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सरकार के मुखिया व राजनेता के रूप में मोदी का कैसा रहा प्रदर्शन

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  April 01, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल खत्म होने में दो महीने से भी कम वक्त बचा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि वह अपने दायित्वों के निर्वहन में किस हद तक सफल या नाकाम रहे हैं? भारत के किसी भी प्रधानमंत्री का आकलन दो अलग श्रेणियों में होना चाहिए। पहली श्रेणी में यह देखा जाना चाहिए कि उसने सरकार के मुखिया के तौर पर कैसा प्रदर्शन किया है? और दूसरा, एक राजनेता के तौर पर उसका प्रदर्शन कैसा रहा है? ये दोनों ही श्रेणियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं। किसी भी सरकारी भूमिका का आकलन करते समय इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि अगर कोई प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल रहता है तो उसे कम-से-कम दो बड़ी गलतियां करने की छूट दी जानी चाहिए। मेरी नजर में वह गलती बड़ी होती है जिसका असर लंबे समय तक रहे और उन्हें बदल पाना काफी मुश्किल हो। 

 
इस पैमाने पर नेहरू ने भारी उद्योगों पर जोर देकर और चीन के साथ युद्ध के रूप में दो बड़ी गलतियां की थीं। इंदिरा गांधी सरकार की दो बड़ी गलतियां बैंकों का राष्ट्रीयकरण और कांग्रेस पार्टी का निजीकरण थीं। राजीव गांधी की बड़ी गलतियों में भारी राजकोषीय घाटा और श्रीलंका में सेना भेजने का फैसला रहीं। श्रीलंका में शांति सेना भेजने की कीमत उन्हें अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी। पी वी नरसिंह राव ने अपने कार्यकाल में केवल एक बड़ी गलती की थी- बाबरी मस्जिद के विध्वंस को रोकने के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया था। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी केवल एक बड़ी गलती पाकिस्तान पर विश्वास कर की थी। मनमोहन सिंह की बड़ी गलती मनरेगा थी जिसके परिणामों को पलट पाना लगभग नामुमकिन है।
 
मोदी की गलतियां
 
इस लिहाज से देखें तो नरेंद्र मोदी सरकार की बड़ी गलती शिक्षा के प्रति नजरिया रही है क्योंकि इसका दूरगामी असर देखने को मिलेगा। जहां तक नोटबंदी जैसे फैसलों का सवाल है तो उसके असर को तो पलटा जा सकता है। सरकार के मुखिया के तौर पर उनकी भूमिका का सही आकलन किया जाए तो यह नजर आएगा कि इंदिरा गांधी को छोड़कर बाकी सभी प्रधानमंत्रियों की तरह मोदी ने भी उम्मीद के मुताबिक ही प्रदर्शन किया है क्योंकि हमारी व्यवस्था में ही इधर-उधर करने की बहुत गुंजाइश नहीं है। ऐसी स्थिति में हम प्रधानमंत्री से यही उम्मीद कर सकते हैं कि वे अपने कार्यकाल में दो ऐसी बड़ी गलतियां न कर दें जिनके असर को पलटा न जा सके। जहां तक किसी निर्णय में होने वाली गलतियों का सवाल है तो नेहरू, राजीव, राव, वाजपेयी और मनमोहन के समय भी देखा गया था कि ऐसा होता ही है। कुल मिलाकर, सरकार के नेता के रूप में मोदी ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। होने को तो यह काफी बुरा भी हो सकता था।
 
मोदी, मोदी, मोदी
 
एक राजनेता के तौर पर मोदी का प्रदर्शन कैसा रहा है? यही वह मोर्चा है जहां पर तमाम प्रधानमंत्री खुद को मुश्किल में पाते हैं। हालांकि नेहरू 15 साल तक इस समस्या से नहीं घिरे क्योंकि उन दिनों कांग्रेस काफी मजबूत थी। वाजपेयी भी राजनीति के प्रति अपने रवैये की वजह से परेशानी में नहीं पड़े। इनको छोड़कर बाकी सभी प्रधानमंत्रियों और खासकर मोदी का तो इस मामले में प्रदर्शन काफी खराब रहा है। हालांकि मोदी और दूसरे प्रधानमंत्रियों में फर्क यह है कि मोदी कभी भी चुनावी अभियान की सोच से बाहर ही नहीं निकल पाए। बाकी प्रधानमंत्री जहां अपने कार्यकाल के अंतिम 18 महीनों में ही चुनावी मिजाज में नजर आते थे लेकिन मोदी ने तो मई 2014 में जिस दिन संसद में यह ऐलान किया कि वह अगले 10 वर्षों तक प्रधानमंत्री बने रहना चाहते हैं, उसी दिन से उनकी दोनों आंखें लगातार 2019 के आम चुनाव पर टिकी रहीं।
 
राजनीतिक चुनौतियों का पहले ही अंदाजा लगाकर उसके हिसाब से काम करना उनकी बुनियादी शैली रही है। जब वह भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी हासिल करने की मुहिम में लगेे हुए थे तब भी वह धीरे-धीरे खुद को एकमात्र संभावित विकल्प के तौर पर पेश करने में सफल रहे। इस बार भी वह अब तक वही काम करते आ रहे हैं। इस बार का चुनाव 'भाजपा बनाम अन्य' का मुकाबला न रहकर 'मोदी बनाम अन्य' बन चुका है। इस रणनीति में काफी जोखिम भी है क्योंकि अगर भाजपा का प्रदर्शन बुरा रहता है और वह पिछली बार की तुलना में 100 सीटें भी गंवा देती है तो उनकी पार्टी के सहयोगी इसका सारा ठीकरा उन्हीं पर फोड़ेंगे।
 
एक बेहद विरोधाभासी कारण से ऐसा हो भी सकता है। सरकार के एक अच्छे अगुआ के तौर पर हासिल तमाम उपलब्धियां उनकी राजनीतिक रणनीति की नाकामी के आगे फीकी पड़ जाएंगी। इसकी वजह यह है कि करिश्मा एक बात है और 'कोई विकल्प नहीं है' (टीना) कारक होना एकदम दूसरी बात है।  इस तरह लोकसभा की 543 सीटों में से कम-से-कम 175 सीटों पर तो भाजपा की जीत की संभावना नहीं है क्योंकि वहां पर टीना कारक का वजूद ही नहीं है। इसका मतलब है कि बाकी 350 से कुछ अधिक सीटों पर ही मोदी सही मायने में प्रतिस्पद्र्धा कर सकते हैं। सवाल है कि क्या वह इनमें से 272 सीटें जीत सकते हैं?
 
आखिर में, अगर आप थोड़ा ठहरकर सोचें तो मोदी का रवैया मनमोहन सिंह के ठीक उलट है। मोदी के मामले में सारा दोष पार्टी पर डाला जाता रहा जबकि सरकार की तमाम उपलब्धियों का सेहरा उनके माथे पर सजता रहा। अब मैं आप लोगों पर यह छोड़ता हूं कि इन दोनों में से अधिक चतुर कौन है?
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, narendra modi,,
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