बिजनेस स्टैंडर्ड - बाह्य दबाव की वापसी
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बाह्य दबाव की वापसी

संपादकीय /  April 01, 2019

वित्त वर्ष 2018-19 की तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर 2018 तक की अवधि के दौरान देश के बाहरी खाते की स्थिति कैसी रही, यह बताने वाले आंकड़े अब हमारे पास मौजूद हैं। प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में देश में चालू खाते का घाटा, सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 फीसदी के बराबर रहा। कच्चे तेल की कम कीमतों के कारण भुगतान संतुलन को बेहतर बनाए रखने में सहायता मिली। इससे चालू खाते के घाटे को वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2018) के जीडीपी के 2.9 फीसदी के खतरनाक स्तर से कम करने में सहायता मिली। समग्र रूप से देखा जाए तो अप्रैल से दिसंबर 2018 की कुल अवधि के लिए चालू खाते का घाटा जीडीपी के 2.6 फीसदी के स्तर पर रहा। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के घाटे के 1.8 फीसदी के स्तर से काफी अधिक है। 

 
यह घटनाक्रम बताता है कि तेल एवं गैस कीमतों में उतार-चढ़ाव को लेकर हमारी पुरानी संवेदनशीलता अभी तक बरकरार है। यह संवेदनशीलता बार-बार उजागर होती है। दुर्भाग्यवश भारतीय निर्यात में अपेक्षाकृत ठहराव की स्थिति बनी रही। यानी चालू खाते का घाटा लगभग पूरी तरह वैश्विक जिंस कीमतों पर निर्भर रहा। बाहरी ऊर्जा स्रोतों पर यह निर्भरता प्रबंधनयोग्य मानी जा सकती है बशर्ते कि चालू खाते के घाटे की वित्त व्यवस्था का स्थायी निदान खोज लिया जाए। बहरहाल, अर्थव्यवस्था में एक अन्य ढांचागत समस्या सर उठाती नजर आ रही है। यह समस्या पहले से ही संवेदनशील बाह्य खाते के संकट को और बढ़ा देगी। देश में स्थिर दर से विदेशी मुद्रा की आवक बढ़ाना मुश्किल बना हुआ है। शुद्घ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में हाल के दिनों में कोई उल्लेखनीय वृद्घि देखने को नहीं मिली है। अप्रैल से दिसंबर 2018 के बीच विशुद्घ एफडीआई आवक करीब 2,500 करोड़ डॉलर रही। इससे पिछले वर्ष की समान अवधि में यह राशि 2,400 करोड़ डॉलर के आसपास रही थी। 
 
एनआरआई समुदाय द्वारा की जाने वाली जमा में भी ठहराव देखने को मिल रहा है। यानी हमारा देश काफी हद तक पोर्टफोलियो निवेश पर निर्भर है। इसकी प्रकृति कुछ ऐसी होती है कि यह निवेश कभी भी देश से बाहर जा सकता है। अप्रैल से दिसंबर 2018 के बीच बड़ी तादाद में यह निवेश देश से बाहर गया। एक अनुमान के मुताबिक इस अवधि में 1,200 करोड़ डॉलर मूल्य का पोर्टफोलियो निवेश देश से बाहर गया। जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में करीब 2,000 करोड़ डॉलर मूल्य का निवेश देश में आया था। इस बात की भी काफी संभावना है कि दिसंबर के बाद के समय में पोर्टफोलियो निवेश में वापसी हुई हो लेकिन उससे केवल यह पता चलता है कि ऐसे निवेश का प्रबंधन करना कितना मुश्किल काम है। दिसंबर 2018 में लगातार तीसरे महीने भुगतान संतुलन घाटे की स्थिति में रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि पहले जहां चालू खाते के घाटे के लिए खतरे का स्तर मजबूत पूंजीगत आवक के कारण जीडीपी के 3 फीसदी के आसपास था, वहीं अब वह कम हो गया है। यहां तक कि अगर विशुद्घ एफडीआई में स्थिरता हो तो जीडीपी के 2.5 फीसदी के बराबर का चालू खाता घाटा भी बाहरी खाते पर दबाव डाल सकता है।  यह स्पष्ट है कि ये इन ढांचागत समस्याओं से सावधानीपूर्वक निपटने की आवश्यकता है। यह सच है कि फिलहाल कोई आसन्न संकट नहीं है लेकिन ऐसे संकेत हैं कि अगर हालात विपरीत हुए तो संकट उत्पन्न हो सकता है। देश में बनने वाली नई सरकार को निर्यात बढ़ाने और लंबी अवधि के निवेश के लिए बेहतर माहौल बनाने पर ध्यान 
देना होगा।
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