩे से स्थानीय लोग थोड़े खिन्न हैं। अगर गुरुंग अपने समर्थकों में उत्साह जगाने में सफल हुए तब भाजपा की यह सीट जीतने की बड़ी संभावना है।' हालांकि वहीं दूसरी तरफ थापा ने यह चेतावनी दी है कि बिष्टï बाहरी व्यक्ति हैं ऐसे में दार्जिलिंग के लोग उनकी महत्त्वाकांक्षा के खिलाफ काम कर सकते हैं।

रॉयचौधरी का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्र के लोग राष्ट्रीय राजनीतिक दलों मसलन भाजपा को लेकर भ्रमित होते हैं हालांकि तृणमूल के साथ भी उनके रिश्ते सौहार्दपूर्ण नहीं हैं। वह कहते हैं, 'यहां यह बेहद जटिल स्थिति है। मेरा यह मानना है कि यहां अब 2017 जैसी स्थिति नहीं होगी। लेकिन एक बार जब नतीजे की घोषणा होगी तब हारने वाला राजनीतिक दल या धड़ा आसानी से अपनी हार को स्वीकार नहीं कर पाएगा।' 2017 में राज्य सरकार ने जीटीए के ऑडिट का आदेश दिया जिसके बाद राजनीतिक तनाव इतना बढ़ा की 104 दिनों तक बंद की स्थिति रही और हत्या के साथ ही कई सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों को आग लगाने की घटनाएं भी हुईं। 

पिछले दो लोकसभा चुनावों से भाजपा जीजेएम के साथ गठजोड़ करती आ रही है और जीजेएम का मानना है कि गोरखालैंड के सपने को पूरा करने के लिए इस पार्टी के साथ गठजोड़ करना उसके हित में है। भाजपा के लिए गोरखा का समर्थन पार्टी की विचारधारा पर आधारित नहीं है बल्कि भाजपा का गोरखालैंड को लेकर सहानुभूतिपूर्ण रवैया ही इसकी प्रमुख वजह है। हालांकि अलग राज्य का वादा आधिकारिक रूप से नहीं किया गया है।  लेकिन 2017 तक गोरखा समुदाय को यह लगता रहा है कि जीजेएम-भाजपा गठजोड़ ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जिससे गोरखालैंड हकीकत में तब्दील हो सकता है। हालांकि दार्जिलिंग से न तो जसवंत सिंह और न ही आहलूवालिया इस पर्वतीय इलाके में जाते रहे जहां 104 दिनों का बंद 27 सितंबर, 2017 को खत्म हुआ।

आहलूवालिया तो इस संकट के दौरान मूक दर्शक बने रहे। एक भाजपा नेता स्वीकार करते हैं, 'गोरखा फौजी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं और इनमें से ज्यादातर सेना में सक्रिय हैं या फिर सेवानिवृत्त सैनिक हैं। उनके मन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए काफी सम्मान है। वह एकमात्र ऐसे बंगाली थे जिन्हें गोरखा पसंद करते हैं और प्रेम करते हैं। कुछ सालों से ममता बनर्जी दार्जिलिंग में नेताजी की जयंती मनाती रही हैं जिसमें काफी भीड़ जुटती है और काफी हद तक इससे उनके पक्ष में लोगों का समर्थन भी बढ़ा है।'

तृणमूल के घोषणापत्र में पर्वतीय इलाके के लोगों के लिए विशेष योजना का वादा किया गया है और साथ यह वादा किया गया है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो यह राज्य के बंटवारे के लिए राज्य सरकार के वादे का परीक्षण करेगी। भाजपा सत्ता विरोधी रुझानों को लेकर सतर्क है, खासतौर पर 2017 के दौरान पार्टी की मूक भूमिका को लेकर जब दार्जिलिंग में सबसे खराब आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक संकट की स्थिति बन गई। अब यह एक बार फिर से बंगाल में अपने करीबी सहयोगी संगठन जीजेएम पर निर्भरता बना रही है ताकि आर्थिक और सामाजिक विकास के नाम पर इसे सीट मिल जाए। लेकिन तृणमूल को गोरखा पार्टी में गहरे दरार का अंदाजा है जिसकी वजह से पहली बार दार्जिलिंग लोकसभा सीट से जीत सुनिश्चित हो सकती है।
Keyword: General Election, Lok Sabha, Prime Minister, Narendra Modi, TMC, Modal Code of Conduct, Election Commission, Political Party, State, Voter, mamta banerjee, Paschim Banegal, darjeeling, Parliamentary Seat, Aasansol,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या रीपो दर को यथावत रखने का आरबीआई का निर्णय उचित है?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.