बिजनेस स्टैंडर्ड - कर संग्रह में बढ़ोतरी का लक्ष्य और सीबीडीटी की चुनौती
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कर संग्रह में बढ़ोतरी का लक्ष्य और सीबीडीटी की चुनौती

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  March 31, 2019

बताया जाता है कि सनदी लेखाकारों (चार्टर्ड अकाउंटेंट) के कम से कम पांच संगठनों  ने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के पास एक अपील भेजी है। अपील में दोनों नेताओं से यह अनुरोध किया गया है कि वे केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) से कहें कि वित्त वर्ष 2018-19 के वार्षिक प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य हासिल करने की कोशिश में वे करदाताओं पर अनावश्यक दबाव न बनाएं।  ऐसी अपील अस्वाभाविक है। आखिर सनदी लेखाकारों के इन संगठनों को ऐसी अपील क्यों करनी पड़ी? इसकी वजह थी सीबीडीटी द्वारा 26 मार्च को वरिष्ठ आयकर अधिकारियों को जारी किया गया एक आंतरिक प्रपत्र। इस पत्र के जरिये उनसे कहा गया था कि वे कर संग्रह और बकाया वसूली की प्रक्रिया और प्रयास तेज कर दें। सनदी लेखाकारों को आशंका है इस आंतरिक नोट के बाद करदाताओं को अनावश्यक रूप से प्रताडि़त किया जा सकता है। 

 
आखिर ऐसी क्या वजह थी कि सीबीडीटी को वित्त वर्ष 2018-19 की समाप्ति से पांच दिन पहले 26 मार्च को ऐसा पत्र कर अधिकारियों को लिखना पड़ा? उस तिथि तक सीबीडीटी ने करीब 10.29 लाख करोड़ रुपये मूल्य का प्रत्यक्ष कर एकत्रित कर लिया था। उसका संशोधित लक्ष्य 12 लाख करोड़ रुपये का था। दूसरे शब्दों में कहें तो उसे वित्त वर्ष के अगले पांच दिन में 1.71 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि एकत्रित करनी थी।  एक आतंरिक अनुमान में कहा गया कि इन पांच दिनों में सीबीडीटी 1.2 लाख करोड़ रुपये की राशि और जुटा सकेगा यानी 50,000 करोड़ रुपये की कमी रह जाएगी। यह परिपत्र इसलिए जारी किया गया ताकि संभावित कमी को कम किया जा सके और संशोधित लक्ष्य को हासिल किया जा सके। जाहिर सी बात है कि कर अधिकारियों के आक्रामक होने की आशंका में दम था और सनदी लेखाकार केवल कुछ राहत देने की मांग कर रहे थे।
 
दूसरी ओर, सीबीडीटी को लक्ष्य हासिल करने में जो कठिनाई हो रही है उसके पीछे भी कई कारक हैं। कम संभावित आय भी इसकी एक वजह हो सकती है। आय के स्रोत पर कटने वाले कर के संग्रह में आई कमी इसकी दूसरी वजह हो सकती है। इसकी एक वजह बकाया वसूली में आई कमी भी हो सकती है। यही वजह है कि परिपत्र में आय कर अधिकारियों से कहा गया कि वे बकाया वसूली की प्रक्रिया तेज करने के प्रयास करें और साथ ही आय के स्रोत पर कटने वाले कर को जल्दी जमा करने की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाए। 
 
बहरहाल, अगर सरकार ने 1 फरवरी, 2019 को प्रस्तुत बजट में प्रत्यक्ष कर संग्रह के अनुमानित लक्ष्य में संशोधन करके 50,000 करोड़ रुपये का इजाफा नहीं किया होता तो ये तमाम लक्ष्य कम दुष्कर नजर आते। वित्त वर्ष 2018-19 के लिए मूल्य लक्ष्य 11.5 लाख करोड़ रुपये का था। इसमें 6.21 लाख करोड़ रुपये की राशि निगमित कर से और 5.29 लाख करोड़ रुपये की राशि आय कर से अनुमानित थी। परंतु संशोधन के बाद यह लक्ष्य 12 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। इस बढ़े हुए लक्ष्य को हासिल करने का दायित्व पूरी तरह निगमित कर पर डाल दिया गया। यह भी एक वजह है जिसके चलते सनदी लेखाकारों ने यह अपील की। ये लेखाकार अनेक कंपनियों का प्रबंधन करते हैं और ये कंपनियां कर अधिकारियों की निगरानी में हो सकती हैं। 
 
राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को प्राप्त करना प्रत्यक्ष कर संग्रह के लक्ष्य में इजाफे की प्रमुख वजह था। परंतु क्या सीबीडीटी निगमित कर संग्रह के लक्ष्य में इजाफे के लिए पूरी तरह तैयार था? बीते पांच वर्ष में निगमित कर संग्रह का लक्ष्य केवल दो बार बढ़ाया गया। वर्ष 2017-18 में इसमें 25,000 करोड़ रुपये और 2018-19 में 50,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की गई। इससे पहले के तीन वर्षों के दौरान निगमित कर का संशोधित लक्ष्य या तो कम किया गया या अपरिवर्तित रहा।  एक फरवरी को जब बढ़े हुए प्रत्यक्ष कर लक्ष्य वाला अंतरिम बजट पेश किया गया, तब सुशील चंद्रा सीबीडीटी के चेयरमैन थे। चंद्रा सन 1980 बैच के राजस्व सेवा अधिकारी हैं और सीबीडीटी चेयरमैन के रूप में उनका कार्यकाल खासा लंबा रहा। उन्होंने 1 नवंबर, 2016 को इस अहम विभाग का काम संभाला था और उन्हें दो बार सेवा विस्तार मिला। सामान्य तौर पर उनका विस्तारित कार्यकाल 31 मई, 2019 को समाप्त होता। संभव है कि लंबे कार्यकाल और 2017-18 में निगमित कर लक्ष्य में इजाफा करने के बाद वह 2018-19 में और बढ़े लक्ष्य पर सहमत हो गए हों। 
 
14 फरवरी को यानी अंतरिम बजट पेश किए जाने के दो सप्ताह के भीतर चंद्रा को निर्वाचन आयुक्त के पद पर नियुक्ति दे दी गई। एक दिन बाद ही सन 1982 बैच के राजस्व सेवा अधिकारी प्रमोद चंद्र मोदी को सीबीडीटी का चेयरमैन बना दिया गया। इससे पहले वह सदस्य के रूप में काम कर रहे थे। सामान्य परिस्थितियों में मोदी का कार्यकाल जून 2019 में समाप्त होगा।  क्या चंद्रा को कुछ और सप्ताह तक सीबीडीटी चेयरमैन के रूप में काम करने देना ज्यादा सही नहीं होता ताकि वह प्रत्यक्ष कर संग्रह के बढ़े हुए लक्ष्य को हासिल कर सकते? या फिर कुछ और बातों का भी ध्यान रखना आवश्यक था।
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