बिजनेस स्टैंडर्ड - आरबीआई को सरकार का साथ
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आरबीआई को सरकार का साथ

श्रीमी चौधरी और अनूप रॉय / नई दिल्ली 04 03, 2019

आगे की राह

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से केंद्रीय बैंक को निर्देश देने के सरकारी अधिकाार सीमित नहीं हुए हैं
इस आदेश से आईबीसी प्रक्रिया कमजोर नहीं होगी
आरबीआर्ई एनपीए समाधान के लिए जारी करेगा निर्देश
एस4ए जैसी पुनर्गठन योजनाओं पर चर्चा होगी
सरकार आरबीआई से अलग अलग मामले के आधार पर अदालती आदेश पर अमल करने को कह सकती है

क्या है धारा 35एए
यह आईबीसी के प्रावधानों के तहत समाधान प्रक्रिया शुरू करने के लिए बैंकिंग कंपनियों को निर्देश जारी करने के लिए आरबीआर्ई को अधिकृत करने में केंद्र को सक्षम बनाती है

बिजनेस स्टैंडर्ड आरबीआई को सरकार का साथउच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद सरकार भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को अलग-अलग मामलों के आधार पर कंपनियों को ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में भेजने के लिए अधिकृत करने की योजना बना रही है। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को आरबीआई के पिछले साल 12 फरवरी को जारी परिपत्र को निरस्त कर दिया था। इसमें बैंकों को एक दिन की चूक को भी गैर निष्पादित परिसंपत्ति की श्रेणी में डालने का निर्देश दिया गया था।

वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'हम आईबीसी प्रक्रिया को कमजोर नहीं होने देंगे। उच्चतम न्यायालय के फैसले ने वसूली प्रक्रिया शुरू करने के लिए आरबीआई को निर्देश देने की सरकार की शक्तियों को कम नहीं किया है। उच्चतम न्यायालय के फैसले के असर को कम करने के लिए बैंकिंग नियमन अधिनियम की धारा 35 एए का सहारा लेगी।'

अधिकारी ने बताया कि यह बैंकिंग नियमन अधिनियम के तहत निर्धारित नियमों के दायरे में होगा और इसे अदालत में चुनौती देना मुश्किल होगा। इस कानून की धारा 35 एए के तहत केंद्र सरकार आरबीआई को चूककर्ता कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दे सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार चाहे तो इन नियमों को पिछली तारीख से लागू कर सकती है लेकिन कंपनियां इसे फिर चुनौती दे सकती हैं। उन्होंने कहा कि सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे आगे की तारीख से लागू किया जाए क्योंकि कुछ समय के बाद फिर चूक की संभावना है। 

न्यायालय के फैसला इस बात पर केंद्रित था कि धारा 35एए के मुताबिक आरबीआई को कंपनियों को आईबीसी में भेजने से पहले सरकार से अनुमति लेनी चाहिए थी। इस परिपत्र में बड़े कर्जदारों की किस्त में एक भी दिन की चूक होने पर उसे एनसीएलटी में भेजने का प्रावधान था। इस परिपत्र से 157 कंपनियां प्रभावित हुई जिन पर कम से कम 2,000 करोड़ रुपये बकाया था। इन कंपनियों का कुल बकाया 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक था। न्यायालय का कहना था कि केंद्र सरकार की अनुमति के बिना इस तरह का निर्देश जारी नहीं किया जा सकता है। 

सरकार इस मामले में हरसंभव कोशिश करने को तैयार है और वह आरबीआई को हरेक मामले के आधार पर अनुमति देगी। सूत्रों का कहना है कि आरबीआई और सरकार के बीच विचार विमर्श चल रहा है और एनपीए के समाधान के ताजा दिशानिर्देश जारी किए जा सकते हैं। 

अधिकारी ने कहा, 'यह अनुमति अलग-अलग मामलों के आधार पर होगी। 12 फरवरी के परिपत्र से पैदा हुए एनसीएलटी के मामलों को नए घटनाक्रम के आलोक में देखना होगा। लेकिन उन मामलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जो इस परिपत्र के दायरे से बाहर हैं।' उन्होंने साथ ही कहा कि 12 फरवरी के परिपत्र की गैरमौजूदगी में आरबीआई को एस4ए जैसी पुरानी योजनाओं को फिर से लाना पड़ सकता है। लेकिन ऐसी योजनाओं की सफलता की दर बहुत कम रही है और यही वजह है कि केंद्रीय बैंक को 12 फरवरी का परिपत्र जारी करना पड़ा।

140 से अधिक मामलों में बैंकों ने रणनीतिक कर्ज पुनर्गठन (एसडीआर) का सहारा लिया लेकिन वे मुट्ठीभर मामलों में भी स्वामित्व में बदलाव नहीं कर सके। कॉरपोरेट ऋण पुनर्गठन (सीडीआर) में 591 मामलों में से केवल 110 ही सफल रहे जबकि 291 मामले नाकाम रहे। 22 मामलों में विभिन्न योजनाओं को आजमाया गया जिनमें से 20 कर्जदार अब भी चूककर्ता बने हुए हैं।
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