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भू-सामरिक कारण से अब हुआ 'मिशन शक्ति' परीक्षण

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  April 02, 2019

धरती से सैकड़ों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में तीन किलोमीटर प्रति सेकंड की दर से घूम रहे वस्तु को आप किस तरह नष्ट कर सकते हैं? 'मिशन शक्ति' ने दिखाया कि इस वस्तु को मिसाइल से नष्ट किया जा सकता है। उस वस्तु को लेजर किरणों या इलेक्ट्रॉनिक पल्स हथियार के इस्तेमाल से भी नाकाम किया जा सकता था। सवाल है कि आप ऐसा क्यों करेंगे? सैटेलाइट और बैलिस्टिक मिसाइलें आज शस्त्रागार का अनिवार्य हिस्सा हैं। बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट करना और सैटेलाइट-आधारित संचार नेटवर्क को गड़बड़ करने की क्षमता अहम हो सकता है। ऐसी ही तकनीक धरती की तरफ बढ़ रहे उल्कापिंड से बचाव के लिए भी उपयोगी हो सकती है। ऐसे आकाशीय पिंडों के धरती से टकराने पर व्यापक विनाश हो सकता है।

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अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन (1980-88) के समय बैलिस्टिक मिसाइल प्रतिरक्षा के लिए 'स्टार वार्स' परियोजना के शोध एवं विकास पर काफी खर्च किया गया। तत्कालीन सोवियत संघ के पास अमेरिका का मुकाबला करने के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी थी और हथियारों की होड़ ने उसे गहरे आर्थिक संकट की तरफ धकेल दिया। इसके चलते सोवियत संघ का पतन भी जल्द हो गया। तकनीकी तौर पर व्यवहार्य बैलिस्टिक मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली और ऐंटी-मिसाइल प्रणाली के लिए एक ही क्षमता जरूरी होती है। इसके लिए तीव्र गति वाली वस्तु को ट्रैक करने, उसके पथ का अनुमान लगाने और उसके पास तक पहुंचने वाले हथियारों से लैस होना जरूरी है। ये सारे काम बहुत जल्दी करने होते हैं लिहाजा प्रतिरक्षा प्रणाली को कुछ मिनटों के ही भीतर संभावित खतरे और उसके मार्ग का अंदाजा लगाने और मारक हथियारों की क्षमता से लैस होना चाहिए। भारत को अपनी सैटेलाइट प्रणाली के लिए ये सारी क्षमताएं विकसित करनी थीं। इस तरह की प्रतिरक्षा प्रणाली अंतरिक्ष में स्थापित की जा सकती है ताकि बहुत कम समय में जवाब दिया जा सके और दायरा भी अधिक हो। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 5,000 किलोग्राम से अधिक वजन वाले सैटेलाइट प्रक्षेपित कर चुका है। इस तरह रक्षा शोध एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ऐसी प्रतिरक्षा प्रणाली अंतरिक्ष में स्थापित करने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम था। 
 
भारत के पास मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली वर्ष 2012 से ही मौजूद है। उस समय तक भारत मिसाइल को हवा में ही मार गिराने की क्षमता का पांच बार सफल परीक्षण कर चुका था। तत्कालीन मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार वी के सारस्वत ने 97वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में दावा किया था कि भारत के पास ऐंटी-मिसाइल प्रणाली के लिए जरूरी सभी संसाधन हैं। भारत मिसाइल को मार गिराने की क्षमता का कई बार परीक्षण कर चुका था और उसकी तुलना में सैटेलाइट को नष्ट करना अधिक आसान है। मध्यम एवं लंबी दूरी की अधिकांश मिसाइलें दागे जाने के बाद 300 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई तक जाती हैं और उनका उड़ान पथ भी काफी जटिल होता है। इसकी तुलना में सैटेलाइट के भ्रमण पथ के बारे में पहले से अनुमान लगाया जा सकता है। ऐंटी-सैटेलाइट परीक्षण से अब तक परहेज करने की वजह शायद यही थी कि वर्ष 2007 में चीन के ऐसे परीक्षण की तीखी आलोचना हुई थी। चीन ने अपने बेकार हो चुके एक सैटेलाइट को नष्ट कर दिया था। वह सैटेलाइट धरती से करीब 800 किलोमीटर की ऊंचाई पर भ्रमण कर रहा था। उस परीक्षण में नष्ट हुए सैटेलाइट के 3,000 से अधिक टुकड़े हो गए थे। कुछ टुकड़े एक रूसी सैटेलाइट से टकराए थे और इंटरनैशनल स्पेस स्टेशन भी खतरे में आ गया था।
 
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का अनुमान है कि जनवरी 2019 में कुल 1950 सैटेलाइट सक्रिय स्थिति में थे जबकि 3,000 से अधिक सैटेलाइट बेकार हो चुके हैं। स्पेस सर्विलांस नेटवक्र्स 10 सेंटीमीटर से बड़े आकार के मलबे के 22,300 टुकड़ों पर नजर रखे हुए है। धरती की कक्षा में मलबों की मौजूदगी बेहद गंभीर समस्या है। वर्ष 2012-13 में डीआरडीओ मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली को ऐसे इस्तेमाल करने के बारे में सोच रहा था कि सैटेलाइट नष्ट करने का आभासी परीक्षण किया जा सके। इसके लिए 'फ्लाई-बाई' तरीका अपनाने पर विचार किया गया जिसमें मिसाइल को सैटेलाइट के बेहद करीब से होकर गुजरना था लेकिन उसे नष्ट नहीं करना था। मिशन शक्ति परीक्षण के दौरान धरती की 300 किलोमीटर की कक्षा में घूम रहे 740 किलोग्राम वजन के सैटेलाइट को निशाना बनाया गया। इस परीक्षण में भी नष्ट सैटेलाइट के मलबे बने हैं लेकिन धरती के बेहद पास होने के कारण वे वायुमंडल के संपर्क में आने पर जलकर नष्ट हो जाएंगे। 
 
सवाल है कि भारत ने ऐंटी-सैटेलाइट परीक्षण अब क्यों किया? चुनावों के अलावा जिनेवा में जारी एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी इसकी एक वजह है जिसमें बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने (पारोस) पर चर्चा चल रही है। परमाणु अप्रसार संधि की तरह पारोस पर सहमति बनने की सूरत में ऐंटी-सैटेलाइट उपकरणों के विकास पर प्रतिबंध लग सकता है लेकिन पहले से ऐसी क्षमता रखने वाले देशों को उससे छूट मिलेगी। भारत यही उम्मीद कर रहा है कि उसका मकसद हासिल हो चुका है।  भारत ने बाहरी अंतरिक्ष संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं जिसमें भारी विनाश की क्षमता रखने वाले हथियारों की तैनाती अंतरिक्ष में करने पर प्रतिबंध लगा है। मिशन शक्ति का परीक्षण उस संधि का उल्लंघन नहीं करता है। इसके अलावा भारत अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति का भी सदस्य है और इस परीक्षण में बहुत कम मलबा बनने से उसका भी उल्लंघन नहीं हुआ है।  मिशन के भू-सामरिक निहितार्थ मिलेजुले हो सकते हैं। परीक्षण में इस्तेमाल उपकरण स्वदेशी स्तर पर विकसित हैं और डीआरडीओ एवं इसरो को 1998 के बाद से लगे प्रतिबंधों की आदत हो चुकी है। लेकिन दूसरे विकास कार्यक्रमों पर असर पड़ सकता है। 
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