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एआरसी के रिटर्न में लगेगा लंबा वक्त

देव चटर्जी / मुंबई April 03, 2019

विभिन्न दबावग्रस्त कंपनियों में निवेश के लिए काफी आगे बढ़ चुकी परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी) के लिए अब इंतजार और अधिक लंबा हो गया है। इसकी वजह है कि सभी साझेदार कर्ज समाधान पर फिर से विचार कर रहे हैं। यह स्थिति ऐसे वक्त उजागर हुई है जब सरकार 2,50,000 करोड़ रुपये के फंसे कर्ज तले दबे बिजली क्षेत्र के लिए नई परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी लाने पर विचार कर रही है। 

विश्लेषकों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से कर्ज समाधान की गति धीमी पड़ेगी जो पहले रिजर्व बैंक के 12 फरवरी के परिपत्र के अनुसार तय समय सीमा के भीतर होना था। इनमें से ज्यादातर कर्ज या तो दिवाला प्रक्रिया में हैं या इन परियोजनाओं को खरीदने के लिए कई एआरसी कंपनियों के आगे आने से, यह समाप्त होने के कगार पर हैं। 12 फरवरी के परिपत्र पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने से इन कंपनियों के लिए मील का पत्थर आगे बढ़ गया है। एक अनुमान के मुताबिक 75 चूककर्ता कंपनियों पर 12 फरवरी के परिपत्र के तहत कर्ज समाधान की कार्रवाई चल रही थी।

एआरसी के अधिकारियों ने कहा कि वे कुछ लेनदेन को पूरा करने के काफी करीब थे लेकिन मौजूदा प्रमोटरों की ओर से जिस मुकदमेबाजी का अंदाजा था वह होने से अब उन्हें इसे पूरा करने में काफी विलंब होने की आशंका है। एक परिसंपत्ति पुनगर्ठन कंपनी के प्रमुख ने कहा, 'अब हम दोबारा से चौराहे पर आ गए हैं। अब हमें रिजर्व बैंक की ओर से आगे का रास्ता स्पष्टï होने का इंतजार करना होगा।'  उन्होंने कहा कि भले ही बैंक और भारत सरकार के अधिकारियों ने स्पष्टï किया है कि शीर्ष 40 मामले जिन्हें कर्ज समाधान के लिए 2017 में भेजा गया था उनपर इस फैसले का कोई प्रभाव नहीं होगा, लेकिन इनको लेकर कानूनी लड़ाई की संभावना को दरकिनार नहीं किया जा सकता है।    

12 फरवरी के परिपत्र का सबसे अधिक असर बिजली क्षेत्र की कंपनियों पर पड़ा था जिसके चलते सर्वोच्च न्यायालय में भारत सरकार को उनका समर्थन करना पड़ा था। इसकी पृष्ठभूमि में बोफा मेरिल लिंच के विश्लेषकों का सुझाव है कि भारत सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी बनानी चाहिए जो बैंकों के बिजली क्षेत्र में फंसे कर्ज का प्रबंधन या तो सीधे उस कंपनी को खरीदकर या राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) की नीलामी में बोली लगाकर करेगी।

इस पर अतिरिक्त 68,400 करोड़ रुपये की लागत आएगी। 2,50,000 करोड़ रुपये के फंसे कर्ज में से बैंकों ने पहले ही करीब आधे कर्ज के लिए प्रावधान कर दिए हैं। बिजली क्षेत्र के इस फंसे कर्ज की नीलामी के लिए 75 फीसदी बट्ïटे खाते में डालने की जरूरत है या और 61,560 करोड़ रुपये की जरूरत है।

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